कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
३५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण
(१) निष्पन्नसस्यमन्यविषयं वा सजनपदो यायात् । समुद्रसरस्तटाकानि वा संश्रयेत । धान्यशाकमूलफलावापान् सेतुषु कुर्वीत । मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान् वा ।
(२) मूषिकभये मार्जारनकुलोत्सर्गः । तेषां ग्रहणहिंसाया द्वादशपणो दण्डः । शुनामनिग्रहे च अन्यत्रारण्यचरेभ्यः ।
(३) स्नुहीक्षीरलिप्तानि धान्यानि विसृजेत् । उपनिषद्योगयुक्तानि वा । मूषिककरं वा प्रयुञ्जीत । शान्तिं वा सिद्धतापसाः कुर्युः । पर्वसु च मूषिकपूजाः कारयेत् ।
(४) तेन शलभपक्षिकृमिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(५) व्यालभये मदनरसयुक्तानि पशुशवानि प्रसृजेत् । मदनकोद्रवपूर्णान्यौदर्याणि वा ।
उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग या सेतु आदि का निर्माण कराया जाय । काम करने में असमर्थ लोगों को केवल अन्न दिया जाय; अथवा उनको समीप के दूसरे दुर्भिक्ष रहित देश तक पहुँचाने का प्रबन्ध कर दिया जाय । अथवा मित्र राजा से सहायता ली जाय । अपने देश के धनवान् व्यक्तियों पर विशेष कर लगाकर तथा उनसे एकमुश्त रकम लेकर आपत्ति का प्रतीकार किया जाय ।
(१) या तो जो देश धन-धान्य संपन्न दीखे वहीं प्रजा सहित चला जाय । अथवा समुद्र के किनारे या बड़े-बड़े तालाबों के पास जाकर बसा जाय, जहाँ पर कि धान्य, शाक, मूल, फल आदि की खेती की जा सके । अथवा मृग, पशु, पक्षी, व्याघ्र और मछली आदि का शिकार कर प्राण-रक्षा की जाय ।
(२) चूहों से रक्षा : चूहों का उत्पात बढ़ जाने पर जगह-जगह बिल्ली और नेवला छोड़ दिए जायें । जो उनको पकड़े या मारे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । उन लोगों पर भी बारह पण दण्ड किया जाय, जो दूसरों का नुकसान करने वाले पालतू कुत्तों को रोक कर न रखें । जंगली कुत्तों को न पकड़ने पर कोई अपराध न माना जाय ।
(३) चूहों के प्रतीकार के लिए सेंहुड़ के दूध में साने हुए अनाज को या औपनिषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट औषधियों से मिले हुए अनाज को इधर-उधर बखेर दिया जाय । अथवा चूहादानी द्वारा चूहों को पकड़ने का प्रबन्ध किया जाय । अथवा सिद्ध या तपस्वियों द्वारा चूहों को नष्ट करने के लिए शान्तिकर्म करवाये जांय । पर्व तिथियों पर मूषक-पूजा कराई जाय ।
(४) इसी के अनुसार कीट, पतङ्ग, पक्षी आदि द्वारा उत्पन्न उत्पातों का प्रतीकार कराया जाय ।
(५) व्याघ्र से रक्षा : व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं का भय बढ़ जाय तो औप-
प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५९
(१) लुब्धकाः श्वगणिनो वा कूटपञ्जरावापातैश्चरेयुः । आवरणिनः शस्त्रपाणयो व्यालानभिहन्युः । अनभिसर्तुर्द्वादशपणो दण्डः । स एव लाभो व्यालघातिनः ।
(२) पर्वसु च पर्वतपूजाः कारयेत् । तेन मृगपक्षिसङ्घग्राहप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(३) सर्पभये मन्त्रौषधिभिश्च जाङ्गलीविदश्चरेयुः । सम्भूय वोपसर्पान् हन्युः । अथर्ववेदविदो वाभिचरेयुः । पर्वसु च नागपूजाः कारयेत् । तेनोदकप्राणिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(४) रक्षोभये रक्षोघ्नान्यथर्ववेदविदो मायायोगविदो वा कर्माणि कुर्युः । पर्वसु च वितर्दिच्छत्रोल्लोपिकाहस्तपताकाच्छागोपहारैश्चैत्यपूजाः कारयेत् । चरूं वश्चराम इत्येवं सर्वभयेष्वहोरात्रं चरेयुः ।
निषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट मदनसंयुक्त मृत-पशुओं की लाशें जङ्गल में छुड़वा दी जायें । अथवा धतूरा और जङ्गली कोदो ( कोहव ) को मिलाकर पशुओं की लाशों में भर कर उन्हें जङ्गल में रखवा दिया जाय ।
( १ ) व्याघ्र-विपत्ति को दूर करने के लिए शिकारी और बहेलिये गढों में छिप-कर उनको मारें । कवच पहिन कर हथियारों से बाघ को मारा जाय । बाघ आदि हिंसक पशुओं से घिरे हुए आदमी की जो सहायता न करे उसको बारह पण दण्ड किया जाय । जो व्याघ्र आदि का शिकार करे उसे बारह पण इनाम दिया जाय ।
( २ ) व्याघ्र आदि से रक्षा के लिए पर्व तिथियों पर पर्वतों की पूजा कराई जाय । अन्य जङ्गली पशु-पक्षियों के प्रतीकार के लिए भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ३ ) साँप से रक्षा : मन्त्र तथा जड़ी-बूटियों को जानने वाले विषवैद्यों को चाहिए कि वे सर्प-भय का प्रतीकार करें । अथवा नगरवासी जहाँ भी साँप देखें उसको मार डालें । अथवा अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचार क्रियाओं द्वारा सापों को मार डालें । सर्प-भय से बचने के लिए पर्व तिथियों पर उनकी पूजा की जाय । इसी प्रकार जलचर जीवों द्वारा होने वाले भयों का प्रतीकार समझना चाहिए ।
( ४ ) राक्षसों से रक्षा : राक्षसों का भय पैदा हो जाने पर तन्त्र और अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचारक तथा मायायोग क्रियाओं द्वारा उसका प्रतीकार करें । कृष्ण चतुर्दशी तथा अष्टमी आदि पर्व तिथियों पर वेदी, छाता, खाद्य सामग्री, छोटी झंडी और बलि के लिए बकरा लेकर श्मशान भूमि में राक्षसों की पूजा करायी जाय । प्रत्येक भय पर ‘हम तुम्हारे लिए हवि पकाते हैं’ ( चरुं वश्चरामः ), इस प्रकार कहते हुए दिन-रात घूमें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में उपनिपातप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त
३६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) सर्वत्र चोपहतान् पितेवानुगृह्णीयात् ।
(२) मायायोगविदस्तस्माद्विषये सिद्धतापसाः ।
वसेयुः पूजिता राज्ञा दैवापत्प्रतिकारिणः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे उपनिपातप्रतीकारो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदित एकोनाशीतितमः ।
—: ० :—
( १ ) इस प्रकार के भयों के उपस्थित होने पर सव तरह से राजा, प्रजा की रक्षा अपनी सन्तान की तरह करे ।
( २ ) इसलिए राजा को चाहिए कि वह दैवी विपदाओं का प्रतीकार करने वाले अथर्व वेद के ज्ञाता तान्त्रिकों, सिद्धों और तपस्वियों को अपने देश में सम्मानपूर्वक रखें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में उपनिपातप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त
—: ० :—
| प्रकरण ७९ |
|---|
| अध्याय ४ |
गूढाजीविनां रक्षा
(१) समाहर्तृप्रणिधौ जनपदरक्षणमुक्तम् । तस्य कण्टकशोधनं वक्ष्यामः।
(२) समाहर्ता जनपदे सिद्धतापसप्रव्रजितचक्रचरचारणकुहकप्रच्छन्द-
ककार्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकचिकित्सकोन्मत्तमूकबधिरजडान्धवैदेहक-
कारुशिल्पिकुशीलववेशशौण्डिकापूपिकपाक्वमांसिकौदनिकव्यञ्जनान् प्रणि-
दध्यात् । ते ग्रामाणामध्यक्षाणां च शौचाशौचं विद्युः । यं चात्र गूढाजीविनं
शङ्केत, सत्रिणसवर्णेनापसर्पयेत् । धर्मस्थं प्रदेष्टारं वा विश्वासोपागतं सत्री
ब्रूयात्—'असौ मे बन्धुरभियुक्तः, तस्यायमनर्थः प्रतिक्रियताम् । अयं चार्थः
प्रतिगृह्यताम्' इति । स चेत् तथा कुर्यात्, उपग्राहक इति प्रवास्येत ।
(३) तेन प्रदेष्टारो व्याख्याताः ।
(४) ग्रामकूटमध्यक्षं वा सत्री ब्रूयात्—'असौ जाल्मः प्रभूतद्रव्यः,
गुप्त षडयंत्रकारियों से प्रजा की रक्षा के उपाय
(१) जनपद की रक्षा के उपाय समाहर्तृ प्रचार नामक प्रकरण में बताये जा चुके हैं । अब जनपद में गुप्त कण्टकों के प्रतीकार का उपाय बताया जा रहा है ।
(२) समाहर्ता को चाहिए कि वह गुप्त षडयंत्र कार्यों को जानने के लिए सारे देश में सिद्ध, तपस्वी, सन्यासी, परिव्राजक, भाट, जादूगर, स्वेच्छाचारी, यमपट को को दिखाकर जीविका चलाने वाले, शकुन बताने वाले, ज्योतिषी, वैद्य, उन्मत्त, गूं गे, बहरे, मूर्ख, व्यापारी, कारीगर, नट, भांड, कलवार, हलवाई, पक्का माँस बेचने वाले और रसोइया आदि के वेष में गुप्तचरों को नियुक्त करे । उन गुप्तचरों को चाहिए कि वे ग्रामीणों तथा ग्राम-प्रधानों की ईमानदारी और बेईमानी का पता लगाएँ । जिन्हें वे गूढाजीवी समझें उन्हें सत्री नामक गुप्तचर के साथ न्यायाधीश (धर्मस्थ) के पास भेज दें । विश्वस्त धर्मस्थ से सत्री यों कहे 'यह मेरा भाई है इसने ऐसा अपराध किया है । इसके इस अपराध को माफ कर दीजिए और इसके बदले में इतना धन ले लीजिए' । यदि न्यायाधीश उस धन को लेकर अपराधी को छोड़ दे तो उस पर घूस-खोरी का जुर्म लगाकर उसे बर्खास्त किया जाय ।
(३) यही नियम प्रदेष्टा (कण्टकशोधन का कमिश्नर) के संबंध में भी समझने चाहिएँ ।
(४) गाँव के लोगों से या गाँव के मुखिया से सत्री कहे कि 'यह पापी बड़ा सम्पत्तिशाली है; इस समय इस पर ऐसी आपत्ति आई है इसलिए चलो आपत्ति के
| ३६२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
|---|
तस्यायमनर्थः। तेनैनमाहारयस्व' इति। स चेत्तथा कुर्यादुत्कोचक इति प्रवास्येत।
(१) कृतकाभियुक्तो वा कूटसाक्षिणोऽभिजातानर्थवैपुल्येन आरभेत। ते चेत्तथा कुर्युः, कूटसाक्षिण इति प्रवास्येरन्।
(२) तेन कूटश्रावणकारका व्याख्याताः।
(३) यं वा मन्त्रयोगमूलकर्मभिः श्माशानीकैर्वा संवननकारकं मन्येत, तं सत्री ब्रूयात्—'अमुष्य भार्यां स्नुषां दुहितरं वा कामये। सा मां प्रतिकामयताम्, अयं चार्थः प्रतिगृह्यताम्' इति। स चेत्तथा कुर्यात्, संवननकारक इति प्रवास्येत।
(४) तेन कृत्याभिचारशीलौ व्याख्यातौ।
(५) यं वा रसस्य वक्तारं क्रेतारं विक्रेतारं भैषज्याहारव्यवहारिणं वा रसदं मन्येत, तं सत्री ब्रूयात्—'असौ मे शत्रुस्तस्योपघातः क्रियताम्, अयं चार्थः प्रतिगृह्यताम्' इति। स चेत्तथा कुर्याद्, रसद इति प्रवास्येत।
बहाने इसकी सारी सम्पत्ति लूट लें।' यदि गाँव के लोग या मुखिया वैसा ही करें तो उन्हें उत्कोचक (जनता को कष्ट देकर अपहरण करने वाला) समझकर प्रवासित कर दिया जाय।
(१) बनावटी तौर पर अभियुक्त बना हुआ सत्री संदिग्ध गवाहों को बहुत-सा धन देने का लोभ देकर अपनी ओर से उन्हें झूठी गवाही देने के लिए फुसलायें। यदि वे लोभ में आ जाँय तो उन्हें झूठा साक्षी समझकर प्रवासित किया जाय।
(२) यही नियम झूठे दस्तावेज आदि बनाने वालों के सम्बन्ध में भी समझने चाहिएँ।
(३) जिसको यह समझ लिया जाय कि यह व्यक्ति मन्त्रों, औषधियों या श्मशान की क्रियाओं द्वारा वशीकरण का कार्य करता है, उससे सत्री इस प्रकार कहे कि 'मैं अमुक व्यक्ति की स्त्री' पुत्रवधू या लड़की से प्रेम करता हूँ; इसलिए ऐसा उपाय बताओ कि जिससे वह मेरे वश में हो जाय बदले में इतना धन ले लो।' यदि वह लोभवश वैसा करने को तैयार हो जाय तो उसे वशीकरण करने वाला समझकर प्रवासित कर दिया जाय।
(४) यही नियम उन लोगों के सम्बन्ध से भी समझना चाहिए जो अपने ऊपर देवी-देवता, भूत-प्रेत-पिशाच आदि को बुलाकर प्रजा को कष्ट देते हैं और तन्त्र-मन्त्र आदि प्रयोगों द्वारा लोगों को मारते हैं।
(५) विष के बनाने वाले, खरीदने वाले, बेचने वाले तथा ओषधियों एवं भोज्य सामग्री का व्यापार करने वाले किसी व्यक्ति पर यदि किसी को विष देने का सन्देह हो जाय तो सत्री उससे कहे कि 'अमुक पुरुष मेरा शत्रु है उसे आप विष देकर मार डालिये और बदले में इतना धन ले लीजिए'। यदि वह पुरुष ऐसा ही करे तो उसे विष देने के अभियोग में प्रवासित कर दिया जाय।
प्र० ७६ : अ० ४ ] गुप्त षड्यन्त्रों का प्रतीकार ३६३
(१) तेन मदनयोगव्यवहारी व्याख्यातः ।
(२) यं वा नानालोहक्षाराणामङ्गारभस्त्रासन्दंशमुष्टिकाधिकरण-बिम्बटङ्कमूषाणामभीक्ष्णं क्रेतारं मषीभस्मधूमदिग्धहस्तवस्त्रलिङ्गं कर्मारोपकरणसंवर्गं कूटरूपकारकं मन्येत, तं सत्री शिष्यत्वेन संव्यवहारेण चानुप्रविश्य प्रज्ञापयेत् । प्रज्ञातः कूटरूपकारक इति प्रवास्येत ।
(३) तेन रागस्यापहर्ता कूटसुवर्णव्यवहारी च व्याख्यातः ।
(४) आरब्धारस्तु हिंसायां गूढाजीवास्त्रयोदश ।
प्रवास्या निष्क्रयार्थं वा दद्युर्दोषविशेषतः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे गूढाजीविनां रक्षा नाम चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽशीतितमः ।
—: ० :—
( १ ) यही नियम उन व्यापारियों के संबन्ध में भी समझने चाहिएँ जो बेहोश करने वाली दवाइयों को बेचते हैं ।
( २ ) जो व्यक्ति अनेक प्रकार का लोहा, खाद, कोयला, धौंकनी, सनसी, हथौड़ी निहाई ( अधिकरणी ), तस्वीर, छेनी और मूषा आदि पदार्थों को अधिक संख्या में खरीदे; जिसके हाथ या कपड़ों पर स्याही, राख तथा धूएँ के चिह्न हों, जो लोहार तथा सोनार के सभी औजार रखता हो; ऐसे व्यक्ति के ऊपर यदि छिपकर जाली सिक्का बनाने का सन्देह पैदा हो जाय तो सत्री उसका शिष्य बनकर एवं उससे अच्छी तरह मेल-जोल बढ़ाकर उसके रहस्यों की पूरी जानकारी राजा को दे । इस बात का निश्चय हो जाने पर कि वह छिपकर जाली सिक्का बनाता है, उसे प्रवासित कर दिया जाय ।
( ३ ) सोने आदि का रंग उड़ा देने वाले तथा बनावटी सोने के संबन्ध में भी भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ४ ) धर्मस्थ, प्रदेष्टा, गाँव का मुखिया, गाँव का अध्यक्ष, कूट साक्षी, कूट श्रावक, वशीकरण कर्ता, क्रियाशील अभिचारशील, विष देने वाला, मदनयोग व्यापारी, कूटरूप कर्ता और कूट सुवर्ण व्यापारी; ये तेरह प्रकार के लोक के उपद्रव करने वाले गूढ़जीवी ऊपर बताए गये हैं। इन्हें देशनिकाला दिया जाय या अपराध के अनुसार दण्डित किया जाय ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में गूढ़जीवियोंकी रक्षा नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ८० | # सिद्धव्यञ्नैर्माणवप्रकाशनम् |
|---|---|
| अध्याय ५ |
(१) सत्रिप्रयोगादूर्ध्वं सिद्धव्यञ्जना माणवा माणवविद्याभिः प्रलोभयेयुः। प्रस्वापनान्तर्धानद्वारापोहमन्त्रेण प्रतिरोधकान्, संवननमन्त्रेण पारतल्पिकान्।
(२) तेषां कृतोत्साहानां महासंघमादाय रात्रावन्यं ग्राममुद्दिश्यान्यं ग्रामं कृतकस्त्रीपुरुषं गत्वा ब्रूयुः—'इहैव विद्याप्रभावो दृश्यताम्। कृच्छ्रः परग्रामो गन्तुम्' इति। ततो द्वारापोहमन्त्रेण द्वाराण्यपोह्य 'प्रविश्यताम्' इति ब्रूयुः। अन्तर्धानमन्त्रेण जाग्रतामारक्षिणां मध्येन माणवानतिक्रामयेयुः। प्रस्वापनमन्त्रेण प्रस्वापयित्वा रक्षिणः शय्याभिर्माणवैः संचारयेयुः। संवननमन्त्रेण भार्याव्यञ्जनाः परेषां माणवैः संमोदयेयुः।
(३) उपलब्धविद्याप्रभावाणां पुरश्चरणाद्यादिशयुरभिज्ञानार्थम्।
सिद्धवेशधारी गुप्तचरों द्वारा दुष्टों का दमन
(१) गुप्तचरों के प्रयोग के बाद सिद्धों के वेश में रहने वाले गूढ़ पुरुष चोरों, व्यभिचारियों के समूहों में रहकर सम्मोहनी विद्याओं के द्वारा प्रजा को कष्ट देने वाले दुष्टों को प्रलोभन दें; छिपाने, संकेत से दरवाजा खोलने आदि के मायिक प्रयोगों से चोरों को और वशीकरण संबन्धी मंत्रों के प्रयोगों से व्यभिचारियों को अपने काबू में करें।
(२) चोरों और व्यभिचारियों के बड़े भारी समूह को उत्साहित कर, पहिले से रात में जिस गाँव को जाने का प्रोग्राम बनाया हो, उससे दूसरे ही गाँव में जहाँ लोगों को पहिले से समझा-बुझा दिया है, चोरों, व्यभिचारियों को ले जाकर सिद्धवेशधारी गुप्त पुरुष उनसे कहें 'आप लोग यहीं पर आज हमारी विद्या का प्रभाव देखें; आज दूसरे गाँव जाना तो संभव न हो सकेगा।' इसके बाद द्वारापोह मंत्र से दरवाजों को खोलकर उन चोरों को भीतर घुस जाने को कहें; अन्तर्धान मन्त्र के द्वारा जागते पहरेदारों के बीच से चोरों को निकाल दें, प्रस्वापन मन्त्र पढ़ने का अभिनय कर पहरेदारों को सुलाकर उनकी चारपाइयों के पास से ही चोरों को ले जांय और अन्त में वशीकरण मन्त्र का दिखावा कर दूसरों की बनावटी स्त्रियों के साथ उनको संभोग सुख दिलावें।
(३) जब उन चोरों-व्यभिचारियों को सिद्ध पुरुषों की मन्त्रविद्या पर पूरा भरोसा हो जाय तब उन्हें मन्त्रों के पुरश्चरण (प्रयोग) के लिए प्रेरित करें।
प्र० ८० : अ० ५ ] गुप्तविधि से दुष्टों का दमन ३६५
(१) कृतलक्षणद्रव्येषु वा वेश्मसु कर्म कारयेयुः । अनुप्रविष्टान् वैकत्र ग्राहयेयुः ।
(२) कृतलक्षणद्रव्यक्रयविक्रयाधानेषु योगसुरामत्तान् वा ग्राहयेयुः । गृहीतान् पूर्वपदानसहायाननुयुञ्जीत ।
(३) पुराणचोरव्यञ्जना वा चोराननुप्रविष्टास्तथैव कर्म कारयेयुर्ग्राहयेयुश्च ।
(४) गृहीतान् समाहर्ता पौरजानपदानां दर्शयेत्—'चोरग्रहणीं विद्यामधीते राजा; तस्योपदेशादिमे चोरा गृहीताः, भूयश्च ग्रहीष्यामि । वारयितव्यो वा स्वजनः पापाचार' इति ।
(५) यं चात्रापसर्पोपदेशेन शम्याप्रतोदादीनामपहर्तारं जानीयात्तमेषां प्रत्यादिशेद्—एष राज्ञः प्रभाव, इति ।
(६) पुराणचोरगोपालकव्याधश्वगणिनश्च, वनचोराटविकाननुप्रविष्टाः प्रभूतकूटहिरण्यकुप्यभाण्डेषु सार्थव्रजग्रामेष्वेनानभियोजयेयुः । अभियोगे
( १ ) फिर जिन घरों में पहिले ही से चिह्न लगी वस्तुएँ रखी गई हों वहाँ उनको चोरी करने के लिए भेजें । अन्त में किसी एक घर में घुसे हुए उन सबको एक साथ गिरफ्तार करवा लें ।
( २ ) अथवा चिह्नित वस्तुओं को बेचते खरीदते, गिरवी रखते समय या मद्य-पान की बेसुध दशा में उन्हें गिरफ्तार करा लें । तब उनके द्वारा पहिले की चोरियों तथा चोरी करने में सहायता देने वाले लोगों के सम्बन्ध में पता लगाया जाय ।
( ३ ) अथवा पुराने अनुभवी चोरों का वेश बनाकर गुप्तचर उनकी मण्डली में मिल जायें और उनसे चोरी कराकर उन्हें धोखे में गिरफ्तार करा दें ।
( ४ ) समाहर्त्ता को चाहिए कि वह उन गिरफ्तार किए गए चोरों को नगर-वासियों के सामने खड़ा कर उनसे कहे 'राजा, चोरों को पकड़ने की विद्या में बहुत निपुण थे । उसी की आज्ञा से इन चोरों को पकड़ा गया है । जो भी ऐसा कार्य करेंगे उनको मैं इसी तरह गिरफ्तार करूँगा । इसलिए तुम लोग अपने अपने स्वजनों को ताकीद कर दो कि वे ऐसा आचरण कदापि न करें ।'
( ५ ) गुप्तचरों की कारामात से गिरफ्तार किये खुरपी, रस्सी, सैल आदि कृषि योग्य छोटी-छोटी वस्तुओं को चुराने वालों से जनता के सामने कहा जाय 'देखो, राजा का ही यह प्रभाव है कि इतनी छोटी-छोटी वस्तुओं की चोरी भी उससे छिपी नहीं रह सकती है ।'
( ६ ) पुराने चोर, शिकारी, बहेलिये एवं चरवाहे के वेश में गुप्तचर, जंगली चोरों और कोलभीलों के समूह में घुल-मिल जायें, तब उन्हें ऐसे गाँव में डाका
३६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
गूढबलैर्घातयेयुः, मदनरसयुक्तेन वा पथ्यादनेन। अनुगृहीतलोप्त्रभाराना-
यतगतपरिश्रान्तान् प्रस्वपतः प्रहवणेषु योगसुरामत्तान् वा ग्राहयेयुः।
(१) पूर्ववच्च गृहीत्वैनान् समाहर्ता प्ररूपयेत्।
सर्वज्ञख्यापनं राज्ञः कारयन् राष्ट्रवासिषु॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे सिद्धव्यञ्जनैर्माणवप्रकाशनम् नाम
पञ्चमोऽध्याय, आदित एकाशीतितमः।
—: ० :—
डालने का सुझाव दें जहाँ पर जाली सोना, चाँदी तथा ताँबा आदि का समान तैयार करने वाले व्यापारी रहते हैं। जब ये लोग चोरी के लिए घुसें कि तत्काल ही पहिले से छिपी हुई सेना इनका काम तमाम कर दे। या रात में विषाक्त भोजन देकर इन्हें मार डाला जाय, या चोरी का माल ढोने के कारण थक कर सोये हुए, अथवा भोजन के साथ बढ़िया मदिरा पीने के कारण बेहोश हुए, इनको गिरफ्तार किया जाय।
(१) जब उनको गिरफ्तार किया जाय तब समाहर्ता को चाहिए कि वह पहिले की तरह उन्हें जनता के सामने खड़ा कर राजा की सर्वज्ञता की घोषणा करे।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में सिद्धव्यञ्जन से माणवप्रकाशन नामक पाँचवां अध्याय समाप्त।
—:०:—
| प्रकरण ८१ | ## शङ्कारूपकर्माभिग्रहः |
|---|---|
| अध्याय ६ |
(१) सिद्धप्रयोगादूर्ध्वं शङ्कारूपकर्माभिग्रहः ।
(२) क्षीणदायकुटुम्बमल्पनिवेशं विपरीतदेशजातिगोत्रनामकर्मोपदेशं प्रच्छन्नवृत्तिकर्माणं मांससुराभक्ष्यभोजनगन्धमाल्यवस्त्रविभूषणेषु प्रसक्तमतिव्ययकर्तारं पुंश्चलीद्यूतशौण्डिकेषु प्रसक्तमभीक्ष्ण प्रवासिनमविज्ञातस्थानगमनमेकान्ताररायनिष्कुटविकालचारिणं प्रच्छन्ने सामिषे वा देशे बहुमन्त्रसन्निपातं सद्यः क्षतव्रणानां गूढप्रतिकारयितारमन्तर्गृहनित्यमभ्यधिगन्तारं कान्तापरं परपरिग्रहाणां परस्त्रीद्रव्यवेश्मनामभीक्ष्णप्रष्टारं कुत्सितकर्मशस्त्रोपकरणसंसर्गं विरात्रे छन्नकुड्यच्छायासंचारिणं विरूपद्रव्याणा-
शंकित पुरुषों की पहिचान; चोरी के माल की पहिचान; और चोर की पहिचान
( १ ) सिद्धवेश गुप्तचरों के कार्यों के बाद अब शंका, रूप और कर्म के द्वारा चोरों को पकड़ने की युक्तियों का विधान किया जाता है।
( २ ) शंकित पुरुषों की पहिचान : उन व्यक्तियों पर चोर, डाकू, हत्यारा तथा प्रजा-पीड़क होने की शंका की जा सकती है : जिनकी बाप-दादों की सम्पत्ति, खेती-बारी आदि धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही हो; जिनको खाने और खर्च के लिए पर्याप्त वेतन न मिलता हो; जो लोग अपना देश, जाति, गोत्र, नाम और अपने अध्यवसाय का ठीक-ठीक पता न देते हों; जो लोग जीविका के लिए छिपे तौर पर कार्य करते हों; जिन्हें मद्य, मांस, इत्र, फुलेल, बढ़िया वस्त्र और बनाव-श्रृंगार का शौक हो; अति खर्चीले, वेश्याओं, जुआरियों और शराबियों के बीच रहने वाले; बार-बार विदेश जाने वाले किन्तु जिनके गन्तव्य स्थान का कुछ पता न हो; जो एकांत जंगलों या सघन बगीचों में कुसमय जाते हों; जो धनवानों के घरों के आस-पास छिपे तौर पर चक्कर लगाते हों; जो अपने शरीर के घावों की मरहम पट्टी छिपकर कराते हों; जो सदा ही घर में घुसे रहते हों; जो किसी पुरुष को सामने आते देखकर अचानक ही लौट पड़ते हों; जो स्त्रियों में अति आसक्त हों; दूसरे के घर का हालचाल, स्त्री, द्रव्य आदि के सम्बन्ध में बार-बार पूछने वाले; चोरी, कुकर्मों, शस्त्र-अस्त्रों तथा इस प्रकार के दूसरे साधनों को जानने वाले; जो आधीरात में छिप कर दीवारों की छाया
३६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
मदेशकालविक्रेतारं जातवैराशयं हीनकर्मजातिं विगूह्यमानरूपं लिङ्गेना-
लिङ्गिनं लिङ्गिनं वा भिन्नाचारं पूर्वकृतापदानं स्वकर्मभिरपदिष्टं नागरिक-
महामात्रदर्शने गूहमानमपसरन्तमनुच्छ्वासोपवेशिनमाविग्नं शुष्कभिन्न-
स्वरमुखवर्णं शस्त्रहस्तमनुष्यसम्पातत्रासिनं हिंस्रस्तेननिधिनिक्षेपापहारवर-
प्रयोगगूढाजीविनामन्यतमं शङ्केतेति शङ्काभिग्रहः ।
(१) रूपाभिग्रहस्तु । नष्टापहृतमविद्यमानं तज्जातव्यवहारिषु निवेद-
येत् । तच्चेन्न्निवेदितमासाद्यप्रच्छादयेयुः, साचिव्यकरदोषमाप्नुयुः । अजा-
नन्तोऽस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येयन् । न चानिवेद्य संस्थाध्यक्षस्य पुराण-
भाण्डानामाधानं विक्रयं वा कुर्युः ।
(२) तच्चेन्न्निवेदितमासाद्येत, रूपाभिगृहीतमागमं पृच्छेत्—कुतस्ते
में चुपके-चुपके चलते हों; जो गहने आदि की शक्ल को बिगाड़ कर उनकी अनुचित विक्री करते हों; शत्रुता रखने वाले; नीचकर्म करने वाले; नीच जाति में उत्पन्न; अपनी असली सूरत को छिपा कर रखने वाले; जो ब्रह्मचारी आदि न होकर भी ब्रह्मचारियों के वेश में रहते हुए भी नियमों का ठीक-ठीक पालन न करते हों; जिन पर पहिले चोरी का अभियोग लग चुका हो, जो अपने बुरे कर्मों के लिए प्रसिद्ध हों; जो नगर के पहरेदारों तथा अन्य राजकीय कर्मचारियों से छिपें तथा भाग जाँय; जो छिपकर एकान्त में बैठते हों; भयभीत, सूखे मुँह, मुरझाये चेहरे, और भर्राई आवाज वाले; हाथ में हथियार लेकर चलने वाले पुरुष से डर जाने वाले; इत्यादि पुरुषों पर यह शंका की जा सकती है, या तो वह हत्यारा है, या चोर है, या डाकू है, या क्रोधावेश में उसने किसी के ऊपर हथियार चलाया है अथवा वह प्रजा को कष्ट देने वाला प्रजाकण्टक है । यह शंकित पुरुषों की पहिचान का निरूपण किया गया ।
( १ ) चोरी के माल की पहिचान : यदि असावधानी के कारण कोई चीज खो जाय या चोरी चली जाय और खोजने पर जल्दी न मिले तो उस चीज की पूरी हुलिया लिखकर उसी चीज के व्यापारी के यहाँ भेज दी जाय कि इस प्रकार की चीज उसके यहाँ बिकने को आवे तो वह ध्यान रखे । यदि ऐसी वस्तुओं के आ जाने पर भी व्यापारी उसकी सूचना हुलिया देने वाले को न पहुँचाये तो उन्हें वही दण्ड दिया जाय, जो चोरी में सहायता देने वाले व्यक्ति को दिया जाता है । यदि उन्हें इस बात का पता न हो तो उस वस्तु के वापिस कर देने पर उन्हें अपराध से बरी किया जाय । संस्थाध्यक्ष को सूचित किए बिना कोई भी माल न तो गिरबी रखा जाय और न बेचा जाय ।
( २ ) यदि कोई खोई हुई वस्तु किसी व्यापारी के यहाँ आ जाय तो उस वस्तु के लाने वाले व्यक्ति से पूछा जाय 'तुम्हें यह वस्तु कहाँ से मिली है ?' यदि वह कहे
प्र० ८१ : अ० ६ ] सन्दिग्ध परीक्षा ३६९
लब्धमिति । स चेद् ब्रूयात्—दायाद्यादवाप्तममुष्माल्लब्धं, क्रीतं कारित-
माधिप्रच्छन्नम्, अयमस्य देशः कालश्चोपसम्प्राप्तः, अयमस्यार्घः प्रमाणं
लक्षणं मूल्यं चेति । तस्यागमसमाधौ मुच्येत ।(१) नाष्टिकश्चेत्तदेव प्रतिसंदध्यात्, यस्य पूर्वो दीर्घश्च परिभोगः
शुचिर्वा देशस्तस्य द्रव्यमिति विद्यात् । चतुष्पदानापि हि रूपलिङ्गसा-
मान्यं भवति, किमङ्गपुनरेकयोनिद्रव्यकर्तृप्रसूतानां कुप्याभरणभाण्डानाम्-
इति ।(२) स चेद् ब्रूयात्—याचितकमवक्रीतकमाहितं निक्षेपमुपनिधिं
वैयावृत्यकर्म वाऽमुष्येति, तस्यापसारप्रतिसन्धानेन मुच्येत ।(३) नैवमित्यपसारो वा ब्रूयात्, रूपाभिगृहीतः परस्य दानकारण-
मात्मनः प्रतिग्रहकारणमुपलिङ्गनं वा दायकदापकनिबन्धकप्रतिग्राहकोप-
देष्टृभिरुपश्रोतृभिर्वा प्रतिसमानयेत् ।
कि 'मुझे यह बपौती से मिली है मैंने इसको अमुक व्यक्ति से लिया है अथवा मैंने इसको खरीदा या बनवाया है या अभी तक गिरवी रखने के कारण यह वस्तु छिपी रही, यह वस्तु मैंने अमुक स्थान पर अमुक समय में खरीदी है, इसका असली मूल्य यह है, इसके यह लक्षण हैं, यह प्रमाण है, आजकल इसकी इतनी कीमत है' इस प्रकार उसका ठीक-ठीक वृत्तान्त बता देने पर उसको अपराधी न समझा जाय ।
( १ ) यदि खोई गई या चोरी गई वस्तु का मालिक उक्त वस्तु को अपनी बताये तो उन दोनों में से उस वस्तु का असली मालिक उसी व्यक्ति को माना जाय, जो वस्तु का अधिक दिनों से उपभोग करता आ रहा हो और जिसके साक्षी विश्वस्त एवं सच्चे हों । क्योंकि बहुधा यह देखा जाता है कि भिन्न-भिन्न योनियों में पैदा हुए चौपायों तक में अविकल साम्य होता है, ऐसी स्थिति में कोई असम्भव नहीं कि एक ही कारीगर द्वारा एक ही द्रव्य से बनी हुई वस्तुओं में परस्पर साम्य न हो ।
( २ ) यदि उस वस्तु को लाने वाला व्यक्ति ऐसा कहे कि 'यह वस्तु मैं अमुक व्यक्ति से माँग कर लाया हूँ, या किराये पर लाया हूँ, या मेरे पास इसको गिरवी रखा गया है, या कुछ वस्तु बनाने के लिए मेरे पास रखा गया है, या मेरे पास सुरक्षा के लिए दे गया है, या अमुक व्यक्ति से वेतन रूप में मैंने इसको पाया है, तो उस असली व्यक्ति को बुलाया जाय । यदि वह कहे कि 'जो कुछ इसने कहा है वह ठीक है' तो उस वस्तु को लाने वाले व्यक्ति को छोड़ दिया जाय ।
( ३ ) यदि वह कह दे 'इसने ठीक नहीं कहा है' तो वस्तु के लाने वाले व्यक्ति को अदालत में पेश किया जाय और वहाँ वह इस बात को सिद्ध करे कि 'यह वस्तु मैंने इसी से ली है।' साथ ही वह उस वस्तु के देने वाले, दिलाने वाले, लिखने वाले, लेने वाले, लिखाने वाले तथा साक्षियों को अदालत में पेश करे ।
२४ कौ०
| ३७० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
|---|
(१) उज्झितप्रनष्टनिष्पतितोपलब्धस्य देशकाललाभोपलिङ्गनेन शुद्धिः। अशुद्धस्तच्च तावच्च दण्डं दद्यात्। अन्यथा स्तेयदण्डं भजेत इति रूपाभिग्रहः।
(२) कर्माभिग्रहस्तु मुषितवेश्मनः प्रवेशनिष्क्रमणद्वारेण, द्वारस्य सन्धिना बीजेन वा वेधम्, उत्तमागारस्य जालवातायननीध्रवेधम्, आरोहणावतरणे च कुड्यस्य वेधम्, उपखननं वा गूढद्रव्यनिक्षेपग्रहणोपायमुपदेशोपलभ्यम्, अभ्यन्तरच्छेदोत्करपरिमर्दोपकरणमभ्यन्तरकृतं विद्यात्। विपर्यये बाह्यकृतम्। उभयत उभयकृतम्।
(३) अभ्यन्तरकृते पुरुषमासन्नं व्यसनिनं क्रूरसहायं तस्करोपकरणसंसर्गं स्त्रियं वा दरिद्रकुलामन्यप्रसक्तां वा परिचारकजनं वा तद्विधाचारमतिस्वप्नं निद्राक्लान्तमाधिक्लान्तमाविग्नं शुष्कभिन्नस्वरमुखवर्णमनवस्थितमतिप्रलापिनमुच्चारोहणसंरब्धगात्रं विलूननिघृष्टभिन्नपाटितशरीरवस्त्रं
(१) यदि अभियोक्ता अपनी भूली हुई, खोई हुई या चोरी गई वस्तु के मिल जाने पर उसके देश, काल तथा अपने हक को साबित कर दे तो वह वस्तु उसी की समझी जाय। यदि साबित न कर सके तो उतनी ही कीमत की वैसी ही दूसरी वस्तु उससे ली जाय और उतना ही उसको दण्ड दिया जाय। या तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय। यहाँ तक चोरी गये माल के सम्बन्ध में कहा गया।
(२) चोर की पहिचान : यदि चोरी हुए घर में चोर पीछे के दरवाजे से घुसे हों, या दरवाजे के जोड़ों से अथवा नीचे से तोड़ कर घुसे हों, या दीवार के चढ़ने के लिए ईंटे निकाल कर अथवा खोद कर जगह बनाई गई हो, या खिड़की तथा रोशनदान तोड़े गए हों, या जहाँ पर धन रखा गया है ठीक उसी जगह दीवार तथा जमीन खोदी गई हो और मकान के भीतर खोदी गई मिट्टी को लापता कर दिया गया हो, तो समझना चाहिए कि इस चोरी में किसी अन्दरूनी व्यक्ति का हाथ है। यदि इससे विपरीत लक्षण दीखें तो बाहरी व्यक्ति की करामात समझनी चाहिए, और दोनों तरह के लक्षण मिलें तो दोनों तरह की चोरी समझनी चाहिए।
(३) यदि चोरी में किसी अन्दरूनी व्यक्ति का हाथ होने का सन्देह हो तो घर के भीतर या आस-पास के व्यक्तियों को पूछ कर उसकी जाँच-पड़ताल इस प्रकार की जाय, जो जुआरी, शराबी, कुमार्गी हो, क्रूर व्यक्तियों तथा चोरों की संगत करने वाला हो, दरिद्र हो, पराये प्रेम में फँसी हुई स्त्री हो, दूसरों की स्त्रियों पर आसक्त नौकर-चाकर हों, बहुत सोने वाला हो, आलसी लगे, मानसिक कष्टों से दुःखी हो, डरा या घबड़ाया हुआ हो, जिसकी आवाज भर्राई हुई हो, चंचल, बकवादी हो, ऊपर चढ़ने के लिए दूसरे की सहायता ले, जिसके शरीर एवं वस्त्रों में रगड़न के निशान
प्र० ८१ : अ० ६ ] सन्दिग्ध परीक्षा ३७१
जातकिणसंरब्धहस्तपादं पांसुपूर्णकेशनखं विलूनभुग्नकेशनखं वा सम्यक्स्ना-
तानुलिप्तं तैलप्रमृष्टगात्रं सद्योधौतहस्तपादं वा पांसुपिच्छिलेषु तुल्यपाद-
पदनिक्षेपं प्रवेशनिष्कसनयोर्वा तुल्यमाल्यमद्यगन्धवस्त्रच्छेदविलेपनस्वेदं
परीक्षेत । चोरं पारदारिकं वा विद्यात् ।
(१) सगोपस्थानिको बाह्यं प्रदेष्टा चोरमार्गणम् ।
कुर्यान्नागरिकश्चान्तर्दुर्गे निर्दिष्टहेतुभिः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे शंकारूपकर्माभिग्रहो नाम
षष्ठोऽध्यायः, आदितो द्व्यशीतितमः ।
—: ० :—
हों, जिसके हाथ-पैरों में ठेक पड़ी हो, जिसके बाल तथा नाखून बढ़े हुए हों, स्नान करके जिसने चन्दन का या सुगन्धित तेल का शरीर पर लेप कर दिया हो, मालिश करके जिसने तत्काल ही हाथ-पैर धो दिए हों, धूल या कीचड़ में जिसके पैरों के निशान मिल जायें, जिस पर चोरी गये माल की जैसी गन्ध आती हो, जिसके कपड़े फटे हों, चन्दन लगाने से भी जिस पर पसीना चू रहा हो, इस तरह के पुरुषों से पूछ लेने के बाद ही चोर या व्यभिचारी का पता लगाया जाय ।
( १ ) यदि चोर बाहरी हों तो गोप और स्थानिक की सहायता से प्रदेष्टा उनका पता लगाये । नागरिक भी अपने तरीकों से चोर का पता लगायें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में शंकारूपकर्माभिग्रह नामक छठा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ८२ | ## आशुमृतकपरीक्षा |
|---|---|
| अध्याय ७ |
(१) तैलाभ्यक्तमाशुमृतकं परीक्षेत ।
(२) निष्कीर्णमूत्रपुरीषं वातपूर्णकोष्ठत्वक्कं शूनपादपाणिमुन्मीलिताक्षं सव्यञ्जनकण्ठं पीडननिरुद्धोच्छ्वासहतं विद्यात् ।
(३) तमेव संकुचितबाहुसक्थिमुद्वन्धहतं विद्यात् ।
(४) शूनपाणिपादोदरमपगताक्षमुद्वृत्तनाभिमवरोपितं विद्यात् ।
(५) निस्तब्धगुदाक्षं सन्दष्टजिह्वमाध्मातोदरमुदकहतं विद्यात् ।
(६) शोणितानुसिक्तं भग्नभिन्नगात्रं काष्ठै रश्मिभिर्वा हतं विद्यात् ।
(७) सम्भग्नस्फुटितगात्रमवक्षिप्तं विद्यात् ।
(८) श्यावपाणिपाददन्तनखं शिथिलमांसरोमचर्माणं फेनोपदिग्धमुखं विषहतं विद्यात् ।
आशुमृतक की परीक्षा
( १ ) आशुमृतक ( बिना किसी बीमारी या घाव के अचानक ही जिसकी मृत्यु हो जाय ) को तेल में डालकर उसकी परीक्षा की जाय ।
( २ ) जिसका पेशाव तथा पाखाना निकल गया हो, पेट या खाल में हवा भर गई हो, हाथ-पैर सूज गये हों, आँखें खुली हों और गले में निशान पड़ गए हों, तो समझना चाहिए कि उसको गला घोंट कर मारा गया है ।
( ३ ) यदि उसकी बाँहें और टाँगें सिकुड़ी हुई हों तो समझना चाहिए कि उसको फाँसी पर लटका कर मारा गया है ।
( ४ ) यदि उसके हाथ, पैर, पेट फूल गये हों, आँखें धँस गई हों और नाभि ऊपर उठ आई हो तो समझना चाहिए कि उसको शूली पर चढ़ा कर मारा गया है ।
( ५ ) यदि उसकी आँखें तथा गुदा बाहर निकले हों, जीभ कट गई हो, पेट फूल गया हो तो समझना चाहिए कि उसको पानी में डुबा कर मारा गया है ।
( ६ ) जो खून से लथपथ हो, जिसका शरीर जगह-जगह टूट गया हो तो समझना चाहिए कि उसको लाठियों या कोड़ों से मारा गया है ।
( ७ ) जिसका शरीर जगह-जगह फट गया हो उसको समझना चाहिए कि मकान से गिरा कर मारा गया है ।
( ८ ) जिसके हाथ, पैर, नाखून काले पड़ गये हों, मांस, रोयें तथा खाल ढीले
प्र० ८२ : अ० ७ ] आशुमृतक की परीक्षा ३७३
(१) तमेव सशोणितदंशं सर्पकीटहतं विद्यात् ।
(२) विक्षिप्तवस्त्रगात्रमतिवान्तिविरिक्तं मदनयोगहतं विद्यात् ।
(३) अतोऽन्यतमेन कारणेन हतं हत्वा वा दण्डभयादुद्वन्धनिकृत्तकण्ठं विद्यात् ।
(४) विषहतस्य भोजनशेषं पयोभिः परीक्षेत । हृदयादुद्धृत्याग्नौ प्रक्षिप्तं चिटचिटायदिन्द्रधनुर्वर्णं वा विषयुक्तं विद्यात् । दग्धस्य हृदयमदग्धं दृष्ट्वा वा ।
(५) तस्य परिचारकजनं वा वाग्दण्डपारुष्यातिलब्धं मार्गेत । दुःखोपहतमन्यप्रसक्तं वा स्त्रीजनं, दायनिवृत्तिस्त्रीजनाभिमन्तारं वा बन्धुम् । तदेव हतोद्वद्धस्य च परीक्षेत ।
पड़ गये हों और मुख से झाग निकलता हो तो समझना चाहिए कि उसको जहर देकर मारा गया है ।
( १ ) यदि यही हालत हो और किसी कटे हुए स्थान से खून निकल रहा हो तो समझना चाहिए कि उसे साँप से या किसी जहरीले कीड़े से कटवा कर मारा गया है ।
( २ ) जिसका शरीर एवं जिसके वस्त्र अस्तव्यस्त हों और जिसको कै दस्त हुए हों तो समझना चाहिए कि उसे धतुरा या ऐसी ही उन्मादक वस्तुओं को खिला-कर मारा गया है ।
( ३ ) इन उक्त कारणों में से किसी एक कारण से मरे हुए व्यक्ति की परीक्षा की जाय अथवा कोई व्यक्ति किसी हत्या या फाँसी के भय से स्वयं ही फांसी लगाकर या आत्महत्या करके मर सकता है, इसकी भी परीक्षा की जाय ।
( ४ ) विष से मरे हुए व्यक्ति के पेट से अन्न निकाल कर उसकी रासायनिक क्रिया से परीक्षा की जाय । यदि पेट में अन्न न हो तो उसके हृदय का एक अंश काट कर आग में छोड़ा जाय, यदि उसमें 'चिट-चिट' की आवाज निकले या इन्द्र धनुष के समान लाल-पीला धुआँ निकले तो उसे विष द्वारा मारा गया समझना चाहिए । अथवा जलाये हुए व्यक्ति के अधजले, हृदय को देख कर परीक्षा करनी चाहिए ।
( ५ ) अथवा मृतक व्यक्ति के उन नौकर-चाकरों से विष देने वाले का पता लगाया जाय, जिन्हें वाक्पारुष्य और दण्डपारुष्य से तङ्ग किया गया हो । दुःखित तथा परपुरुष गामिनी स्त्री से, मृतक की सम्पत्ति का उत्तराधिकार पाने वाले व्यक्तियों से, और जो व्यक्ति मृतक की विधवा स्त्री को अपनी स्त्री बनाने की इच्छा रखते हों, उनसे मृतक व्यक्ति के सम्बन्ध में पूछ-ताछ की जाये । इसी प्रकार किसी की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर देने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी पूछ-ताछ की जाय ।
३७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
३७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) स्वयमुद्बद्धस्य वा विप्रकारमयुक्तं मार्गेत ।
(२) सर्वेषां वा स्त्रीदायाद्यदोषः कर्मस्पर्धा प्रतिपक्षद्वेषः पण्यसंस्थासमवायो वा विवादपदानामन्यतमं वा रोषस्थानम् । रोषनिमित्तो घातः ।
(३) स्वयमादिष्टपुरुषैर्वा चोरैरर्थनिमित्तं सादृश्यादन्यवैरिभिर्वा हतस्य घातमासन्नेभ्यः परीक्षेत । येनाहूतः सहस्थितः प्रस्थितो हतभूमिमानीतो वा तमनुयुञ्जीत । ये चास्य हतभूमावासन्नचरास्तानेकैकशः पृच्छेत्—केनायमिहानीतो हतो वा, कः सशस्त्रः सङ्गूहमान उद्विग्नो वा युष्माभिर्दृष्ट इति । ते यथा ब्रूयुस्तथानुयुञ्जीत ।
(४) अनाथस्य शरीरस्थमुपभोगं परिच्छदम् ।
वस्त्रं वेषं विभूषां वा दृष्ट्वा तद्व्यवहारिणः ॥
अनुयुञ्जीत संयोगं निवासं वासकारणम् ।
कर्म च व्यवहारं च ततो मार्गणमाचरेत् ॥
(१) स्वयं ही फाँसी लगाकर आत्महत्या कर देने वाले व्यक्ति के कष्टों और आत्महत्या के कारणों का पता लगाया जाय ।
(२) सामान्यतया हत्या और आत्महत्या का कारण क्रोध है, और क्रोध के भी स्त्री, दायभाग, राजकुलों में हुकूमत के लिए संघर्ष, शत्रुता, व्यापार में पारस्परिक हानि की इच्छा और संघ सम्बन्धी विवाद, आदि अनेक कारण हैं । क्रोध के बढ़ जाने पर ही हत्याएँ और आत्महत्याएँ होती हैं ।
(३) जिसने आत्मघात किया हो या जिसको नौकरों से मरवाया गया हो, या जिसको लुटेरों ने धन के लोभ से मारा हो, या किसी व्यक्ति ने रूप-रङ्ग की एकता जानकर अपना शत्रु होने के धोखे में मारा हो, इस प्रकार की हत्याओं के सम्बन्ध में मृतक के पड़ोसियों से पूछ-ताछ की जाय । जिसने उसको बुलाया हो और जो मृत्यु-स्थान पर इधर-उधर घूमते हों, उन सबसे भी पूछताछ की जाय । उनमें से एक-एक को पूछा जाय 'इस व्यक्ति को यहाँ कौन लाया है ? किसने इसको मारा है ? तुम लोगों ने किसी हथियार बन्द आदमी को लुक-छिप कर, भयभीत, इधर-उधर जाते-आते हुए तो नहीं देखा है ?' इस पर वे जैसा कहें तदनुसार मामले को आगे बढ़ाया जाय ।
(४) मृतक के कपड़े, छाता, जूता, माला, वेश (गृहस्थ या सन्यासी) और आभूषण आदि को भली-भाँति देखकर उन वस्तुओं के व्यापारियों से यह पता लगाया जाय कि 'उस व्यक्ति का मेल-जोल किस-किस से था, किसके साथ वह कारोबार करता था, उसका बर्ताव-व्यवहार कैसा था इत्यादि, इन सब बातों का ठीक-ठीक पता लग जाने के बाद हत्यारे की खोज की जाय ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में आशुमृतकपरीक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
प्र० ८२ : अ० ७ ] आशुमृतक की परीक्षा ३७५
( १ ) रज्जुशस्त्रविषैर्वापि कामक्रोधवशेन यः ।
घातयेत्स्वयमात्मानं स्त्री वा पापेन मोहिता ॥
रज्जुना राजमार्गे तां चण्डालेनापकर्षयेत् ।
न श्मशानविधिस्तेषां न सम्बन्धक्रियास्तथा ॥
( २ ) बन्धुस्तेषां तु यः कुर्यात्प्रेतकार्यक्रियाविधिम् ।
तद्गतिं स चरेत्पश्चात्स्वजनाद्वा प्रमुच्यते ॥
( ३ ) संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनात्तैश्चान्योऽपि समाचरन् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे आशुमृतकपरीक्षा नाम सप्तमोऽध्यायः, आदितस्त्र्यशीतितमः ।
— : ० : —
( १ ) जो व्यक्ति काम या क्रोध के वशीभूत होकर, फांसी लगाकर या अस्त्र द्वारा आत्महत्या करे और इसी प्रकार जो स्त्री दुराचार के कारण आत्महत्या करे, चाण्डाल उनकी लाशें रस्सी से बाँधकर बाजार में घसीटता हुआ ले जाय । ऐसे व्यक्तियों के लिए दाहादि संस्कार एवं तिलांजलि आदि संस्कार वर्जित हैं ।
( २ ) ऐसे व्यक्तियों का जो कोई भी भाई-बन्धु उनका दाहादि संस्कार करता हैं, मरने के बाद उसको भी वही गति प्राप्त होती है और जीवितावस्था में उसे जातिच्युत कर दिया जाता है ।
( ३ ) पतित पुरुषों के साथ जो भी व्यक्ति भजन, अध्यापन और विवाह आदि करता है वह भी एक वर्ष के भीतर पतित हो जाता है, और फिर उसके साथ व्यवहार करने वाले लोग भी एक वर्ष में पतित हो जाते हैं ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में आशुमृतकपरीक्षा नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
— : ० : —
प्रकरण ८३ | वाक्यकर्मानुयोगः
अध्याय ८ |
(१) मुषितसन्निधौ बाह्यानामाभ्यन्तराणां च साक्षिणमभिशस्तस्य देशजातिगोत्रनामकर्मसारसहायनिवासाननुयुञ्जीत । तांश्चापदेशैः प्रति-समानयेत् । ततः पूर्वस्याह्नः प्रचारं रात्रौ निवासं च आग्रहणादिति अनुयु-ञ्जीत । तस्यापचारप्रतिसन्धाने शुद्धः स्यात् । अन्यथा कर्मप्राप्तः ।
(२) त्रिरात्रादूर्ध्वमग्राह्यः शङ्कितकः पृच्छाभावादन्यत्रोपकरण-दर्शनात् ।
(३) अचोरं 'चोर' इत्यभिव्याहरतश्चोरसमो दण्डः, चोरं प्रच्छाद-यतश्च ।
(४) चोरेणाभिशस्तो वैरद्वेषाभ्यामपदिष्टकः शुद्धः स्यात् । शुद्धं परिवासयतः पूर्वः साहसदण्डः ।
जाँच और यातना के द्वारा चोरी को अंगीकार कराना
( १ ) जिसकी चोरी हुई हो उसके सामने और बाहर-भीतर के दूसरे लोगों के सामने गवाह से, चोरी के सन्देह में गिरफ्तार हुए व्यक्तियों का देश, जाति, गोत्र, नाम, काम, सम्पति, मित्र और निवासस्थान के सम्बन्ध में पूछा जाय । तदनन्तर जिरह ( उपदेश ) में उसके बयानों की आलोचना की जाय । गवाह के बयानों की आलोचना हो जाने के बाद गिरफ्तार हुए व्यक्तियों से उनका पिछला कार्य, रात का निवास और जिस समय वह पकड़ा गया है उस समय तक के सब कार्यों के सम्बन्ध में पूछ-ताछ की जाय । यदि वह निर्दोष साबित हो जाय तो उसको बरी कर दिया जाय, अन्यथा उसको सजा दी जाय ।
( २ ) चोरी के तीन दिन बाद सन्दिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाय, क्योंकि इतने दिन बीत जाने के कारण उससे सही बातें मालूम नहीं हो सकती है । किन्तु किसी के पास यदि चोरी के सबूत मिल जाँय तो उसे तीन दिन के बाद भी गिरफ्तार किया जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति साधु पुरुष को ( चोर ) बताये उसे चोरी का दण्ड दिया जाय और यही दण्ड उसे भी दिया जाय जो चोर को छिपाने का यत्न करे ।
( ४ ) यदि चोर व्यक्ति दुश्मनी के कारण किसी सज्जन पुरुष को पकड़वाये और यह बात सिद्ध हो जाय तो उसे अपराधी न समझा जाय । जो अधिकारी ( प्रदेष्टा ) निरपराध को दण्ड दे उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
प्र० ८३ : अ० ८ ] जाँच और यातनाविधि ३७७
(१) शङ्कानिष्पन्नमुपकरणमन्त्रिसहायरूपवैय्यापृत्यकरान् निष्पादयेत् । कर्मणश्च प्रवेशद्रव्यादानांशविभागैः प्रतिसमानयेत् ।
(२) एतेषां कारणानामनभिसन्धाने विप्रलपन्तमचोरं विद्यात् । दृश्यते ह्यचोरोऽपि चोरमार्गे यदृच्छया सन्निपाते चोरवेषशस्त्रभाण्डसामान्येन गृह्यमाणो दृष्टश्चोरभाण्डस्योपवासेन वा यथा हि माण्डव्यः कर्मक्लेशभयादचोरः 'चोरोऽस्मि' इति ब्रुवाणः । तस्मात्समाप्तकरणं नियमयेत् ।
(३) मन्दापराधं बालं वृद्धं व्याधितं मत्तमुन्मत्तं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तमत्याशितमामकाशितं दुर्बलं वा न कर्म कारयेत् ।
(४) तुल्यशीलपुंश्चलीप्रावादिककथावकाशभोजनदातृभिरसर्पयेत् । एवमतिसन्दध्यात् । यथा वा निक्षेपापहारे व्याख्यातम् ।
(५) आप्तदोषं कर्म कारयेत् । न त्वेव स्त्रियं गर्भिणीं सूतिकां वा मासावरप्रजाताम् । स्त्रियास्त्वर्धकर्म । वाक्यानुयोगो वा ।
( १ ) संदेह में गिरफ्तार हुए व्यक्ति से चोरी करने के उपाय, उसके सलाहकार सहायक वस्तुएँ, चोरी का माल और उसकी मजदूरी के संबंध में विस्तार से पूछताछ की जाय । उससे यह भी पूछा जाय कि चोरी करते समय मकान के भीतर कौन-कौन गया था, क्या-क्या माल हाथ लगा और किस-किस को कितना-कितना हिस्सा मिला ?
( २ ) जो व्यक्ति चोरी सिद्ध करने वाले उक्त प्रश्नों के सम्बन्ध में तो कुछ न कहे; बल्कि डर के मारे अंट-संट बके तो, उसको चोर न समझा जाय । क्योंकि व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि चोर न होते हुए भी, चोरों के रास्ते से जाता हुआ, चोर के समान शक्ल, हथियार और माल लिए हुए राहगीर को भी चोर समझ कर गिरफ्तार कर लिया जाता है; इसी प्रकार चोरी के माल के पास खड़ा निर्दोष व्यक्ति भी गिरफ्तार होते लोक में देखा गया है । उदाहरण के लिए माण्डव्य चोर न होते हुए भी मार के भय से 'मैं चोर हूँ' यह कहते हुए पकड़ा गया था । इसलिए इस प्रकार के मामलों में खूब सोच-विचार करके ही अपराधी को दण्ड देना चाहिए ।
( ३ ) छोटे अपराधी, बालक, बूढ़ा, बीमार, पागल, उन्मादी, भूखा, प्यासा, थका, अति भोजन किये, अजीर्णरोगी और निर्बल आदि व्यक्तियों को कोड़े आदि मारकर शारीरिक दण्ड न दिया जाय ।
( ४ ) समान स्वभाव वाली वेश्याओं, दूतियों, कथकों, सरायों और होटलों आदि के द्वारा छिपे तौर पर बुरा कर्म करने वाले व्यक्तियों का पता लगाया जाय । पहले कही गई युक्तियों से उन्हें धोखा दिया जाय; अथवा निक्षेप चुराने के संबन्ध में जो उपाय बताये गये हैं उन्हीं को काम में लाया जाय ।
( ५ ) जिसका अपराध साबित हो उसी को दण्ड दिया जाय; किन्तु गर्भिणी और