केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context९६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
मर्हति; सेवादिकर्मानुरूपफलज्ञ- | सकता है, जैसे कि सेवा आदि कर्मोंका
सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलस्येव । | फल उसके अनुरूप फलको जाननेवाले
तस्मात्सिद्धः सर्वज्ञ ईश्वरः सर्व- | सेव्यकी बुद्धिपर हुए संस्कारकी
जन्तुबुद्धिकर्मफलविभागसाक्षी | अपेक्षासे मिलता है। इससे सम्पूर्ण
सर्वभूतान्तरात्मा । "यत्साक्षा- | जीवोंकी बुद्धि कर्म और फलके
दपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वा- | विभागका साक्षी, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ
न्तरः" (बृ० उ० ३ । ४ । १) | ईश्वर सिद्ध हुआ। "जो साक्षात्
इति श्रुतेः । | अपरोक्ष ब्रह्म है जो सर्वान्तर आत्मा
| है" इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित
| होता है।
स एव चात्रात्मा जन्तूनां | और वही इस सृष्टिमें जीवोंका
[ईश्वरस्य सर्वात्म्य-स्थापनम्] नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता “नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ” (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्याद्यात्मान्तरप्रतिषेधश्रुतेः । "तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८+१६) इति चात्मत्वोपदेशात् । न हि मृत्पिण्डः काञ्चनात्मत्वेनोपदिश्यते । | आत्मा है। उससे भिन्न और कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता अथवा विज्ञाता नहीं है, जैसा कि "इससे भिन्न और कोई विज्ञाता नहीं है" इत्यादि भिन्न आत्माका प्रतिषेध करनेवाली श्रुतिसे, तथा "तत्त्वमसि” इस महावाक्यद्वारा ब्रह्मका आत्मत्व उपदेश करनेसे सिद्ध होता है। मिट्टीके ढेलेका सुवर्णरूपसे कभी उपदेश नहीं किया जाता।
ज्ञानशक्तिकर्मोपास्योपासक- | यदि कहो कि ज्ञान, शक्ति, कर्म,
शुद्धाशुद्धमुक्तामुक्तभेदादात्मभेद | उपास्य-उपासक, शुद्ध-अशुद्ध तथा मुक्त-
एवेति चेन्न। भेददृष्ट्यपवादात् । | अमुक्त इत्यादि भेदोंके कारण आत्माका
| भेद ही है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं,
| क्योंकि भेददृष्टिकी निन्दा की गयी है।