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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वायुकी परीक्षा
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति ॥ ७ ॥
तदनन्तर, उन देवताओंने वायुसे कहा—'हे वायो ! इस बातको
मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?' उसने कहा—'बहुत अच्छा' ॥ ७ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्य-
ब्रवोन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥
वायु उस यक्षके पास गया, उसने वायुसे पूछा—'तू कौन है?'
उसने कहा—'मैं वायु हूँ—मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ' ॥ ८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वमाददीय
यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥
[ तत्र यक्षने पूछा—] 'उस [ मातरिश्वारूप ] तुझमें क्या सामर्थ्य
है ?' [ वायुने कहा—] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको ग्रहण
कर सकता हूँ ॥ ९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन
तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं
यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥
तत्र यक्षने उस वायुके लिये एक तिनका रखा और कहा—'इसे
ग्रहण कर'। वायु उस तृणके समीप गया । परन्तु अपने सारे वेगसे भी