केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
पद-भाष्य
तथा मनसः अन्तःकरणस्य | इसी प्रकार वह मनका—अन्तः-
मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्त- | करणका मन है, क्योंकि चिज्ज्योति-
रेण चैतन्यज्योतिषो दीधितिं | के प्रकाशके बिना अन्तःकरण
स्वविषयसङ्कल्पाध्यवसायादि- | अपने विषय सङ्कल्प और अध्यवसाय
समर्थं स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि | ( निश्चय ) आदिमें समर्थ नहीं हो
मन इति । इह बुद्धिमणसी | सकता । अतः वह मनका भी मन
एकीकृत्य निर्देशो मनस इति । | है । यहाँ बुद्धि और मनको एक
| मानकर मनका निर्देश किया
| गया है ।
यद्वाचो ह वाचम्; यच्छब्दो | यद्वाचो ह वाचम्—यहाँके
यस्मादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वैः | 'यत्' शब्दका 'यस्मात्' अर्थ
सम्बध्यते—यस्माच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, | ( हेत्वर्थ ) में 'क्योंकि वह श्रोत्रका
यस्मान्मनसो मन इत्येवम् । | श्रोत्र है, क्योंकि वह मनका मन
वाचो ह वाचमिति द्वितीया | है' इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदोंसे
प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य | सम्बन्ध है । 'वाचो ह वाचम्'
प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह | इस पदसमूहमें 'वाचम्' पदकी
| द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्तिके
| रूपमें परिणत कर ली जाती है,
| जैसा कि 'प्राणस्य प्राणः' में देखा
| जाता है । यदि कहो कि 'वाचो
वाक्य-भाष्य
वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण | यहाँ 'वाचो ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य
| प्राणः' इस प्रकार [ पिछले पदमें ]
इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैव द्रष्टव्यम् । | सर्वत्र ही [ प्रथमा और द्वितीया ] दो
| विभक्ति समझनी चाहिये, क्यों ? क्योंकि
कथम् ? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्देशः, | आत्मा-विषयक प्रश्न होनेके कारण
| उसके स्वरूपका निर्देश किया गया है
| और निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही
प्रथमेयव च निर्देशः । तस्य च | किया जाता है; तथा आत्मा ही
२६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦
पद-भाष्य
वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य | ह वाचम्' इस प्रयोगके अनुरोधसे
प्राणमिति कस्माद्द्बितीयैव न | 'प्राणस्य प्राणम्' इस प्रकार द्वितीया
क्रियते ? न; बहूनामनुरोधस्य | ही क्यों नहीं कर ली जाती ? तो
युक्तत्वात्। वाचमित्यस्य वागि- | ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि
त्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य | बहुतोंका अनुरोध मानना ही
प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं | युक्तिसङ्गत है। अतः 'स उ प्राणस्य
हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः | प्राणः' इस पदसमूहके [स और
स्यात्। | प्राणः] दो शब्दोंके अनुरोधसे
पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देश्टुं | 'वाचम्' इस शब्दको ही 'वाक्'
युक्तम्। स यस्त्वया पृष्टः प्राणस्य | इतना कहना चाहिये। ऐसा
प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः | करनेसे ही बहुतोंका अनुरोध युक्त
तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणन- | (स्वीकार) किया समझा जायगा।
सामर्थ्यम्। न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य | इसके सिवा, पूछी हुई वस्तुका
प्राणनमुपपद्यते, "को ह्येवान्यात्कः | निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही करना
उचित है। [अभिप्राय यह कि]
जिसके विषयमें तूने पूछा है वह
प्राणका यानी प्राण नामक वृत्ति-
विशेषका प्राण है। उसके कारण
ही प्राणका प्राणनसामर्थ्य है, क्यों-
कि आत्मासे अनधिष्ठित प्राणका
प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि
वाक्य-भाष्य
ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया। | ज्ञेय है, इसलिये उसमें कर्मत्व रहनेके
अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य | कारण द्वितीया भी ठीक है। अतः 'वाचो
प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्ति- | ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस
द्वयम्। | कथनके अनुसार सभी जगह दो
विभक्ति समझनी चाहिये। [अर्थात्
सभी पदोंमें ये दोनों विभक्तियाँ रह
सकती हैं।]