केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- | आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे
पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- | 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी
ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते— | उचित ही है । अतः यहाँ 'विज्ञात-
विज्ञातमविजानतामिति । अथवा | मविजानताम्' इस वाक्यद्वारा
हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- | असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख
मित्यादिः ॥३॥ | किया गया है । अथवा 'अविज्ञातं
| विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका
| उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमें है ॥३॥
वाक्य-भाष्य
˙ ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात और अज्ञात पदार्थोंसे रहित,
व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- | अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप,
स्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- | आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,
रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् | अभय और अनन्यरूप होनेके कारण
अविजानतां बुद्ध्यादिविषया- | ब्रह्म किसी इन्द्रियका विषय नहीं है—
त्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । | उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त
तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे ही
धर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन | प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि-
सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । | के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है। अतः
शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- | विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त
ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥ | आदि धर्मोंके आरोपसे [ उनका जाना
| हुआ ब्रह्म ] कार्य-कारणभाव रहनेसे
| सविकल्प ही है क्योंकि वह अयथार्थ-
| विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति
| आदिमें आरोपित रजत आदि ज्ञानोंके
| समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥
* हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियोंको इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
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पद-भाष्य
'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात
इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार
एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है
विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें
ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके
परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है'
सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है ।
| फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे
| जाना जाता है—यही बात
| बतलानेके लिये कहते हैं—
विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया
है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व-
की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो
अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो
प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता
प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे
| होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का
| कथन हुआ है । अतः समस्त
वाक्य-भाष्य
प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है,
वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी
द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-