केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
पद-भाष्य
लक्षणाद्व्याकृतबीजात्, अधि | अव्याकृतसे भी 'अधि' है।"'अधि' का
इति उपर्येर्थे, लक्षणया अन्यद् | अर्थ ऊपर होता है; परन्तु लक्षणासे
इत्यर्थः । यद्धि यस्मादधि उपरि | इसका अर्थ 'अन्य' करना चाहिये, क्योंकि जो वस्तु जिससे अधि—
भवति, तत्तस्मादन्यदिति | ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ
प्रसिद्धम् । | करती है—यह प्रसिद्ध ही है ।
वाक्य-भाष्य
प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि | तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि प्रकाशमें
प्रदीपस्य स्वरूपाभिव्यक्तौ प्रदोप- | कोई विशेषता नहीं हुआ करती। एक दीपकके स्वरूपकी अभिव्यक्तिमें किसी
प्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्म- | अन्य दीपकका प्रकाश सार्थक नहीं
नोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति येन | होता। इसी प्रकार आत्मासे भिन्न ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके
स्वरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत । | स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपेक्षित हो ।
विरोध इति चेन्नान्यत्वात् । | यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत
स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् | होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [ आत्मा ] इससे भिन्न है ।
विज्ञानान्तरं नापेक्षत इत्येतदसत् । | पूर्व०-तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके
दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि | स्वरूपको जाननेमें किसी अन्य विज्ञान-
सम्यग्ज्ञानं च । न जानाम्यात्मा- | की अपेक्षा नहीं है—सो ठीक नहीं, क्योंकि आत्मामें भी विपरीत ज्ञान
नमिति । श्रुतेश्च “तत्त्वमसि” | और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता
(छा० उ० ६।८-१६) "आत्मा- | है; जैसा कि "मैं आत्माको नहीं जानता" इत्यादि कथनसे तथा "तू वह
नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) | (ब्रह्म) है" "आत्माको ही जाना"
३८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
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पद-भाष्य
यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं दुःखा- | जो वस्तु विदित होती है वह
[ब्रह्मण] त्मकं चेति हेयम् । | अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती
[आत्मभिन्नत्व-] तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म | है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है ।
[प्रतिपादनम्] इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है—
स्यात् । तथा अविदितादधि | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व
इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्तं स्यात् । | बतलाया गया । तथा ‘वह अविदित-
| से भी ऊपर है' ऐसा कहनेपर उसका
| अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया ।
वाक्य-भाष्य
“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” | “उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान-
(बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । | कर” आदि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- | श्रुतियोंमें आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र
नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् | ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती
प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । | है । इसलिये [ उपर्युक्त कथनका ]
न; कस्मात् ? अन्यो हि स | प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है ।
आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घा- | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं ।
ताभिमानसन्तानाविच्छेद लक्षणो- | क्यों ? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और
ऽविवेकात्मको बुद्धयवभासप्रधानः | करणके संघातमें जो अभिमान है उसकी
चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरू- | परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका
पात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् | लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही
अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम् आ- | जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें
विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- | अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ
तयैव विलक्षणमपि चावभासते । | करता है यह अविवेकात्मक, चिदाभास-
| प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला
| आत्मा ( जीवात्मा ) [ शुद्ध चेतनसे ]
| भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोंका
| आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है;
| अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस-
| से पृथक् दिखलायी भी देता है ।