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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९

पद-भाष्य
ज्योतिरात्मा ब्रह्मेत्ययमर्थः सर्व- | मय आत्मा ही ब्रह्म है—यह अर्थ
बोधबोद्धृत्वे आत्मनः सिध्यति, | आत्माके सम्पूर्ण बोधोंके बोद्धा
नान्यथा । तस्मात् 'प्रतिबोध- | होनेपर ही सिद्ध हो सकता है,
विदितं मतम्' इति यथा- | और किसी प्रकार नहीं । इसलिये
व्याख्यात एवार्थोऽस्माभिः । | 'प्रतिबोधविदितम्' इसका—हमने
यत्पुनः स्वसंवेद्यता प्रतिबोध- | जैसी व्याख्या की है—वही अर्थ है ।
[ब्रह्मणः स्वपर-] विदितमित्यस्य वाक्य- | इसके सिवा 'प्रतिबोधविदितम्'
[संवेद्यताया] स्यार्थो वर्ण्यते, तत्र | इस वाक्यका जो स्वप्रकाशता अर्थ
[औपाधिकत्वम्] भवति सोपाधिकत्वे | बतलाया जाता है वहाँ आत्माको
आत्मनो बुद्ध्युपाधिरूपत्वेन | सोपाधिक मानकर उसमें बुद्धि
भेदं परिकल्प्यात्मात्मानं वेत्तीति | आदि उपाधिके रूपसे भेदकी
संव्यवहारः—"आत्मन्येवात्मानं | कल्पना कर 'आत्मासे आत्माको
पश्यति"(बृ० उ० ४।४।२३) | जानता है' ऐसा व्यवहार हुआ
“स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं | करता है, जैसा कि "आत्मामें ही
पुरुषोत्तम” (गीता १०।१५) | आत्माको देखता है" "हे पुरुषोत्तम !
इति । न तु निरुपाधिकस्यात्मन | तुम स्वयं अपनेसे ही अपनेको
एकत्वे स्वसंवेद्यता परसंवेद्यता | जानते हो" इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा
वा सम्भवति । संवेदनस्वरूप- | गया है । किन्तु निरुपाधिक आत्मा
| तो एक रूप होनेके कारण उसमें
| स्वसंवेद्यता अथवा परसंवेद्यता
| सम्भव ही नहीं है । जिस प्रकार
वाक्य-भाष्य
वीर्यं सामर्थ्यमनात्माध्यारोप- | विद्यासे वीर्य—सामर्थ्य यानी
मायास्वान्तध्वान्तानभिभाव्य- | अनात्माके अध्यारोप तथा माया और
लक्षणं बलं विद्यया विन्दते । तच्च | अन्तःकरणके कारण प्राप्त हुए अज्ञानसे
किंवैशिष्टम् ? अमृतमविनाशि । | जिसका पराभव नहीं हो सकता ऐसा
| बल प्राप्त होता है । वह किस विशेषणसे
| युक्त है? वह अमृत यानी अविनाशी है।

८० केनोपनिषद् [ खण्ड २


पद-भाष्य

संस्कृत (पद-भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
त्वात्स‌ंवेदनान्तरापेक्षा च नप्रकाशको किसी अन्य प्रकाशकी
सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रका-अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी
शान्तरापेक्षाया न सम्भवः तद्वत् ।प्रकार ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे [ अपने ज्ञानके लिये ] किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है।
बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तुतथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञानकी
क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं चस्वसंवेद्यता स्वीकार करनेपर भी उसकी
विज्ञानस्य स्यात्; “न हि विज्ञातु-क्षणभङ्गुरता और निरात्मकता सिद्ध
र्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽवि-होने लगेगी । [ ऐसा होनेपर ]
नाशित्वात्” (बृ० उ० ४।३।३०)“अविनाशी होनेके कारण विज्ञाताकी
“नित्यं विभुं सर्वगतम्” (मु०विज्ञातिका लोप नहीं होता”
उ० १ । १ । ६) “स वा एष“नित्य विभु और सर्वगत है” “वह
महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽ-यह महान् अज आत्मा अजर अमर
भयः” (बृ० उ० ४।४।२५)अमृत और अभयरूप है” इत्यादि
इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् ।श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी ।
यत्पुनः प्रतिबोधशब्देनइसके सिवा जो लोग प्रति-
प्रतिबोधार्थ- निर्निमित्तो बोधः प्रति-बोधशब्दसे, जैसा कि सुषुप्त पुरुषको
विचारः बोधः यथा सुप्तस्यहोता है वह निर्निमित्त बोध ही
इत्यर्थं परिकल्पयन्ति, सकृद्वि-प्रतिबोध है—ऐसे अर्थकी कल्पना करते हैं अथवा जो दूसरे लोग

वाक्य-भाष्य

संस्कृत (वाक्य-भाष्य)हिन्दी-अनुवाद
अविद्याजं हि वीर्यं विनाशि।अविद्यासे होनेवाला बल नाशवान्
विद्ययाविद्याया बाध्यत्वात् । नहोता है, क्योंकि अविद्या विद्यासे बाधित
तु विद्याया बाधकोऽस्तीतिहो जाती है। किन्तु विद्याका बाधक
विद्याजममृतं वीर्यम् । अतोऔर कोई नहीं है, अतः विद्याजनित
विद्यामृतत्वे निमित्तमात्रं भवति।वीर्य अमृत होता है। इसलिये विद्या तो अमृतत्वमें केवल निमित्तमात्र होती
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”है। आथर्वण श्रुतिमें भी कहा है—"यह
इति चाथर्वणे (मु० उ० ३।२।४)आत्मा बलहीनसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है"।