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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९
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पद-भाष्य
कर्मसहितादपि ज्ञानादेतत् सिध्यतीति चेत् ? | पूर्व०-यह बात तो कर्मसहित ज्ञानसे भी सिद्ध हो सकती है न ?
न; वाजसनेयके तस्यान्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वाजसनेय (बृहदारण्यक) श्रुतिमें उस (कर्मसहित ज्ञान) को अन्य फलका कारण बतलाया है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो” इस प्रकार आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें “यह लोक पुत्रद्वारा प्राप्त किया जा सकता है और किसी कर्मसे नहीं; कर्मसे पितृलोक मिलता है और विद्या (उपासना) से देवलोक” इस प्रकार उसे आत्मासे भिन्न लोकत्रय-का ही कारण बतलाया है।
समुच्चयवाद-खण्डनम् कारणत्ववचनात् । “जाया मे स्यात्” (बृ० उ० १।४।१७) इति प्रस्तुत्य “पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १।५।१६) इत्यात्मनोऽन्यस्य लोकत्रयस्य कारणत्वमुक्तं वाजसनेयके ।
वाक्य-भाष्य
“त्यागेनैके०” (कै० उ० १।२) “नान्यः पन्था विद्यते०” (श्वे० उ० ३।८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | [अमरत्व प्राप्त किया]” तथा “[इसके सिवा] और कोई मार्ग नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे भी सिद्ध होता है ।
न्यायाच्च; उपायभूतानि हि कर्माणि संस्कारद्वारेण ज्ञानस्य । ज्ञानेन त्वमृतत्वप्राप्तिः, “अमृतत्वं हि विन्दते” (के० उ० २।४) “विद्यया विन्दतेऽमृतम्” (के० उ० २।४) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च । न हि नद्याः पारगो नावं | युक्तिसे भी [कर्म ज्ञानके साक्षात् साधन नहीं हैं।] कर्म तो चित्तशुद्धिके द्वारा ज्ञानके साधन हैं। अमृतत्वकी प्राप्ति तो ज्ञानसे ही होती है जैसा कि “[ज्ञानसे] अमृतत्व ही प्राप्त कर लेता है” “विद्यासे अमृतको पा लेता है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है। जो मनुष्य नदीके पार पहुँच गया है वह अपने अभीष्ट