केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
पद-भाष्य
च । अनन्तरं च गायत्रसाम- | विषयक विचार और शिष्यपरम्परा-
रूप वंशके वर्णनमें समाप्त होनेवाले
विषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तं कार्यम्। | ग्रन्थसे कहा गया है वह कार्यरूप
वस्तुका ही वर्णन है ।
सर्वमेतद्यथोक्तं कर्म च ज्ञानं | ऊपर बतलाया हुआ यह
सम्पूर्ण कर्म और ज्ञान सम्यक्
च सम्यगनुष्ठितं निष्कामस्य | प्रकारसे सम्पादन किये जानेपर
निष्काम मुमुक्षुकी तो चित्त-
मुमुक्षोः सत्त्वशुद्ध्यर्थं भवति । | शुद्धिके कारण होते हैं। तथा
वाक्य-भाष्य
द्वैतविषयदोषदर्शिनो निर्ज्ञाताशेष- | दोष नष्ट हो गया है, जो द्वैतविषयमें
दोष देखने लगा है तथा सम्पूर्ण बाह्य
वाह्यविषयत्वात्संसारवीजमज्ञान- | विषयोंका तत्त्व जान लेनेके कारण जो
मुच्छिच्छित्सतः प्रत्यगात्मविषय- | संसारके बीजस्वरूप अज्ञानका उच्छेद
करना चाहता है, उस आत्मतत्त्वके
जिज्ञासोः केनेषितमित्यात्म- | जिज्ञासुको आत्मस्वरूपके तत्त्वका ज्ञान
स्वरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय | करानेके लिये 'केनेषितम्' आदि
मन्त्रसे यह (नवाँ) अध्याय आरम्भ
आरभ्यते । तेन च मृत्युपदम् | किया जाता है। उस आत्मतत्त्वके
अज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि | ज्ञानसे ही मृत्युके कारणरूप अज्ञानका
उच्छेद करना चाहिये, क्योंकि यह
संसारो यतः। अनधिगतत्वाद् | संसार अज्ञानमूलक ही है। आत्मतत्त्व
अज्ञात है, इसलिये उसका ज्ञान प्राप्त
आत्मनो युक्ता तदधिगमाय | करनेके लिये आत्मविषयक जिज्ञासा
तद्विषया जिज्ञासा । | उचित ही है।
कर्मविषये चानुक्तिः; तद्वि- | कर्मकाण्डमें आत्मतत्त्वका निरूपण
नहीं किया गया क्योंकि यह उसका
[ज्ञानकर्मविरोधः] रोधित्वात् । अस्य | विरोधी है। इस विशेषरूपसे जानने-
विजिज्ञासितव्यस्य | योग्य आत्मतत्त्वका कर्मकाण्डमें
आत्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम् । | विवेचन नहीं किया जाता। यदि कहो