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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 152 में से

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पृष्ठ 10

२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

प्रथम खण्ड

सम्बन्ध-भाष्य

पद-भाष्य

उपक्रमणिका | 'केनेषितम्' इत्याद्योपनिषत् | अब 'केनेषितम्' इत्यादि पर-
परब्रह्मविषया वक्तव्या | ब्रह्मविषयक उपनिषत् कहनी है
इति नवमस्याध्यायस्य | इसलिये इस नवम अध्यायका *
आरम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माणि | आरम्भ किया जाता है । इससे
पूर्व सम्पूर्ण कर्मोंके प्रतिपादनकी
अशेषतः परिसमापितानि, समस्त- | सम्यक्रूपसे समाप्ति की गयी है,
तथा समस्त कर्मोंके आश्रयभूत
कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासना- | प्राणकी उपासना एवं कर्मकी अङ्गभूत
न्युक्तानि, कर्माङ्गसामविषयाणि | सामोपासनाका वर्णन किया गया
है । उसके पश्चात् जो गायत्रसाम-

वाक्य-भाष्य

उपक्रमणिका | समाप्तं कर्मात्मभूतप्राणविषयं | इससे पूर्व-ग्रन्थमें कर्मोंके आश्रयभूत
प्राणविज्ञान तथा अनेक प्रकारके कर्मका
विज्ञानं कर्म चानेक- | निरूपण समाप्त हुआ, जिनके विकल्प¹
प्रकारम्, ययोर्विकल्प- | और समुच्चय²के अनुष्ठानसे दक्षिण
समुच्चयानुष्ठानाद्दक्षिणोत्तराभ्यां | और उत्तर मार्गोंद्वारा क्रमशः आवृत्ति
( आवागमन ) और अनावृत्ति
सृतिभ्यामावृत्त्यनावृत्ती भवतः । | (क्रममुक्ति) हुआ करती हैं। इसके आगे
अत ऊर्ध्वं फलनिरपेक्षज्ञानकर्म- | देवता-ज्ञान और कर्मोंके समुच्चयका
निष्काम भावसे अनुष्ठान करनेसे
समुच्चयानुष्ठानात्कृतात्मसंस्कार- | जिसने अपना चित्त शुद्ध कर लिया है,
स्योच्छिन्नात्मज्ञानप्रतिबन्धकस्य | जिसका आत्मज्ञानका प्रतिबन्धकरूप


  • यह उपनिषद् सामवेदीय तलवकार शाखाका नवम अध्याय है ।
    १. दोनोंमेंसे केवल एक । २. एक साथ दोनों ।