केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Kena Upanishad (केनोपनिषद्) belongs to the Talavakara (Jaiminiya) Brahmana of the Samaveda and takes its name from its first word, kena, 'by whom?'. Its first two sections describe Brahman as what moves the mind, speech, breath and senses while remaining beyond their reach. The last two tell the parable of the yaksha: Agni, Vayu and Indra, proud of their powers, cannot burn or blow away a single blade of grass before a mysterious being, until Uma Haimavati reveals to Indra that it was Brahman.
This Gita Press, Gorakhpur edition (No. 68) is notable for including both of Shankaracharya's commentaries on the text, the word-by-word pada-bhashya and the argumentative vakya-bhashya, each with Hindi translation. The publisher's note explains that Shankara wrote the second to bring out the meaning through reasoning. Mantra, meaning, Sanskrit commentary and its translation are set side by side, and an index of mantras closes the volume.
The imprint records over 132,000 copies printed from Samvat 1992 onward; this is the twentieth edition of Samvat 2053.
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
40
॥ श्रीहरिः ॥ 68
केनोपनिषद्
B. K. Mitra
गीताप्रेस, गोरखपुर
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068
॥ ॐ ॥
केनोपनिषद्
सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित
[ पद-भाष्य एवं वाक्य-भाष्य ]
गीताप्रेस, गोरखपुर
प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १९९२ से २०५२ तक १,२७,२५०
सं० २०५३ बीसवाँ संस्करण ५,०००
योग १,३२,२५०
मूल्य—सात रुपये
मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
दूरभाष—३३४७२१
केनोपनिषद् सामवेदीय तलवकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है।
निवेदन
—*—
केनोपनिषद् सामवेदीय तलवकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है।
इसमें आरम्भसे लेकर अन्तपर्यन्त सर्वप्रेरक प्रभुके ही स्वरूप और
प्रभावका वर्णन किया गया है। पहले दो खण्डोंमें सर्वाधिष्ठान परब्रह्मके
पारमार्थिक स्वरूपका लक्षणासे निर्देश करते हुए परमार्थज्ञानकी
अनिर्वचनीयता तथा ज्ञेयके साथ उसका अभेद प्रदर्शित किया है।
इसके पश्चात् तीसरे और चौथे खण्डमें यक्षोपाख्यानद्वारा भगवान्का
सर्वप्रेरकत्व और सर्वकर्तृत्व दिखलाया गया है। इसकी वर्णनशैली बड़ी
ही उदात्त और गम्भीर है। मन्त्रोंके पाठमात्रसे ही हृदय एक अपूर्व
मस्तीका अनुभव करने लगता है। भगवती श्रुतिकी महिमा अथवा वर्णन-
शैलीके सम्बन्धमें कुछ भी कहना सूर्यको दीपक दिखाना है।
इस उपनिषद्का विशेष महत्त्व तो इसीसे प्रकट होता है कि
भगवान् भाष्यकारने इसपर दो भाष्य रचे हैं। एक ही ग्रन्थपर एक ही
सिद्धान्तकी स्थापना करते हुए एक ही ग्रन्थकारद्वारा दो टीकाएँ लिखी
गयी हों—ऐसा प्रायः देखा नहीं जाता। यहाँ यह शङ्का होती है कि ऐसा
करनेकी उन्हें क्यों आवश्यकता हुई? वाक्य-भाष्यपर टीका आरम्भ करते
हुए श्रीआनन्दगिरि स्वामी कहते हैं—'केनेषितामित्यादिकां सामवेदशाखा-
भेदब्राह्मणोपनिषदं पदशो व्याख्यायापि न तुतोष भगवान् भाष्यकारः
शारीरकैर्न्यायैरनिर्णीतार्थत्वादिति न्यायप्रधानश्रुत्यर्थसंग्राहकैर्वाक्यैर्व्या-
चिख्यासुः…………………' अर्थात् 'केनेषितं' इत्यादि सामवेदीय शाखान्तर्गत
ब्राह्मणोपनिषद्की पदशः व्याख्या करके भी भगवान् भाष्यकार सन्तुष्ट नहीं
हुए, क्योंकि उसमें उसके अर्थका शारीरकशास्त्रानुकूल युक्तियोंसे निर्णय
नहीं किया गया था, अतः अब श्रुत्यर्थका निरूपण करनेवाले न्यायप्रधान
वाक्योंसे व्याख्या करनेकी इच्छासे आरम्भ करते हैं।
तहाँ और विशेषतया तृतीय खण्डके आरम्भमें युक्ति-प्रयुक्तियोंद्वारा
( २ )
इस उद्धरणसे सिद्ध होता है कि भगवान् भाष्यकारने पहले पद-
भाष्यकी रचना की थी। उसमें उपनिषदर्थकी पदशः व्याख्या तो हो
गयी थी; परन्तु युक्तिप्रधान वाक्योंसे उसके तात्पर्यका विवेचन नहीं
हुआ था। इसीलिये उन्हें वाक्य-भाष्य लिखनेकी आवश्यकता हुई।
पद-भाष्यकी रचना अन्य भाष्योंके ही समान है। वाक्य-भाष्यमें जहाँ-
तहाँ और विशेषतया तृतीय खण्डके आरम्भमें युक्ति-प्रयुक्तियोंद्वारा
परमतका खण्डन और स्वमतका स्थापन किया गया है। ऐसे स्थानोंमें
भाष्यकारकी यह शैली रही है कि पहले शङ्का और उसके उत्तरको एक
सूत्रसदृश वाक्यसे कह देते हैं और फिर उसका विस्तार करते हैं; जैसे
प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ठ ३ पर 'कर्मविषये चानुक्तिः तद्विरोधित्वात्' ऐसा
कहकर फिर 'अस्य विजिज्ञासितव्यस्यात्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम्'
इत्यादि ग्रन्थसे इसीकी व्याख्या की गयी है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पद-भाष्यमें प्रधानतया मूलकी पदशः
व्याख्या की गयी है और वाक्य-भाष्यमें उसपर विशेष ध्यान न देकर
विषयका युक्तियुक्त विवेचन करनेकी चेष्टा की गयी है। अँग्रेजी और
बँगलामें जो उपनिषद्-भाष्यके अनुवाद प्रकाशित हुए हैं उनमें केवल
पद-भाष्यका ही अनुवाद किया गया है, पण्डितवर श्रीपीताम्बरजीने जो
हिन्दी-अनुवाद किया था उसमें भी केवल पद-भाष्य ही लिया गया था।
मराठी-भाषान्तरकार परलोकवासी पूज्यपाद पं० श्रीविष्णुवापट शास्त्रीने
केवल वाक्य-भाष्यका अनुवाद किया है। हमें तो दोनों ही उपयोगी
प्रतीत हुए; इसलिये दोनोंहीका अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है।
अनुवादोंकी छपाईमें जो क्रम रक्खा गया है उससे उन दोनोंको
तुलनात्मक दृष्टिसे पढ़नेमें बहुत सुभीता रहेगा। आशा है, हमारा यह
अनधिकृत प्रयास पाठकोंको कुछ रुचिकर हो सकेगा।
विनीत,
अनुवादक
प्रथम खण्ड
श्रीहरिः
विषय-सूची
—***—
विषय पृष्ठ
१. शान्तिपाठ ... ... १
प्रथम खण्ड
२. सम्बन्ध-भाष्य ... ... २
३. प्रेरकविषयक प्रश्न ... ... १४
४. आत्माका सर्वनियन्तृत्व ... ... २०
५. आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व ... ... ३१
६. ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है ... ... ४५
द्वितीय खण्ड
७. ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता ... ... ५४
८. अनुभूतिका उल्लेख ... ... ६३
९. ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है ... ... ६८
१०. विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति ... ... ७३
११. आत्मज्ञान हीं सार है ... ... ८४
तृतीय खण्ड
यक्षोपाख्यान ... ... ८७
१२. देवताओंका गर्व ... ... १०४
१३. यक्षका प्रादुर्भाव ... ... १०५
१४. अग्निकी परीक्षा ... ... १०९
१५. वायुकी परीक्षा ... ... ११२
१६. इन्द्रकी निवृत्ति ... ... ११४
१७. उमाका प्रादुर्भाव ... ... ११५
चतुर्थ खण्ड
( २ )
चतुर्थ खण्ड
१८. उमाका उपदेश ... ... ११७
१९. ब्रह्मविषयक अधिदैव आदेश ... ... १२०
२०. ब्रह्मविषयक अध्यात्म आदेश ... ... १२३
२१. वन-संज्ञक ब्रह्मकी उपासनाका फल ... ... १२६
२२. उपसंहार ... ... १२८
२३. विद्याप्राप्तिके साधन ... ... १३३
२४. ग्रन्थावगाहनका फल ... ... १३७
२५. शान्तिपाठ ... ... १३९
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
केनोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
येनेरिताः प्रवर्तन्ते प्राणिनः स्वेषु कर्मसु ।
तं वन्दे परमात्मानं स्वात्मानं सर्वदेहिनाम् ॥
यस्य पादांशुसम्भूतं विश्वं भाति चराचरम् ।
पूर्णानन्दं गुरुं वन्दे तं पूर्णानन्दविग्रहम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बल-
मिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां
मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि
निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
मेरे अङ्ग पुष्ट हों तथा मेरे वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और सम्पूर्ण
इन्द्रियाँ पुष्ट हों । यह सब उपनिषद्देय ब्रह्म है । मैं ब्रह्मका निराकरण
न करूँ । ब्रह्म मेरा निराकरण न करे [ अर्थात् मैं ब्रह्मसे विमुख न
होऊँ और ब्रह्म मेरा परित्याग न करे ] इस प्रकार हमारा परस्पर
अनिराकरण हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें जो धर्म हैं वे आत्मा
( आत्मज्ञान ) में लगे हुए मुझमें हों, वे मुझमें हों । त्रिविध तापकी
शान्ति हो ।
२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध-भाष्य
पद-भाष्य
उपक्रमणिका | 'केनेषितम्' इत्याद्योपनिषत् | अब 'केनेषितम्' इत्यादि पर-
परब्रह्मविषया वक्तव्या | ब्रह्मविषयक उपनिषत् कहनी है
इति नवमस्याध्यायस्य | इसलिये इस नवम अध्यायका *
आरम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माणि | आरम्भ किया जाता है । इससे
पूर्व सम्पूर्ण कर्मोंके प्रतिपादनकी
अशेषतः परिसमापितानि, समस्त- | सम्यक्रूपसे समाप्ति की गयी है,
तथा समस्त कर्मोंके आश्रयभूत
कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासना- | प्राणकी उपासना एवं कर्मकी अङ्गभूत
न्युक्तानि, कर्माङ्गसामविषयाणि | सामोपासनाका वर्णन किया गया
है । उसके पश्चात् जो गायत्रसाम-
वाक्य-भाष्य
उपक्रमणिका | समाप्तं कर्मात्मभूतप्राणविषयं | इससे पूर्व-ग्रन्थमें कर्मोंके आश्रयभूत
प्राणविज्ञान तथा अनेक प्रकारके कर्मका
विज्ञानं कर्म चानेक- | निरूपण समाप्त हुआ, जिनके विकल्प¹
प्रकारम्, ययोर्विकल्प- | और समुच्चय²के अनुष्ठानसे दक्षिण
समुच्चयानुष्ठानाद्दक्षिणोत्तराभ्यां | और उत्तर मार्गोंद्वारा क्रमशः आवृत्ति
( आवागमन ) और अनावृत्ति
सृतिभ्यामावृत्त्यनावृत्ती भवतः । | (क्रममुक्ति) हुआ करती हैं। इसके आगे
अत ऊर्ध्वं फलनिरपेक्षज्ञानकर्म- | देवता-ज्ञान और कर्मोंके समुच्चयका
निष्काम भावसे अनुष्ठान करनेसे
समुच्चयानुष्ठानात्कृतात्मसंस्कार- | जिसने अपना चित्त शुद्ध कर लिया है,
स्योच्छिन्नात्मज्ञानप्रतिबन्धकस्य | जिसका आत्मज्ञानका प्रतिबन्धकरूप
- यह उपनिषद् सामवेदीय तलवकार शाखाका नवम अध्याय है ।
१. दोनोंमेंसे केवल एक । २. एक साथ दोनों ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
पद-भाष्य
च । अनन्तरं च गायत्रसाम- | विषयक विचार और शिष्यपरम्परा-
रूप वंशके वर्णनमें समाप्त होनेवाले
विषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तं कार्यम्। | ग्रन्थसे कहा गया है वह कार्यरूप
वस्तुका ही वर्णन है ।
सर्वमेतद्यथोक्तं कर्म च ज्ञानं | ऊपर बतलाया हुआ यह
सम्पूर्ण कर्म और ज्ञान सम्यक्
च सम्यगनुष्ठितं निष्कामस्य | प्रकारसे सम्पादन किये जानेपर
निष्काम मुमुक्षुकी तो चित्त-
मुमुक्षोः सत्त्वशुद्ध्यर्थं भवति । | शुद्धिके कारण होते हैं। तथा
वाक्य-भाष्य
द्वैतविषयदोषदर्शिनो निर्ज्ञाताशेष- | दोष नष्ट हो गया है, जो द्वैतविषयमें
दोष देखने लगा है तथा सम्पूर्ण बाह्य
वाह्यविषयत्वात्संसारवीजमज्ञान- | विषयोंका तत्त्व जान लेनेके कारण जो
मुच्छिच्छित्सतः प्रत्यगात्मविषय- | संसारके बीजस्वरूप अज्ञानका उच्छेद
करना चाहता है, उस आत्मतत्त्वके
जिज्ञासोः केनेषितमित्यात्म- | जिज्ञासुको आत्मस्वरूपके तत्त्वका ज्ञान
स्वरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय | करानेके लिये 'केनेषितम्' आदि
मन्त्रसे यह (नवाँ) अध्याय आरम्भ
आरभ्यते । तेन च मृत्युपदम् | किया जाता है। उस आत्मतत्त्वके
अज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि | ज्ञानसे ही मृत्युके कारणरूप अज्ञानका
उच्छेद करना चाहिये, क्योंकि यह
संसारो यतः। अनधिगतत्वाद् | संसार अज्ञानमूलक ही है। आत्मतत्त्व
अज्ञात है, इसलिये उसका ज्ञान प्राप्त
आत्मनो युक्ता तदधिगमाय | करनेके लिये आत्मविषयक जिज्ञासा
तद्विषया जिज्ञासा । | उचित ही है।
कर्मविषये चानुक्तिः; तद्वि- | कर्मकाण्डमें आत्मतत्त्वका निरूपण
नहीं किया गया क्योंकि यह उसका
[ज्ञानकर्मविरोधः] रोधित्वात् । अस्य | विरोधी है। इस विशेषरूपसे जानने-
विजिज्ञासितव्यस्य | योग्य आत्मतत्त्वका कर्मकाण्डमें
आत्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम् । | विवेचन नहीं किया जाता। यदि कहो
४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
सकामस्य तु ज्ञानरहितस्य केव- | ज्ञानरहित सकाम साधकके केवल
लानि श्रौतानि स्मार्तानि च | श्रौत और स्मार्त कर्म दक्षिण
कर्माणि दक्षिणमार्गप्रतिपत्तये | मार्गकी प्राप्ति और पुनरावर्तनके
पुनरावृत्तये च भवन्ति । स्वाभा- | हेतु होते हैं । इनके सिवा
विक्या त्वशास्त्रीयया प्रवृत्त्या | अशास्त्रीय स्वच्छन्द वृत्तिसे तो पशु-
पश्चादिस्थावरान्ता अधोगतिः | से लेकर स्थावरपर्यन्त अधोगति ही
स्यात् । “अथैतयोः पथोर्न कतरेण | होती है । “ये [ स्वच्छन्द प्रवृत्ति-
च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदा- | वाले जीव उत्तरायण और
वर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व | दक्षिणायन ] इन दोनोंमेंसे किसी
म्रियस्वेत्येतत्तृतीयँ स्थानम्” | मार्गसे नहीं जाते; वे निरन्तर
(छा० उ० ५।१०।८) इतिश्रुतेः; | आवर्तन करनेवाले क्षुद्र जीव होते
| हैं; उनका ‘जन्म लो और मरो’
| यह तीसरा स्थान (मार्ग) है”
वाक्य-भाष्य
कस्मादिति चेदात्मनो हि यथा- | कि क्यों ? तो उसका कारण यह है कि
वद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । | आत्माका यथार्थ ज्ञान कर्मका विरोधी
निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा | है, क्योंकि जिसका ज्ञान कराना अभीष्ट
विजिज्ञापयिषितः, “तदेव ब्रह्म | है वह आत्मा तो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप
त्वं विद्धि नेदं यदिदम् ०” | ही है, जैसा कि “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि
(के० उ० १।४) इत्यादि श्रुतेः । | नेदं यदिदमुपासते” इत्यादि श्रुतिका
न हि स्वराज्येऽभिषिक्तो ब्रह्मत्वं | कथन है । जो पुरुष स्वाराज्यपर
गमितः कश्चन नमितुमिच्छत्यतो | अभिषिक्त होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो
ब्रह्मास्मीति सम्बुद्धो न कर्म | गया है वह किसीके भी सामने झुकने-
कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् | की इच्छा नहीं करता । अतः जिसने
अवाप्तार्थं ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्तिं | यह जान लिया है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’
प्रयोजनवतीं पश्यति । न च | उससे कर्म नहीं कराया जा सकता ।
| अपने आत्माको आप्तकाम ब्रह्म मानने-
| वाला पुरुष किसी भी प्रवृत्तिको
| प्रयोजनवती नहीं देखता और कोई भी
मन्त्रवर्णात् । | मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ] ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
पद-भाष्य
“प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः” | इस श्रुतिसे और “तीन प्रसिद्ध
(ऐ० आ० २।१।१।४) इति च | प्रजाओंने धर्मत्याग किया" इस
मन्त्रवर्णात् । | मन्त्रवर्णसे भी [ यही बात सिद्ध होती है ] ।
विशुद्धसत्त्वस्य तु निष्कामस्य | जो इस जन्म और पूर्व जन्ममें
ज्ञानाधिकारि- एव बाह्यादनित्यात् | किये हुए कर्मोंके संस्कारविशेषसे
निरूपणम् साध्यसाधनसम्बन्धाद् | उद्भूत बाह्य एवं अनित्य साध्य-
इह कृतात्पूर्वकृताद्वा संस्कार- | साधनके सम्बन्धसे विरक्त हो गया
विशेषोद्भावाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | है उस विशुद्धचित्त निष्काम पुरुष-
विषया जिज्ञासा प्रवर्तते । | को ही प्रत्यगात्मविषयक जिज्ञासा हो सकती है । यही बात
तदेतद्वस्तु प्रश्नप्रतिवचनलक्षण्या | 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्नोत्तररूपा
वाक्य-भाष्य
निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतो विरुध्यत | प्रवृत्ति बिना प्रयोजनके हो नहीं
एव कर्मणा ज्ञानम् । अतः कर्म- | सकती, अतः कर्मसे ज्ञानका विरोध
विषयेऽनुक्तिः,विज्ञानविशेषविषया | है ही। इसीलिये कर्मकाण्डमें आत्म-
एव जिज्ञासा । | ज्ञानका उल्लेख नहीं है; अर्थात् जिज्ञासा किसी विज्ञानविशेषके सम्बन्धमें ही होती है।
कर्मानारम्भ इति चेन्न; | यदि कहो कि तब तो कर्मका
निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात् । | आरम्भ ही न किया जाय तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि निष्काम कर्म पुरुषका संस्कार करनेवाला है ।
यदि ह्यात्मविज्ञानेनात्माविद्या- | पूर्व०-यदि आत्माके अज्ञानका
विषयत्वात्परितित्याजायिषितं कर्म | कारण होनेसे आत्मज्ञानद्वारा कर्मका परित्याग कराना ही अभीष्ट है तो
ततः "प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूराद- | "कीचड़को धोनेकी अपेक्षा तो उसे
स्पर्शनं वरम्” (म० वन०२।४९) | दूरसे न छूना ही अच्छा है" इस
६ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ केनोपनिषद् $\qquad\qquad\qquad\qquad$ [ खण्ड १
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का यथार्थ पाठ (Transcription) दिया गया है:
६ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ केनोपनिषद् $\qquad\qquad\qquad\qquad$ [ खण्ड १
पद-भाष्य
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्या प्रदर्श्यते 'केनेषितम्' | श्रुतिद्वारा दिखलायी जाती है। |
| इत्याद्यया । काठके चोक्तम् | कठोपनिषद्में तो कहा है— |
| “पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू- | “स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको |
| स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्त- | बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया |
| रात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मा- | है; इसलिये इन्द्रियाँ बाहरकी ओर |
| नमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्” | ही देखती हैं, अन्तरात्माको नहीं |
| (क०उ० २।१।१) इत्यादि । | देखतीं; किसी-किसी बुद्धिमान्ने |
| “परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो | ही अमरत्वकी इच्छा करते हुए |
| अपनी इन्द्रियोंको रोककर | |
| प्रत्यगात्माका साक्षात्कार किया है” | |
| इत्यादि । तथा अथर्ववेदीय (मुण्डक) | |
| उपनिषद्में भी कहा है—“ब्रह्मनिष्ठ | |
| पुरुष कर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्यनारम्भ एव कर्मणः श्रेयान् । | उक्तिके अनुसार कर्मको आरम्भ न |
| अल्पफलत्वादायासबहुलत्वात् | करना ही उत्तम है क्योंकि वह अल्प |
| तत्त्वज्ञानादेव च श्रेयःप्राप्तेः | फलवाला और अधिक परिश्रमवाला |
| इति चेत् । | है तथा आत्यन्तिक कल्याण तत्त्व- |
| विज्ञानसे ही होता है। |
| (पार्श्व-टिप्पणी) | संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|---|
| सत्यम्; एतदविद्याविषयं | सिद्धान्ती-ठीक है, परन्तु यह | |
| चित्तशुद्धये | कर्माल्पफलत्वादि- | अविद्यामूलक कर्म “जो भोगोंकी |
| कर्मावश्यकम् | दोषवद्बन्धरूपं च | कामना करता है” तथा “इस प्रकार |
| प्राप्तज्ञानस्य तु | सकामस्य “कामान् | जो कामना करनेवाला है” इत्यादि |
| तदनारम्भः | यः कामयते” (मु०उ० | श्रुतियोंके अनुसार सकाम पुरुषके लिये |
| ३।२।२) “इति नु कामयमानः” | ही अल्पफलत्वादि दोषोंसे युक्त तथा | |
| इत्यादिश्रुतिभ्यः; न निष्कामस्य । | बन्धनकारक है; निष्काम पुरुषके लिये | |
| तस्य तु संस्कारार्थान्येव कर्माणि | नहीं। उसके लिये तो कर्म अपने | |
| निर्वर्तक (निष्पन्न करनेवाले) और | ||
| आश्रयभूत प्राणोंके विज्ञानके सहित |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
पद-भाष्य
निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । | लोकोंकी परीक्षा कर वैराग्यको प्राप्त
| हो जाय, क्योंकि कृत (कर्म) के
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् | द्वारा अकृत (नित्यस्वरूप मोक्ष)
| प्राप्त नहीं हो सकता । उसका
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्” | विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो
(मु० उ० १ । २ । १२) | उस (जिज्ञासु) को हाथमें समिधा
| लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही
इत्याद्याथर्वणे च । | पास जाना चाहिये” इत्यादि ।
एवं हि विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | केवल इस प्रकारसे ही विरक्त
(निवृत्ताज्ञानस्य) विषयं विज्ञानं श्रोतुं | पुरुषको प्रत्यगात्मविषयक विज्ञानके
(कृतकृत्यता-) मन्तुं विज्ञातुं च | श्रवण, मनन और साक्षात्कारकी
(प्रदर्शनम्) सामर्थ्यमुपपद्यते, | क्षमता हो सकती है, और किसी
नान्यथा । एतस्माच्च प्रत्यगात्म- | तरह नहीं । इस प्रत्यगात्माके
वाक्य-भाष्य
भवन्ति तन्निर्वर्तकाश्रयप्राण- | संस्कारके ही कारण होते हैं। “देवयाजी
विज्ञानसहितानि । “देवयाजी | श्रेष्ठ हैं या आत्मयाजी” इस प्रकार
श्रेयानात्मयाजी वा” इत्युपक्र- | आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें कहा
म्यात्मयाजी तु करोति “इदं | है कि आत्मयाजी अपने संस्कारके
मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते इति” संस्का- | लिये ही यह समझकर कर्म करता है
रार्थमेव कर्माणीति वाजसनेयके। | कि “इससे मेरे इस अंगका संस्कार
“महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं | होगा” । “यह शरीर महायज्ञ और
क्रियते तनुः” (मनु० २ । २८) | यज्ञोंद्वारा ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके योग्य
“यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि | किया जाता है।” “यज्ञ, दान और तप-
मनीषिणाम्” (गीता १८ । ५) | ये विद्वानोंको पवित्र करनेवाले ही हैं”
इत्यादि स्मृतेश्च । | इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध
| होती है ।
प्राणादिविज्ञानं च केवलं कर्म- | अकेला या कर्मके साथ मिला हुआ
समुच्चितं वा सकामस्य प्राणात्म- | होनेपर भी प्राणादि विज्ञान सकाम
८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
────────────────────────────────────────────────────
पद-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ब्रह्मविज्ञानात्संसारबीजमज्ञानं | ब्रह्मतत्त्वविज्ञानसे ही कामना और |
| कामकर्मप्रवृत्तिकारणमशेषतो | कर्मकी प्रवृत्तिका कारण तथा |
| निवर्तते, “तत्र को मोहः कः | संसारका बीजभूत अज्ञान पूर्णतया |
| शोक एकत्वमनुपश्यतः” ( ई० | निवृत्त हो सकता है; जैसा कि |
| उ० ७) इति मन्त्रवर्णात्, | “उस अवस्थामें एकत्व देखनेवाले |
| “तरति शोकमात्मवित्” ( छा० | पुरुषको क्या मोह और क्या शोक |
| उ० ७। १। ३) इति, “भिद्यते | हो सकता है” इत्यादि मन्त्रवर्ण |
| हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। | तथा “आत्मज्ञानी शोकको पार कर |
| क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे | जाता है” “उस परावरको देख |
| परावरे” (मु० उ० २। २। ८) | लेनेपर उसकी हृदय-ग्रन्थि टूट जाती |
| इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | है, सारे सन्देह नष्ट हो जाते हैं |
| और समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं” | |
| इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| प्राप्त्यर्थमेव भवति । निष्कामस्य | पुरुषके लिये तो प्राणत्व-प्राप्तिका ही |
| त्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्माष्ट्र्यै | कारण होता है, किन्तु निष्काम पुरुष- |
| भवति; आदर्शनिर्माजर्नवत् । | के लिये वह दर्पणके मार्जनके समान |
| उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भो | आत्मज्ञानके प्रतिबन्धकोंका निवर्तक |
| निरर्थकत्वात् । “कर्मणा वध्यते | होता है । हाँ, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त |
| जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । | हो गया है उसके लिये निष्प्रयोजन |
| तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः | होनेके कारण कर्मके आरम्भकी अपेक्षा |
| पारदर्शिनः” ( महा० शा० | नहीं है । जैसा कि “जीव कर्मसे बँधता |
| २४२ । ७) इति । “क्रिया- | है और आत्मज्ञानसे मुक्त हो जाता है, |
| पथश्चै व पुरस्तात्संन्यासश्च तयोः | इसलिये पारदर्शी यतिजन कर्म नहीं |
| संन्यास एवात्यरेचयत्” इति | करते” “पूर्वकालमें कर्ममार्ग और |
| संन्यास [ दो मार्ग ] थे उनमें संन्यास | |
| ही उत्कृष्ट था” “किन्हींने त्यागसे |
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ९
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पद-भाष्य
कर्मसहितादपि ज्ञानादेतत् सिध्यतीति चेत् ? | पूर्व०-यह बात तो कर्मसहित ज्ञानसे भी सिद्ध हो सकती है न ?
न; वाजसनेयके तस्यान्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वाजसनेय (बृहदारण्यक) श्रुतिमें उस (कर्मसहित ज्ञान) को अन्य फलका कारण बतलाया है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो” इस प्रकार आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें “यह लोक पुत्रद्वारा प्राप्त किया जा सकता है और किसी कर्मसे नहीं; कर्मसे पितृलोक मिलता है और विद्या (उपासना) से देवलोक” इस प्रकार उसे आत्मासे भिन्न लोकत्रय-का ही कारण बतलाया है।
समुच्चयवाद-खण्डनम् कारणत्ववचनात् । “जाया मे स्यात्” (बृ० उ० १।४।१७) इति प्रस्तुत्य “पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोकः” (बृ० उ० १।५।१६) इत्यात्मनोऽन्यस्य लोकत्रयस्य कारणत्वमुक्तं वाजसनेयके ।
वाक्य-भाष्य
“त्यागेनैके०” (कै० उ० १।२) “नान्यः पन्था विद्यते०” (श्वे० उ० ३।८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | [अमरत्व प्राप्त किया]” तथा “[इसके सिवा] और कोई मार्ग नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे भी सिद्ध होता है ।
न्यायाच्च; उपायभूतानि हि कर्माणि संस्कारद्वारेण ज्ञानस्य । ज्ञानेन त्वमृतत्वप्राप्तिः, “अमृतत्वं हि विन्दते” (के० उ० २।४) “विद्यया विन्दतेऽमृतम्” (के० उ० २।४) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च । न हि नद्याः पारगो नावं | युक्तिसे भी [कर्म ज्ञानके साक्षात् साधन नहीं हैं।] कर्म तो चित्तशुद्धिके द्वारा ज्ञानके साधन हैं। अमृतत्वकी प्राप्ति तो ज्ञानसे ही होती है जैसा कि “[ज्ञानसे] अमृतत्व ही प्राप्त कर लेता है” “विद्यासे अमृतको पा लेता है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे प्रमाणित होता है। जो मनुष्य नदीके पार पहुँच गया है वह अपने अभीष्ट
१० केनोपनिषद् [ खण्ड १
१० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
तत्रैव च पारिव्राज्यविधाने | वहाँ (उस बृहदारण्यकोपनिषद्-
हेतुरुक्तः “किं प्रजया करिष्यामो | में) ही संन्यास ग्रहण करनेमें
येषां नोऽयमात्मायं लोकः” | यह हेतु बतलाया है—"हम प्रजा-
(बृ० उ० ४।४।२२) इति। | को लेकर क्या करेंगे, जिन हमें
तत्रायं हेत्वर्थः-प्रजाकर्मतत्स- | कि यह आत्मलोक ही अभीष्ट
युक्तविद्याभिर्मनुष्यपितृदेवलोक- | है ?" उस हेतुका अभिप्राय
त्रयसाधनैरानात्मलोकप्रतिपत्ति- | इस प्रकार है—'मनुष्यलोक,
कारणैः किं करिष्यामः। न चा- | पितृलोक और देवलोक—इन
स्माकं लोकत्रयमनित्यं साधन- | तीन लोकोंके साधन अनात्म-
साध्यमिष्टम्, येषामस्माकं स्वाभा- | लोकोंकी प्राप्तिके हेतुभूत प्रजा,
कर्म और कर्मसहित ज्ञानसे हमें
क्या करना है; क्योंकि हमलोगोंको
जिन्हें कि, स्वाभाविक, अजन्मा,
वाक्य-भाष्य
न मुञ्चति यथेष्टदेशगमनं प्रति | स्थानपर जानेके लिये स्वतन्त्रता प्राप्त
स्वातन्त्र्ये सति। | होनेपर भी नौकाको न छोड़े—ऐसा
कभी नहीं होता।
न हि स्वभावसिद्धं वस्तु | जो वस्तु स्वतः सिद्ध है उसे कोई
सिषाधयिषति सा- | भी पुरुष साधनोंसे सिद्ध नहीं करना
[आत्मनः] धनैः। स्वभावसिद्ध- | चाहता । आत्मा भी स्वभाव-सिद्ध है;
[अविकार्यत्वादि-] श्चात्मा, तथा न | और इसीलिये वह प्राप्त करनेकी इच्छा
[निरूपणम्] आविषयिषितः, | करने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मस्वरूप
आत्मत्वे सति नित्यप्राप्तत्वात् । | होनेके कारण यह नित्य-प्राप्त ही है।
नापि विविकारयिषितः; आत्मत्वे | इसी प्रकार उसका विकार भी इष्ट
सति नित्यत्वादविकारित्वात् | नहीं है क्योंकि आत्मा होनेके साथ ही
अविषयत्वादमूर्तत्वाच्च । | वह नित्य, अविकारी, अविषय तथा
अमूर्त्त भी है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
पद-भाष्य
विकोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयो न | अजर, अमर, अभय और जो कर्मसे
घटता-बढ़ता नहीं है वह नित्य-
वर्धते कर्मणा नो कनीयान्नित्यश्च | लोक ही इष्ट है, साधनद्वारा प्राप्त
लोक इष्टः । स च नित्यत्वान्ना- | होनेवाला अनित्य लोकत्रय तो इष्ट
है नहीं । और वह (आत्मलोक)
विद्यानिवृत्तिव्यतिरेकेणान्यसाधन- | तो नित्य होनेके कारण अविद्या-
निवृत्तिके सिवा अन्य किसी भी
निष्पाद्यः । तस्मात्प्रत्यगात्म- | साधनसे प्राप्त होने योग्य है नहीं।
अतः हमको आत्मा और ब्रह्मके
ब्रह्मविज्ञानपूर्वकः सर्वैषणासंन्यास | एकत्वज्ञानपूर्वक सब प्रकारकी
एव कर्तव्य इति । | एषणाओंका त्याग ही करना चाहिये।
वाक्य-भाष्य
श्रुतेश्च “न वर्धते कर्मणा” | इसके सिवा श्रुतिसे “आत्मा कर्मसे
(बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादि । | बढ़ता नहीं है” इत्यादि और स्मृतिसे
भी “यह आत्मा अविकार्य कहा
स्मृतेश्च “अविकार्योऽयमुच्यते” | जाता है” इत्यादि कहा गया
(गीता २ । २५) इति । न च | है। “शुद्ध और पापरहित” इत्यादि
सञ्चिकीर्षितः “शुद्धमपाप- | श्रुतियोंसे [ प्रकट होता है कि ]
आत्माका संस्कार करना भी अभीष्ट
विद्धम्” (ई० उ० ८) इत्यादि- | नहीं है । इसके सिवा अपनेसे
अभिन्न होनेके कारण भी वह संस्कार्य
श्रुतिभ्यः; अनन्यत्वाच्च; अन्ये- | नहीं है क्योंकि संस्कार अन्य वस्तुके
नान्यत्संस्क्रियते । न चात्म- | द्वारा अन्यका ही हुआ करता है।
आत्मासे भिन्न कोई क्रिया भी नहीं है;
नोऽन्यभूता क्रिया अस्ति, न च | और स्वयं आत्माके योगसे ही आत्मा-
स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं सञ्चि- | के संस्कारकी इच्छा कोई न करेगा ।
कीर्षेत्। न च वस्त्वन्तराधानं | एक वस्तुका दूसरी वस्तुपर आधान
करना अथवा एक वस्तुको दूसरी
नित्यप्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य | वस्तुका प्राप्त होना नित्य नहीं हो
१२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
१२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
कर्मसहभावित्वाविरोधाच्च प्रत्य- | इसके सिवा आत्मा और ब्रह्मके
ज्ञानकर्मविरोध- गात्मब्रह्मविज्ञानस्य । | एकत्वज्ञानका कर्मके साथ-साथ
प्रदर्शनम् | होनेमें विरोध भी है । जिसमें
न ह्युपात्तकारकफल- | [ कर्ता-कर्मादि ] कारक और
भेदविज्ञानेन कर्मणा प्रत्यस्त- | [ स्वर्गादि ] फलका भेद स्वीकार
मितसर्वभेददर्शनस्य प्रत्यगात्म- | किया गया है उस कर्मके साथ
ब्रह्मविषयस्य सहभावित्वम् | सम्पूर्ण भेददृष्टिसे रहित ब्रह्म और
उपपद्यते, वस्तुप्राधान्ये सति | आत्माकी एकताके ज्ञानका रहना
अपुरुषतन्त्रत्वाद्ब्रह्मविज्ञानस्य । | संगत नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान
तस्माद्दृष्टादृष्टेभ्यो बाह्यसाधन- | तो वस्तुप्रधान होनेके कारण पुरुष
साध्येभ्यो विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | ( कर्ता ) के अधीन नहीं है ।
विषया ब्रह्मजिज्ञासेयम् 'केनेषि- | अतः इस 'केनेषितम्' इत्यादि
तम्' इत्यादिश्रुत्या प्रदर्श्यते । | श्रुतिके द्वारा यह दृष्ट और अदृष्ट
शिष्याचार्यप्रश्नप्रतिवचनरूपेण | बाह्यसाधन एवं साध्योंसे विरक्त
कथनं तु सूक्ष्मवस्तुविषयत्वात् | हुए पुरुषकी ही प्रत्यगात्मविषयक
सुखप्रतिपत्तिकारणं भवति । | ब्रह्मजिज्ञासा दिखलायी जाती है ।
केवलतर्कागम्यत्वं च दर्शितं | शिष्य और आचार्यके प्रश्नोत्तररूपसे
भवति । | यह कथन वस्तुका सुगमतासे ज्ञान
| करानेमें कारण है क्योंकि यह
| विषय सूक्ष्म है । इसके सिवा
| केवल तर्कद्वारा इसकी अगम्यता
| भी दिखलायी गयी है ।
वाक्य-भाष्य
नित्या । नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । | सकती; और मोक्षकी नित्यता ही इष्ट
अत उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भो- | है। इसलिये जिसे आत्मज्ञान हो गया है
ऽनुपपन्नः, अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेः | उसके लिये कर्मका आरम्भ नहीं बन
आत्मविज्ञानाय केनेषितमित्या- | सकता। अतः जिसकी बाह्य-बुद्धि निवृत्त
द्यारम्भः । | हो गयी है उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान
| करानेके लिये 'केनेषितम्' इत्यादि
| उपनिषद् आरम्भ की जाती है ।
१. अर्थात् आत्मापर परमानन्दत्व आदि गुणोंका आधान या उसका ब्रह्माण्ड-
बाह्य ब्रह्मको प्राप्त होना नित्य नहीं हो सकता ।