केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 105 of 152
Read in contextखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
पद-भाष्य
| [वक्ष्यमाणा-ख्यायिकायाः प्रयोजनम्] | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्' इत्यादि-श्रवणाद् यदस्ति तद्विज्ञातं प्रमाणैः यन्नास्ति तदविज्ञातं शशविषाणकल्पमत्यन्तमेवासद्दृष्टम् ; तथेढं ब्रह्माविज्ञातत्वादसदेवेति मन्दबुद्धीनां व्यामोहो मा भूदिति तदर्थेयमाख्यायिका आरभ्यते । | 'ब्रह्म जाननेवालोंके लिये अविज्ञात है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात है' इस श्रुतिसे मन्दबुद्धि पुरुषोंको ऐसा भ्रम न हो जाय कि 'जो वस्तु है वह तो प्रमाणोंसे जान ही ली जाती है और जो नहीं है वह अविज्ञात वस्तु तो खरगोशके सींगके समान अत्यन्त अभावरूप ही देखी गयी है, अतः यह ब्रह्म भी अविज्ञात होनेके कारण असत् ही है' इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है । |
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वाक्य-भाष्य
यदुक्तं संसारिण ईश्वरादनन्या इति; तन्न ।
पूर्व०—तुमने जो कहा कि संसारी जीवोंका ईश्वरसे अभेद है सो ठीक नहीं।
किं तर्हि ?
सिद्धान्ती—तो फिर क्या बात है ?
भेद एव संसार्यात्मनाम् ।
पूर्व०—संसारी जीव और परमात्माका तो परस्पर भेद ही है।
कस्मात् ?
सिद्धान्ती—क्यों ?
लक्षणभेदादश्वमहिषवत् । कथं लक्षणभेद इत्युच्यते—ईश्वरस्य तावन्नित्यं सर्वविषयं ज्ञानं सवितृप्रकाशवत् । तद्विपरीतं संसारिणां खद्योतस्येव । तथैव शक्तिभेदोऽपि । नित्या
पूर्व०—घोड़े और भैंसके समान उनके लक्षणोंमें भेद होनेके कारण; और यदि कहो कि उनके लक्षणोंमें किस प्रकार भेद है तो बतलाते हैं [सुनो, ] सूर्यके प्रकाशके समान ईश्वरको सब विषयोंका सर्वदा ज्ञान रहता है, उसके विपरीत संसारी जीवोंको खद्योत (जुगनू) के समान अल्पज्ञान है। इसी प्रकार दोनोंकी शक्तियोंमें भी भेद है । ईश्वरकी शक्ति नित्य