Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished152 pages

१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १

Page 24Permalink

१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧

पद-भाष्य

मन्त्रार्थ-मीमांसा
(संस्कृत)
यद्येषोऽर्थोऽभिप्रेतः स्यात्, केनेषितमित्येतावत्तैव सिद्धत्वात्प्रेषितमिति न वक्तव्यम् । अपि च शब्दाधिक्यादर्थाधिक्यं युक्तमिति इच्छया कर्मणा वाचा वा केन प्रेषितमित्यर्थविशेषोऽवगन्तुं युक्तः ।
न, प्रश्नसामर्थ्यात्; देहादिसंघातादनित्यात्कर्मकार्याद्विरक्तः

(हिन्दी)
शङ्का—यदि यही अर्थ अभिमत था तो 'केनेषितम्' इतनेहीसे सिद्ध हो सकनेके कारण 'प्रेषितम्' ऐसा और नहीं कहना चाहिये था। इसके अतिरिक्त शब्दोंकी अधिकतासे अर्थकी अधिकता होनी उचित है इसलिये 'इच्छा' कर्म अथवा वाणी इनमेंसे किसके द्वारा प्रेषित, इस प्रकार प्रेषकविशेषका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होगा ।
समाधान—नहीं, प्रश्नकी सामर्थ्यसे यह बात प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इससे यह निश्चय होता है कि जो पुरुष देहादि सङ्घातरूप अनित्य कर्म और कार्यसे विरक्त हो गया है

वाक्य-भाष्य

(संस्कृत)
विषयेभ्यः प्रेषयत्यात्मा । विविक्त-नित्यचित्स्वरूपतया तु निमित्तमात्रं प्रवृत्तौ नित्यचिकित्साधिष्ठातृवत् ।

(हिन्दी)
ओर इस प्रकार नहीं भेजता जैसे गुरु शिष्योंको । यह तो सबसे विलक्षण और नित्य चित्स्वरूप होनेके कारण नित्य चिकित्साके अधिष्ठाता [ चकोर पक्षी ] के समान उनकी प्रवृत्तिमें केवल निमित्तमात्र है ।


१. राजा लोग जब भोजन करते हैं तो उसमें विष मिला हुआ तो नहीं है इसकी परीक्षाके लिये उसे चकोरके सामने रख देते हैं । विषमिश्रित अन्नको देखकर चकोरकी आँखोंका रंग बदल जाता है । इस प्रकार चकोरकी केवल सन्निधिमात्रसे ही राजाकी भोजनमें प्रवृत्ति हो जाती है । इसके लिये उसे और कुछ नहीं करना पड़ता ।