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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

९४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

९४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य

चाकशीति" (श्वे० उ० ४।६) | केवल उसे देखता है" "इस अक्षर-
"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" | ब्रह्मको आज्ञामें [ सूर्य और चन्द्रमा
(बृ० उ० ३।८।९) इत्याद्या | स्थित हैं ]" इत्यादि श्रुतियाँ संसार-
असंसारिण एकस्यात्मनो नित्य- | धर्मोंसे रहित एक नित्यमुक्त आत्माकी
मुक्तस्य सिद्धौ श्रुतयः। स्मृतयश्च | सिद्धिमें ही प्रमाणभूत हैं। इसी प्रकार-
सहस्रशो विद्यन्ते। न चार्थवादाः | सहस्रों स्मृतियाँ भी मौजूद हैं। ये सब
शक्यन्ते कल्पयितुम्। अनन्य- | अर्थवाद हैं—ऐसी कल्पना भी नहीं
योगित्वे सति विज्ञानोत्पादक- | की जा सकती, क्योंकि वे किसी अन्य
त्वात्। न चोत्पन्नं विज्ञानं | विधिके शेषभूत न होनेके कारण
बाध्यते। | स्वतन्त्र ज्ञान उत्पन्न करनेवाले हैं और
| उनसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [किसी
| प्रमाणान्तरसे] बाधित भी नहीं होता।
अप्रतिषेधाच्च। न चेश्वरो | [ईश्वरका] निषेध न होनेके कारण
| भी [पूर्वोक्त श्रुतियाँ अर्थवाद नहीं हैं]।
नास्तीति निषेधोऽस्ति। प्राप्त्य- | ईश्वर नहीं है—ऐसा निषेध कहीं
| भी नहीं मिलता। यदि कहो कि
भावादिति चेन्नोक्तत्वात्। न | ईश्वरकी प्राप्ति (सिद्धि) न होनेके
| कारण निषेध नहीं है, तो ऐसा कहना
हिंस्यादितिवत्प्राप्त्यभावात्प्रति- | उचित नहीं; क्योंकि उसके विषयमें कहा
| जा चुका है। अर्थात् यदि ऐसा कहो
| कि [शास्त्रमें] ईश्वरका कोई प्रसङ्ग
षेधो नारभ्यत इति चेन्न। | ही नहीं आता, इसीलिये 'न हिंस्यात्सर्वा
| भूतानि' इस वाक्यके समान ईश्वरके
ईश्वरसद्भावे न्यायस्योक्तत्वात्। | निषेधका भी आरम्भ नहीं किया गया,
| तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि
अथवाप्रतिषेधादिति कर्मणः फल- | ईश्वरकी सत्तामें उपर्युक्त न्याय कहा
| गया है। अथवा 'अप्रतिषेधात्' इस हेतु
दान ईश्वरकालादीनां न प्रति- | का यह तात्पर्य समझना चाहिये कि कर्म
| का फल देनेमें ईश्वर और काल आदिका
षेधोऽस्ति। न च निमित्तान्तर- | प्रतिषेध नहीं किया गया है। कर्मको,

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

वाक्य-भाष्य
निरपेक्षं केवलेन कर्त्रैव प्रयुक्तं | किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करके केवल कर्तासे ही प्रेरित होकर फल
फलदं दृष्टम् । न विनष्टोऽपि | देते देखा भी नहीं है । सर्वथा नष्ट हुआ याग कालान्तरमें फल देनेवाला
यागः कालान्तरे फलदो भवति । | कभी नहीं होता ।
सेव्यबुद्धिवत्सेवकेन सर्वज्ञे- | जिस प्रकार सेवककी सेवासे सेव्य (स्वामी) की बुद्धिपर संस्कार पड़ .
[कर्मफलप्रदाने] श्वरबुद्धौ तु संस्कृ- | जाता है उसी प्रकार यागादि कर्मसे सर्वज्ञ ईश्वरकी बुद्धिके संस्कारयुक्त
[ईश्वरस्य] तायां यागादि- | हो जानेसे, फिर उस कर्मके नष्ट हो जानेपर भी, जैसे सेवकको स्वामीसे
[प्राधान्यम्] कर्मणा विनष्टेऽपि | वैसे ही कर्ताको ईश्वरसे फल मिल जाता है—ऐसा विचार ही ठीक है ।
कर्मणि सेव्यादिव | पदार्थ तो, सैकड़ों प्रमाणभूत वाक्य होनेपर भी, देशान्तर या कालान्तरमें
ईश्वरात्फलं कर्तुर्भवतीति युक्तम् । | अपने स्वभावको नहीं छोड़ते । अग्नि किसी भी देश या कालान्तरमें शीतल
न तु पुनः पदार्था वाक्यशतेनापि | नहीं हो सकता । इस प्रकार कर्मोंका भी कालान्तरमें दो ही प्रकार फल
देशान्तरे कालान्तरे वा स्वं स्वं | मिलता देखा जाता है ।
स्वभावं जहति । न हि देश- | कृषि आदि कर्म ऐसे कर्ताकी अपेक्षासे फल देनेवाले हैं जिसे बीज,
कालान्तरेषु चाग्निरनुष्णो भवति। | क्षेत्रसंस्कार तथा खेतीकी रक्षा आदिका ज्ञान हो, और सेवा आदि कर्म
एवं कर्मणोऽपि कालान्तरे फलं | विज्ञानवान् सेव्यकी बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे फलदायक हैं । यागादि
द्विप्रकारमेवोपलभ्यते । | कर्म कालान्तरमें फल देनेवाले हैं इसलिये उनकी फलप्राप्तिको अज्ञानी
बीजक्षेत्रसंस्कारपरिरक्षावि- | कर्ताकी अपेक्षासे मानना तो ठीक नहीं है; अतः उनका फल कर्म, देश,
ज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलं कृष्यादि वि- | काल, निमित्त और कर्मविपाकके विभागको जाननेवाले किसी चेतनकी
ज्ञानवत्सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलं | बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे ही हो
च सेवादि । यागादेः कर्मणस्त- |
थाविज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलत्वानुप- |
पत्तौ कालान्तरफलत्वात्कर्मदेश- |
कालनिमित्तविपाकविभागज्ञबुद्धि- |
संस्कारापेक्षं फलं भवितु- |