कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७३४ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ८
७३४ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ८
इस प्रकार भगवान् महाविष्णुके इस परम उपदेशका
लाभ करके पितामह ब्रह्माजीने परम आनन्द प्राप्त किया। तदनन्तर
भगवान् विष्णुके कर स्पर्शसे दिव्यज्ञान प्राप्त करके पितामह
उठे और उठकर उन्होंने प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके
त्रिविध उपचारोंसे भगवान् महाविष्णुकी भलीभाँति पूजा
की। फिर अञ्जलि बाँधकर, विनयपूर्वक समीप जाकर बोले—
'भगवन् ! मुझे भक्तिनिष्ठा प्रदान करें। हे कृपानिधे ! मैं आपसे
अभिन्न हूँ, मेरा सब प्रकार पालन करें' ॥ १६-१७ ॥
'वही हो; साधु ! साधु !' इस प्रकार (ब्रह्माजीकी)
भलीभाँति प्रशंसा करते हुए भगवान् महाविष्णु बोले—'मेरा
उपासक सबसे उत्कृष्ट हो जाता है । मेरी उपासनासे सब
मङ्गल होते हैं। मेरी उपासनासे वह सबको विजय कर लेता है।
मेरा उपासक सबके द्वारा वन्दनीय होता है। मेरे उपासकके
लिये असाध्य कुछ नहीं है। सम्पूर्ण बन्धन पूर्णत. नष्ट हो
जाते हैं। सदाचारीकी जैसे सब लोग सेवा करते हैं, वैसे ही समस्त
देवता उसकी सेवा करते हैं। महाश्रेय भी (उसकी) सेवा
करते हैं। मेरा उपासक उस (उपासना) से निरतिशय अद्वैत
परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है। जो भी मुमुक्षु इस
मार्गसे सम्यक् आचरण करता है, वह परमानन्दस्वरूप परब्रह्म
हो जाता है ॥ १८ ॥
'जो कोई (इस) परमतत्त्व-रहस्य आथर्वण महानारायणो-
पनिषद्का अध्ययन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
वह जान-बूझकर तथा अनजानमे किये पापोंसे मुक्त हो जाता है।
महापापोंसे पवित्र हो जाता है। छिपाकर किये गये, प्रकट-
रूपसे किये गये, बहुत दिनोंतक अधिक रूपमें किये गये सभी
पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सभी लोकोंको जीत लेता है।
उसकी सभी मन्त्रोंके जपमें निष्ठा हो जाती है। वह समस्त
वेदान्तके रहस्यको प्राप्त करके परमार्थका ज्ञाता हो जाता है।
वह सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता (उन भोगोंके द्वारा मिलनेवाले
आनन्दसे युक्त) हो जाता है। उसे सभी योगोंका ज्ञान हो
जाता है। वह समस्त जगत्का परिपालक हो जाता है। वह अद्वैत-
परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है ॥ १९ ॥
'यह परमतत्त्व-रहस्य गुरुभक्तिविहीनको नहीं बतलाना
चाहिये। जो सुनना न चाहता हो, उसे भी नहीं बतलाना चाहिये;
न तपस्याविहीन नास्तिकको और न मेरी (भगवान्की)
भक्तिसे रहित दाम्भिकको बतलाना चाहिये। मत्सरयुक्त
पुरुषको नहीं बतलाना चाहिये। मेरी निन्दामे लगे (भगवान्में
दोषदृष्टि करनेवाले) कृतघ्नको भी नहीं बतलाना चाहिये ॥२०॥
'जो यह परम रहस्य मेरे (भगवान्के) भक्तको
बतलावेगा, वह मेरी भक्तिमें निष्ठावान् होकर मुझे (भगवान्-
को) ही प्राप्त करेगा। जो हम दोनों (ब्रह्माजी एवं भगवान्
विष्णु) के इस संवादका अध्ययन करेगा, वह मनुष्य ब्रह्म-
निष्ठ हो जायगा। जो श्रद्धावान् तथा असूया (दोषदृष्टि) रहित
होकर सुनेगा या हम दोनोंके इस संवादको पढ़ेगा, वह पुरुष
मेरे सायुज्यको प्राप्त करेगा' ॥ २१-२३ ॥
(इतना कहकर) तब महाविष्णु अन्तर्धान हो गये।
तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने स्थान (ब्रह्मलोक) को चले गये ॥२४॥
॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
॥ उत्तरकाण्ड समाप्त ॥
॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
'अथर्ववेदीय
नारदपरिव्राजकोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम उपदेश
नारद-शौनक-संवाद
[बायाँ स्तम्भ]
एक समयकी बात है, परिव्राजकोंके समुदायको सुशोभित
करनेवाले नारदजी सब लोकोंमें विचरण कर रहे थे । उन्होंने
अपूर्व-अपूर्व पुण्य-स्थलों एव पुण्य-तीर्थोंमें जाकर उन्हें
और भी पवित्र बनाया और उन तीर्थोंके दर्शनसे स्वयं भी
चित्तशुद्धि प्राप्त की । उनके मनमे कही किसी भी प्राणीके
प्रति वैरका भाव नहीं था । उनका मन शान्त था और
सम्पूर्ण इन्द्रियाँ वशमे हो गयी थीं । वे सब ओरसे विरक्त
होकर अपने स्वरूपके अनुसंधानमें लगे हुए थे । घूमते-
घूमते वे नैमिषारण्यमे आये, जो नियमजनित आनन्दके
कारण विशेषरूपसे गणना करनेयोग्य पवित्र तीर्थ है । वह
स्थान असंख्य मुनिजनोंसे भरा हुआ था । उन्होंने उस पुण्य-
स्थलीका दर्शन किया । वे अपनी वीणाके तारोंसे वैराग्य-
बोधक 'स रि ग म प ध नि' इन स्वरविशेषोंका झकार
कर रहे थे । वे जागतिक चर्चासे दूर रहकर मुखसे भगवान्-
की मधुर कथाके गीत आलाप रहे थे । उन्हें सुनकर स्थावर-
जङ्गम सभी प्राणी आनन्दसे झूम उठते थे। वे उस भक्तिप्रधान
संगीतसे मनुष्य, मृग, किम्पुरुष, देवता, किंनर तथा अप्सराओंको
भी मोहित कर रहे थे । नैमिषारण्यमें बारह वर्षांका सत्रयाग
चल रहा था । उसमें वेदाध्ययनसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, तपस्यामे सलग्न
रहनेवाले और ज्ञान-वैराग्यसे विभूषित शौनक आदि महर्षि
सम्मिलित हुए थे । उन्होंने परम भागवत ब्रह्मकुमार देवर्षि
नारदको आया देख उनकी अगवानी की । उनके चरणोंमें
मस्तक झुकाया और यथायोग्य अतिथि-सत्कार करके उन्हें एक
सुन्दर आसनपर बैठाया । फिर स्वय भी सब लोग यथास्थान
बैठ गये । तत्पश्चात् शौनक आदि महर्षियोंने विनयपूर्वक
उनसे पूछा—'भगवन् ! ब्रह्मकुमार नारदजी ! ससार-बन्धन-
[दायाँ स्तम्भ]
से मुक्ति कैसे होती है ? उस मुक्तिका उपाय क्या है—यह
हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें' ॥ १ ॥
उनके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वे त्रिभुवनप्रसिद्ध
देवर्षि नारदजी इस प्रकार बोले—'उत्तम कुलमे उत्पन्न पुरुष
यदि उपनयन-सस्कारसे युक्त न हुआ हो तो पहले विधिपूर्वक
उपनयन सस्कार कराये। फिर चौवालीस* सस्कारोंसे सम्पन्न
* चौवालीस सस्कार इस प्रकार हैं—( १ ) गर्भाधान,
( २ ) पुसवन, ( ३ ) सीमन्तोन्नयन, ( ४ ) विष्णुवलि, ( ५ )
जातकर्म, ( ६ ) नामकरण, ( ७ ) उपनिष्क्रमण, ( ८ ) अन्नप्राशन,
( ९ ) चूडाकर्म, ( १० ) कर्णवेध, ( ११ ) अक्षरारम्भ, ( १२ )
उपनयन, ( १३ ) व्रतारम्भ, ( १४ ) समावर्तन, ( १५ ) विवाह,
( १६ ) उपाकर्म, ( १७ ) उत्सर्जन ।
सप्त पाकयज्ञ-संस्था
( १८ ) हुत, ( १९ ) प्रहुत, ( २० ) आहुत, ( २१ ) शूलगव,
( २२ ) बलिहरण, ( २३ ) प्रत्यवरोहण, ( २४ ) अष्टकाहोम ।
सप्त हविर्यज्ञ-संस्था
( २५ ) अग्न्याधान, ( २६ ) अग्निहोत्र, ( २७ ) दर्श-पूर्णमास,
( २८ ) चातुर्मास्य, ( २९ ) आग्रयणेष्टि, ( ३० ) निरूढपशु-
बन्ध, ( ३१ ) सौत्रामणी ।
सप्त सोमयज्ञ-संस्था
( ३२ ) अग्निष्टोम, ( ३३ ) अत्यग्निष्टोम, ( ३४ ) उक्थ्य,
(३५) षोडशी, (३६) वाजपेय, (३७) अतिरात्र, (३८) आप्तोर्याम ।
( ३९ ) वानप्रस्थ, ( ४० ) सन्यास—ये तो चालीस
सस्कार हैं, इनके साथ शौच, सतोष, तप और स्वाध्याय—ये
चार और गिन लेनेसे चौवालीस सस्कार होते हैं ।
७३६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश २
और अपने मनके अनुरूप एक गुरुके समीप निवास करे ।
वहाँ गुरुकी सेवा करते हुए पहले अपनी शाखाका अध्ययन
करे । फिर क्रमशः सम्पूर्ण विद्याओंका अभ्यास करते हुए
बारह वर्षोंतक गुरु-सेवापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करे ।
तत्पश्चात् क्रमशः पचीस वर्षोंतक गृहस्थ-धर्मका और पचीस
वर्षोंतक वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मोंका विधिपूर्वक पालन
करे । चार प्रकारके ब्रह्मचर्य, * छः प्रकारके गार्हस्थ्य† तथा
चार प्रकारके वानप्रस्थ‡-धर्मका भलीभाँति अभ्यास करके
उन-उन आश्रमोंके उचित समस्त कर्मोंका यथावत् अनुष्ठान
करे । फिर साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो समस्त संसारसे ऊपर
उठकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब प्रकारकी
आशाको त्याग दे । इसी प्रकार वासनाओं और एषणाओंके
भी ऊपर उठे—उनका भी त्याग कर दे । फिर सबके प्रति
वैरभावका त्याग करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए
संन्यासी हो जाय । परमहंस-आश्रम (सन्यास) मे रहकर
अपने अच्युतस्वरूपका चिन्तन करते हुए जो शरीर-त्याग
करता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है । यह
उपनिषद् (गूढ रहस्यमय ज्ञान ) है ॥ २ ॥
॥ प्रथम उपदेश समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय उपदेश
संन्यास-ग्रहणका क्रम
तदनन्तर वे शौनक आदि सम्पूर्ण महर्षि इन भगवान्
नारदजीसे विनयपूर्वक बोले—'भगवन् ! हमें सन्यासकी
विधि बताइये।' नारदजीने उनकी ओर देखकर कहा—
'सन्यासका सारा स्वरूप लोकपितामह ब्रह्माजीके मुखसे ही
समझना उचित होगा।' यों कहकर सत्रयागकी पूर्तिके
पश्चात् उन सबको साथ ले वे सत्यलोकमें गये और विधिवत्
ब्रह्मचिन्तनमें लगे हुए परमेष्ठीको प्रणाम करके उनकी स्तुति
करने लगे । स्तुति करनेके अनन्तर पितामहकी आज्ञासे
वे सबके साथ वहाँ यथायोग्य आसनपर बैठे । तदनन्तर
नारदजीने पितामहसे कहा—"भगवन् ! आप हमारे गुरु,
पिता, सम्पूर्ण विद्याओंके रहस्यको जाननेवाले तथा सर्वज्ञ हैं ।
अतः आप मुझे एक रहस्यकी बात, जो मुझे बहुत प्रिय है,
- चार प्रकारके ब्रह्मचारी ये हैं—गायत्र, ब्राह्म, प्राजापत्य तथा बृहन् । इनमेंसे उपनयनके बाद जो तीन राततक बिना
नमकका भोजन करके गायत्रीका जप करता है, वह गायत्र है, जो वेदाध्ययनपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह ब्राह्म है,
जो एक वर्षतक वैदिकव्रत (ब्रह्मचर्य) का पालन करता है, वह प्राजापत्य कहलाता है और जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य-
का पालन करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा गया है।
† छ प्रकारके गृहस्थोंके नाम ये हैं—वार्ताक, शालीन, यायावर, घोर सन्यासिक, उञ्छवृत्ति और अयाचित । इनमें जो
खेती, गो-रक्षा और वाणिज्यरूप वैश्योचित वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हुए स्व-धर्मका पालन करता है, वह वार्ताक कहलाता है,
जो यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें सलग्न रहकर याजन; अध्यापन और प्रतिग्रहके द्वारा
जीवन-निर्वाह करता है, वह शालीन माना गया है, जो सत्पुरुषोंके घरोंपर जा-जाकर उनसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर अपने कुटुम्बके
भरण-पोषणके लिये आवश्यक अन्नका सग्रह करता है, वह यायावर कहलाता है, जो अपने हाथसे निकाले हुए पवित्र जलसे सब कार्य
करते हुए प्रतिदिन साधुपुरुषोंसे एक दिनके निर्वाहके लिये अन्न ग्रहण करता है, वह घोर सन्यासिक है, जो खेत कट जानेपर या
बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अनाजके दानोंको चुन-चुनकर लाता है और उन्हींसे जीवन-निर्वाह करता है, उसे उञ्छ कहते '
हैं और जो किसीसे याचना न करके दैवेच्छासे प्राप्त हुए अन्नपर ही जीवन-निर्वाह करता है, वह अयाचक कहलाता है ।
‡ वानप्रस्थके भी चार भेद हैं—वैखानस, औदुम्बर, बालखिल्य और फेनप । इनमेंसे जो बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए नीवार
आदि अगली अन्नोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म करता है, वह वैखानस कहलाता है, जो सबेरे उठते ही जिस दिशाकी ओर दृष्टि जाय, उसी
दिशामें जाकर वहाँके गूलर, बेर आदि फलों तथा नीवार और श्यामाक आदि अन्नोंका सग्रह करके उन्हींसे प्रतिदिन जीविका
चलाता है, वह औदुम्बर माना गया है, जो जटा और वल्कल धारण करके आठ महीनोंतक वृत्ति उपार्जन करता, चौमासेमें
संगृहीत अन्नका भोजन करता तथा कार्तिककी पूर्णिमाको संगृहीत फूल और फलका त्याग करता है, वह बालखिल्य कहलाता है, तथा जो
सूखे पत्ते और फलका आहार करते हुए जहाँ-कहीं भी रहकर अपने कर्तव्यका पालन करता है, उसे फेनप कहते हैं।
॥ द्वितीय उपदेश समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय उपदेश
संन्यासके अधिकारी, स्वरूप, विधि, नियम एवं आचार आदिका निरूपण
तदनन्तर देवर्षि नारदने अपने पिता ब्रह्माजीसे पूछा—
'भगवन् ! किस प्रकार सन्यास लिया जाता है ? तथा सन्यासका
अधिकारी कौन है ?' ब्रह्माजीने कहा—'अच्छा, पहले सन्यासका
अधिकारी कौन है, इसका निरूपण करके पश्चात् सन्यासकी
विधि बतायी जायगी, सावधान होकर सुनो । नपुंसक, पतित,
किसी अङ्गसे हीन, स्त्रीके प्रति अधिक आसक्त, बहरा, बालक,
गूँगा, पाखण्डी, चक्री ( षड्यन्त्रकारी ), लिङ्गी (वेषधारी),
वैखानसदर द्विज, वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला, शिपिविष्ट
( गंजा अथवा कोढ़ी ) तथा अग्निहोत्र न करनेवाला—ये
वैराग्यवान् होनेपर भी सन्यासके अधिकारी नहीं हैं। यदि
सन्यास ले भी लें, तो भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंका
उपदेश प्राप्त करनेके अधिकारी नहीं होत । जो पहलेसे ही
सन्यासी है, अर्थात् कर्मफलकी इच्छा न रखते हुए वर्णाश्रमोचित
कर्तव्यका पालन करता है, वही सन्यास आश्रममें प्रवेश
करनेका अधिकारी है ॥ १ ॥
'जो दूसरोंसे स्वय नहीं डरता तथा दूसरोको अपनेद्वारा
भय नहीं पहुँचाता, वही परिव्राजक ( सन्यासी ) है—ऐसा
स्मृतियोंका कथन है । नपुसक, किसी अङ्गसे हीन, अंधा,
बालक, पापी, पतित, परस्त्रीगामी, वैखानसदर द्विज, चक्री,
लिङ्गी, पाखण्डी, शिपिविष्ट, अग्निहोत्र न करनेवाला, दो-तीन
बार सन्यास ग्रहण करनेवाला तथा वेतन लेकर अध्यापन
करनेवाला—ये आतुर-सन्यासके सिवा क्रम-सन्यासके अधिकारी
नहीं होते ॥ २—४ ॥
उ० सं० ९३—
७३८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ३
'यदि कहो, आतुर सन्यासका कौन-सा समय विद्वानोंको
मान्य है, तो सुनो। जब प्राण निकलनेका समय अत्यन्त निकट
हो, वह आतुर-सन्यासका ठीक समय माना गया है ।
इससे भिन्न समयको ठीक नहीं माना गया है। आतुर सन्यास
यदि ठीक समयसे हो तो वह मुक्तिमार्गकी प्राप्ति करानेवाला
होता है। आतुर-सन्यासमें भी विद्वान् पुरुष शास्त्रविहित मन्त्रोंका
पाठ करते हुए विधिवत् सब आवश्यक कृत्य करके ही
मन्त्रोच्चारणपूर्वक सन्यास ग्रहण करे। आतुर सन्यास हो चाहे
क्रम-सन्यास, उसके विधि-विधानमे कोई भेद नहीं है, क्योंकि
कर्म मन्त्रकी अपेक्षा करता है और कोई भी मन्त्र ऐसा नहीं
है, जो किसी न किसी कर्मसे सम्बन्ध न रखता हो । मन्त्रहीन
कर्म वास्तवमें कर्म ही नहीं है। अतः मन्त्रका परित्याग न
करे। यदि मन्त्रके बिना कर्म करे तो वह राखमें छोड़ी हुई
आहुतिके समान व्यर्थ होता है। मुने ! शास्त्रविधिके अनुसार
बताये हुए कर्मको संक्षेपमें करनेसे आतुर-सन्यास सम्पन्न होता
है। इसलिये आतुर-सन्यासमें मन्त्रोंका बार-बार उच्चारण
आवश्यक एव विहित है ॥ ५-९ ॥
'यदि अग्निहोत्री पुरुष देशान्तरमें गया हुआ हो और उसे
वैराग्य हो जाय तो जलमे ही प्राजापत्येष्टि करके तत्काल सन्यास
ले ले । यह प्राजापत्य याग केवल मनसे करे अथवा विधिमें बताये
अनुसार मन्त्रोंका उच्चारणमात्र करके करे अथवा वेदोक्त
अनुष्ठान पद्धतिके अनुसार विधिवत् कर्म अनुष्ठान करे । यह
सब करके ही विद्वान् पुरुष सन्यास ग्रहण करे। अन्यथा वह
पतित हो जाता है ॥ १०-११ ॥
'जब मनमे सब पदार्थोंकी ओरसे पूर्ण वैराग्य हो जाय,
तभी सन्यासकी इच्छा करनी चाहिये । इसके विपरीत
आचरण करनेसे मनुष्य पतित हो जाता है । विरक्त बुद्धिमान्
सन्यास ग्रहण करे और रागवान् पुरुष घरपर ही निवास
करे । जो मनमे राग (आसक्ति ) होते हुए भी सन्यास ग्रहण
करता है, वह द्विजोंमे अधम है तथा उसे नरककी प्राप्ति
होती है ॥ १२-१३ ॥
'जिसकी जिह्वा, शिश्नेन्द्रिय, उदर और हाथ आदि सभी
इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें हों तथा जिसने विवाह न किया
हो, ऐसा ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही सन्यास ले । संसारको सारहीन
समझकर सार वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे बुद्धिमान् पुरुष
पूर्ण वैराग्यका आश्रय लेकर विवाह किये बिना ही सन्यास ले
लेते हैं। कर्म ही प्रवृत्ति (संसारमें प्रवृत्त होने) का लक्षण
है और ज्ञान ही सन्यासका मुख्य लक्षण है। अतः बुद्धिमान् पुरुष
ज्ञानको सामने रखकर ही यहाँ सन्यास ग्रहण करे ॥ १४-१६॥
'जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्मका ज्ञान हो जाय, तब
एक दण्ड धारण करके यज्ञोपवीतसहित शिखाको त्याग दे।
जो परमात्मामें अनुरक्त और उनसे भिन्न वस्तुओंकी ओरसे
विरक्त है, जिसके मनसे लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा—ये
सभी एषणाएँ निकल गयी हैं, वही भिक्षान्नभोजन करने
(सन्यास लेने) का अधिकारी है। जैसे साधारण मनुष्य
अपनी पूजा और वन्दना होनेपर अत्यधिक प्रसन्न होता है,
वैसी ही प्रसन्नता जब डंडोंसे पीटे जानेपर भी हो; तभी
वह भिक्षु होनेका अधिकारी होता है। मै ही वासुदेव नामसे
प्रसिद्ध अद्वितीय अविनाशी ब्रह्म हूँ—ऐसा भाव जिसके मनमे
दृढ हो गया है, वही भिक्षान्नभोजनका अधिकारी है।
जिस पुरुषमे शान्ति, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह),
शौच, सतोष, सत्य, सरलता, कुछ भी सग्रह न करनेका
भाव तथा दम्भका अभाव हो, वही सन्यास-आश्रममें प्रवेश
करे। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी
प्राणीके प्रति पापका भाव नहीं रखता, तभी सन्यासका
अधिकारी होता है । (मनुप्रोक्त) दस प्रकारके धर्मोंका
अनुष्ठान करते हुए एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक उपनिषदोंका
श्रवण करे तथा ब्रह्मचर्य पालन एव स्वाध्यायद्वारा ऋषि-
ऋणसे, यज्ञानुष्ठानद्वारा देव ऋणसे और पुत्रकी उत्पत्तिद्वारा
पितृ-ऋणसे मुक्त होकर (विरक्त) द्विज सन्यास ग्रहण करे।
धृति, क्षमा, दम (मनोनिग्रह), अस्तेय (चोरी न करना),
शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, ह्री (निषिद्ध
कर्म एव अविनय आदिसे स्वाभाविक सकोच), विद्या, सत्य
तथा अक्रोध (क्रोधका अभाव)—ये दस धर्मके स्वरूप हैं।
जो भूतकालमे किये हुए भोगोंका चिन्तन, भविष्यमें मिलनेवाले
भोगोकी आकाङ्क्षा तथा वर्तमान समयमें प्राप्त हुए भोगोंका
अभिनन्दन नहीं करता, वही सन्यास-आश्रममे निवास कर
सकता है। जो अन्तःकरणमें स्थित इन्द्रियोंको अपने भीतर
और बाहरके विषयोंको बाहर ही रोक रखनेमें सदा समर्थ
है, वही सन्यास-आश्रममें निवास करे। जैसे प्राण निकल
जानेपर शरीर सुख-दुःखका अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार
प्राण रहते हुए भी जिसपर सुख-दुःखका प्रभाव नहीं पड़ता,
वही सन्यास-आश्रममें निवास करनेका अधिकारी है ॥ १७-२७॥
'दो कौपीन (लँगोटियाँ), एक कन्था (गुदड़ी) और एक
दण्ड—इतनी ही वस्तुओंका परमहंस सन्यासीको सग्रह करनेका
अधिकार है, इससे अधिक सग्रहका उसके लिये विधान नहीं
उपदेश ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३९
है। यदि रागवश अधिक वस्तुओंका संग्रह करता है तो
वह मृत्युके पश्चात् रौरव नरकमें जाकर पुनः पशु-पक्षी आदि
योनियोंमें जन्म लेता है। शीत आदिसे बचनेके लिये फटे-पुराने
साफ कपड़ोंको सीकर एक गुदड़ी बना ले और बस्तीसे
बाहर रहकर गेरुए रंगका वस्त्र धारण करे ।
संन्यासी एक ही वस्त्र धारण करे अथवा बिना वस्त्रके ही
(दिगम्बर) रहे। दृष्टिको इधर-उधर चारों ओर न ले जाकर
एक ही स्थानपर नियन्त्रित रक्खे। मनमें किसी भी वस्तुके
लिये लोभ न आने दे । सदा अकेला ही विचरण करे ।
वर्षा ऋतुमें किसी एक ही स्थानपर निवास करे । कुटुम्ब,
स्त्री-पुत्र, (व्याकरण आदि) वेदाङ्गोंके ग्रन्थ, यज्ञ और
यज्ञोपवीतका त्याग करके संन्यासीको सर्वत्र गूढ भावसे (बिना
अपना विज्ञापन किये) विचरण करना चाहिये ॥ २८-३२ ॥
'काम, क्रोध, घमण्ड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष
हैं, उन सबका परित्याग करके सन्यासी सब ओरसे ममताको
हरु ले। अपने मनमें राग और द्वेषको स्थान न दे। मिट्टीके
ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझे । प्राणियोंकी हिंसासे
सर्वथा दूर रहे तथा सब ओरसे निःस्पृह होकर मुनिवृत्तिसे
रहे। जो दम्भ और अहङ्कारसे मुक्त है, हिंसा और चुगली
आदि दोषोसे दूर है तथा आत्मज्ञानके लिये उपयोगी गुणोंसे
सुशोभित है, वह सन्यासी मोक्षको प्राप्त होता है। इन्द्रियोंकी
विषयोंमे आसक्ति रहनेपर मनुष्य निःसन्देह अनेक प्रकारके
दोषोंमें फँस जाता है; किंतु यदि उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी
प्रकार वशमें कर ले तो वह (मोक्षरूप) सिद्धिको प्राप्त होता है।
विषय भोगोंकी कामना भोगोंके उपभोगसे कदापि शान्त नहीं
होती। भोगसे तो वह उल्टे बढती ही है—ठीक उसी तरह,
जैसे घी डालनेसे आग और भी प्रज्वलित हो उठती है। जो
मधुर या कटु शब्द सुनकर, कोमल या कठोर वस्तुका स्पर्श कर,
स्वादिष्ट या स्वादहीन भोजन करके, सुन्दर या विकृत रूप
देखकर और सुगन्ध या दुर्गन्ध सूँघकर न तो हर्षसे फूल
उठता है और न ग्लानिका ही अनुभव करता है, उसीको
जितेन्द्रिय जानना चाहिये । जिसके मन और वाणी शुद्ध हैं
तथा सर्वदा भलीभाँति दोषोंसे सुरक्षित (बचे हुए) हैं,
वही वेदान्तश्रवणका पूर्ण फल प्राप्त करता है । ब्राह्मण
सम्मानसे विषकी भाँति उद्विग्न रहे और अपमानको अमृतकी
भाँति समझकर सदा उसकी अभिलाषा करे । अपमानित
पुरुष सुखसे सोता, सुखसे जागता और इस लोकमें सुखसे ही
विचरता है. किंतु अपमान करनेवाला स्वतः नष्ट हो जाता
है। अतिवादों (कठोर वचनों) को सहन करे, किसीका
अनादर न करे तथा इस (नश्वर) देहको लेकर किसीके
साथ वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करता है, उसके
प्रति बदलेमें क्रोध न करे। यदि वह गाली देता हो, तो भी
स्वय तो उसे अच्छी ही बात कहे। दो नेत्र, दो कान, दो
नासिकाछिद्र और एक मुख—इन सातों द्वारोंके अनुभवसे
सम्बन्ध रखनेवाली वाणीको कभी असत्यरूपमे न बोले ।
सुख चाहनेवाला पुरुष अध्यात्मतत्त्वमें अनुराग रखकर
स्थिरभावसे बैठे, किसीसे कोई अपेक्षा न रक्खे, मनसे सब
तरहकी कामनाओंको निकाल दे तथा अपने सिवा किसी
दूसरेको सहायक न बनाकर अकेला ही इस ससारमें विचरता
रहे। इन्द्रियोंको वशमें रखने, राग-द्वेषका नाश करने तथा
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेसे मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष)
का अधिकारी होता है। यह शरीर रोगोंका घर है, इसमें हड्डियोंके
खंभे लगे हैं। स्नायुजालकी डोरीसे यह बँधा है। मास और रक्त
इसपर थोप दिया गया हैं। इसे चमड़ेसे मढ दिया गया है। यह
मल और मूत्रसे सदा ही पूर्ण रहता है। इससे दुर्गन्ध निकलती
रहती है। बुढापे और शोकसे व्याप्त होनेके कारण यह सदा
आतुर (असमर्थ) रहता है। वीर्य और रजसे उत्पन्न
होनेके कारण यह रजखल (रजोगुणी अथवा धूलसे भरा
हुआ) है। साथ ही यह अनित्य भी है (आज गिरेगा या
कल, इसका कुछ भी ठिकाना नही है)। इसमें पाँच भूत
सदा ही डेरा डाले रहते हैं, अतः इसे त्याग दे (इसके प्रति
अहता और ममता न रक्खे)। यदि मूर्ख मनुष्य मास, रक्त,
पीव, मल, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायभूत इस
शरीरसे प्रेम करता है तो वह नरकसे भी अवश्य प्रेम करेगा।
इस शरीरमें जो अहम्भाव है, वही कालसूत्र नामक नरकका
मार्ग है, वही महावीचि नामक नरकमें ले जानेके लिये बिछा
हुआ जाल है। तथा वही असिपत्र वन नामक नरककी श्रेणी
है। शरीरमें होनेवाली अहता कुत्तेका मास लेकर चलनेवाली
चाण्डालिनीके समान है। उसको सब प्रकारके यत्नोंद्वारा त्याग
दे। सर्वनाश उपस्थित हो, तो भी कल्याणकामी पुरुषको उसका
संगर्तक नही करना चाहिये। अपने प्रियजनोंमें सुकृत (पुण्य)
को और अप्रियजनोंमे दुष्कृत (पाप) को छोड़कर—स्वयं
उनसे सम्बन्ध न रखकर ध्यानयोगके द्वारा साधक सनातन ब्रह्म-
को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार धीरे धीरे सम्पूर्ण आसक्तियों-
का त्याग करके सन्यासी पुरुष सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त हो
परब्रह्म परमात्मामें ही स्थिति प्राप्त करता है। सिद्धिलाभके
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
[शीर्षक]
७४० · ' नारदपरिव्राजकोपनिषद् [ उपदेश ३
[बायाँ स्तम्भ]
लिये किसी दूसरेको साथी न बनाकर सदा अकेला ही विचरण
करे । एककी सिद्धि देखकर सन्यासी न तो अपने साधन-
को छोड़ता है और न ऋद्धिसे वञ्चित होता है ॥ ३३–५३ ॥
‘पानी पीनेके लिये कपाल (लकड़ी या नारियलका पात्र ),
रहनेके लिये किसी वृक्षकी जड़, पहननेको फटे पुराने कपड़े,
सदा अकेले रहनेका स्वभाव और सबमे समताका भाव—
यही जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है । सन्यासी सम्पूर्ण भूतोंका
हितैषी हो, शान्तभावसे रहे, त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण
करे, एकमात्र आत्मामे ही रमण करनेवाला हो तथा सब
कुछ छोड़कर अकेला घूमता रहे । केवल भिक्षाके लिये ही
वह गाँवमे प्रवेश करे । सन्यासी यदि अकेला रहे, तभी वह
शास्त्रीय आदेशके अनुसार यथार्थ भिक्षु होता है। एकसे
दो होते ही वह 'मिथुन' (जोड़ा ) माना गया है । तीनका
समुदाय होनेपर उसे 'गाँव' कहा गया है, तथा इससे अधिक
व्यक्ति एक साथ हो जायें, तब तो पूरा नगर-सा ही हो
जाता है । सन्यासीको कभी अपने पास अधिक व्यक्तियोको
आनेका अवसर देकर नगर, गाँव अथवा मिथुनकी स्थिति
नहीं उत्पन्न करनी चाहिये । इन तीनों ( नगर, ग्राम और
मिथुन ) का आयोजन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे गिर
जाता है । अनेक व्यक्तियोंका एकत्र सयोग होनेपर उनमे या
तो राजा—प्रभु, सेठ आदिकी बातें होगी, अथवा कहाँ कैसी
भिक्षा मिलती है—यह चर्चा शुरू हो जायगी, अथवा परस्पर
स्नेह, चुगली और मत्सरता आदिके भाव उत्पन्न होगे । इसमे
तनिक भी सदेह नहीं है । सन्यासी निःस्पृह होकर सदा
अकेला रहे । किसीके साथ वार्तालाप न करे । वह सदा
'नारायण' कहकर ही दूसरोंकी बात या नमस्कार आदिका
उत्तर दे । वह एकाकी रहकर मन, वाणी, शरीर
तथा क्रियाद्वारा केवल ब्रह्मका ही चिन्तन करे । किसी तरह
भी मृत्यु या जीवनका अभिनन्दन न .करे । जबतक आयु
पूरी न हो, तबतक केवल कालकी ही प्रतीक्षा करता रहे। न तो
वह मृत्युकी प्रशसा करे और न जीवनका अभिनन्दन करे ।
जैसे भृत्य अपने स्वामीकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहता है,
प्रकार वह एकमात्र की प्रतीक्षा करे। (जिह्वारहित),
॰ लूला, अ एव मुग्ध (जड) की भाँति
नवाला भिक्षु प्रकारके गुणोंसे निश्चय ही मुक्त
। जाता भोजन करते हुए भी 'यह
स्वादिष्ट नहीं है।' इस भावसे अन्नके
तथा हितकर, सत्य और नपी तुली बात
[दायाँ स्तम्भ]
करता है, उसे 'अजिह्व' (जिह्वारहित) कहते हैं। जो आजकी
जन्मी हुई नवजात कन्या, सोलह वर्षोकी युवती नारी तथा सौ
वर्षोंकी आयुवाली वृद्धा स्त्रीको देखकर कहीं भी राग द्वेष आदि
विकारोंके वशीभूत नहीं होता, वह 'षण्डक' (नपुंसक) कहा
गया है । भिक्षाके लिये तथा मल मूत्रका त्याग करनेके लिये
ही जिसका घूमना होता है, और एक स्थानसे दूसरे स्थानपर
जानेके लिये भी जो प्रतिदिन एक योजन (चार कोस) से आगे
नहीं जाता (एक योजनका रास्ता तै करके शेष समय
ध्यान आदिमे व्यतीत करता है), वह 'पङ्गु' (लूला) ही है। चलते
या खड़ा होते समय जिसके नेत्र चार युग (लगभग दस हाथ )
भूमि छोड़कर उससे अधिक दूरतक नहीं देखते, वह सन्यासी
'अन्ध' कहलाता है । हितकी बात हो या अहितकी, मनको
सुख देनेवाली बात हो या शोक प्रदान करनेवाली, उसे सुनकर
भी जो मानो नही सुनता (उनपर ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर'
कहा गया है । विषय अपने समीप हों, शरीरमे शक्ति हो
और सभी इन्द्रियाँ स्वस्थ हों, तब भी जो सोये हुए पुरुषकी
भाँति उन विषयोंके प्रति आकृष्ट नहीं होता, उस भिक्षुको
'मुग्ध' (भोलाभाला) कहते हैं ॥ ५४–६८ ॥
'नट आदिके खेल, जूआ, युवती स्त्री, सम्बन्धियो, भक्ष्य
भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री—इन छः वस्तुओंकी ओर
सन्यासी कभी दृष्टिपात न करे । राग, द्वेष, मद, माया,
दूसरोके प्रति द्रोह तथा अपनाके प्रति मोह—इन छः बातो को
संन्यासी कभी मनसे भी न सोचे । मञ्च (कुर्सी), श्वेत वस्त्र,
स्त्रियोंकी चर्चा, इन्द्रियोंकी लोलुपता, दिनमे सोना और सवारी
पर चलना—ये सन्यासियोंके लिये छः पातक हैं । आत्म
चिन्तन करनेवाला सन्यासी दूरकी यात्राका यत्नपूर्वक त्याग
करे ॥ ६९–७१ ॥
'सन्यासी सदा मोक्षकी हेतुभूता उपनिषद् विद्याका अभ्यास
करे । वह न तो सदा तीर्थोंका सेवन करे और न अधिक उपवास
ही करे । वह अधिक विद्याएँ पढनेका स्वभाव न
बनाये । सभाओंमें व्याख्यान देनेवाला न बने । सदा ऐसा
बर्ताव करे जिसम पाप, शठता और कुटिलता न हो । जैसे
कछुआ सब ओरसे अपने अङ्गोंको समेट लेता है, उसी
प्रकार इन्द्रियोको विषयोंकी ओरसे समेटकर जो इन्द्रिय और
मनके व्यापारको क्षीण कर देता है, कामना और परिग्रहसे
मुँह मोड़ लेता है, सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे हर्ष या शोकके
वशीभूत नहीं होता, नमस्कार (भिन्न-भिन्न देवताओंकी
स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध तर्पण) को छोड़ देता है,
उपदेश ३ ] , * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४१
ममता और अहङ्कारसे शून्य हो जाता है, किसी भी वस्तुकी
अपेक्षा नहीं रखता, निष्काम तथा एकान्तसेवी हो जाता है,
वह निश्चय ही ससार बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ७२-७६ ॥
'प्रमादरहित, कर्म, भक्ति एव ज्ञानसे सम्पन्न तथा केवल
आत्माके ही अधीन रहनेवाला साधक, चाहे वह—ब्रह्मचारी,
गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ—कोई भी क्यों न हो, वैराग्य होनेपर
सन्यास ग्रहण कर सकता है। अथवा यदि वैराग्य मन्द होनेके
कारण उन-उन आश्रमोंमे प्रधानतः आस्था बनी हुई हो तो पहले
ब्रह्मचर्याश्रमकी अवधि पूरी करके गृहस्थ बने, गृहस्थसे वानप्रस्थ
हो जाय और वानप्रस्थ होनेके अनन्तर सन्यास ले । अथवा
तीव्र वैराग्य होनेपर ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही सन्यासमे प्रवेश
करे। या गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रमसे सन्यास ग्रहण
करे। अथवा ब्रह्मचारी हो या अब्रह्मचारी, स्नातक हो या
न हो, अग्निहोत्र त्याग चुका हो या उससे अलग ही रहा हो—
जिस दिन उसे वैराग्य हो, उसी दिन वह घर छोड़कर
सन्यासी हो जाय। सन्यास-आश्रममे प्रवेशके समय कुछ
विद्वान् प्राजापत्य नामक इष्टि करते हैं, उसे करे अथवा न
करे। अथवा केवल 'आग्नेयी' इष्टिका ही अनुष्ठान करे (अग्नि
देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण यह इष्टि 'आग्नेयी' कहलाती
है)। अग्नि ही प्राण है, अतः इस आग्नेयी इष्टिद्वारा
साधक प्राणका ही पोषण करता है। अथवा 'त्रैधातवीया'
इष्टि का ही (जिसका इन्द्र देवतासे सम्बन्ध है) अनुष्ठान करे।
सत्त्व, रज और तम—ये ही तीन धातु हैं, जिनका इस त्रैधातवीय
इष्टिके द्वारा हवन किया जाता है। शास्त्रोक्त विधिसे इष्टि करके
'अयं ते योनि '* इस मन्त्रसे अग्निको सूँघे । मन्त्रका अर्थ
इस प्रकार है—'हे अग्निदेव ! यह समष्टि प्राण तुम्हारे
आविर्भावका कारण है। यह प्राण ही सवत्सरात्मक काल
है, जिससे उत्पन्न होकर तुम उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो
रहे हो। अपनी उत्पत्तिके कारणभूत इस प्राणको जानकर
तुम इसीमे स्थित हो जाओ और इस प्रकार हमारे प्राणसे
तादात्म्य प्राप्त करके हमारे ज्ञानरूपी धनको बढाओ ।' निश्चय
ही यह प्राण अग्निकी उत्पत्तिका कारण है। इसलिये 'प्राण
गच्छ स्वा योनिं गच्छ स्वाहा' ( हे अग्निदेव ! तुम प्राणको
प्राप्त कर, अपने कारणको प्राप्त कर उसके साथ एक हो जाओ)
इसी प्रकार यह मन्त्र कहता है। (इसी प्रकार साधक
भी कहे।)
- अय ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथा ।
त जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धया रयिम् ॥
'आहवनीय अग्निमेसे अग्नि ले जाकर पूर्वोक्त प्रकारसे
इष्टि करके अग्निको सूँघे । यदि अग्नि न मिल सके तो जलम
ही हवन करे। 'निश्चय ही सम्पूर्ण देवता जलस्वरूप हैं।
सम्पूर्ण देवताओके लिये मैं हवन करता हूँ, यह उन्हें प्राप्त
हो' (आपो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहा)
यों कहकर हवन करे। फिर उस जलमेसे थोड़ा सा जल उठाकर
उसका आचमन कर ले । वह घृतयुक्त जल आरोग्यकारक एव
मोक्षदायक होता है। फिर शिखा, यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र,
स्त्री, कर्म, अध्ययन एव अन्यान्य मन्त्रोंका जप त्यागकर
ही आत्मवेत्ता पुरुष परिव्राजक (सन्यासी) होता है।
त्रैधातवीय मोक्षसम्बन्धी मन्त्रोंसे ब्रह्मको जाने। जो सत्य, ज्ञान
आदि लक्षणोसे युक्त है, वही ब्रह्म है, वही उपासनाके योग्य
है। यह ठीक ऐसा ही है' ॥ ७७-७९ ॥
नारदजीने ब्रह्माजीसे पुनः प्रश्न किया—'यज्ञोपवीत
न रहनेपर वह ब्राह्मण कैसे रह सकता है?' तब ब्रह्माजीने
उनसे कहा—'विद्वान् पुरुष शिखासहित सम्पूर्ण सिरके बालो-
का मुण्डन कराके शरीरपर यज्ञोपवीतके रूपमे धारण किये
जानेवाले बाह्य सूत्रको तो त्याग दे और जो अविनाशी परब्रह्म
परमात्मा हैं, उन्हींको सबमे व्यापक सूत्ररूप समझकर अपने
भीतर धारण करे। जो सूचन (ज्ञान) का हेतु हो, उसे
'सूत्र' कहते हैं। अतः 'सूत्र' परमपदका नाम है। जिसने
उस परमपदरूप सूत्रको जान लिया, वही वेदांका पारगामी ब्राह्मण
है। जैसे सूत्रमे मनके पिरोये हुए होते हैं उसी प्रकार जिस
परमात्मामें यह सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है, वही सूत्र है।
योगका ज्ञाता तत्त्वदर्शी योगी उसी सूत्रको धारण करे। विद्वान्
पुरुष उत्तम योगका आश्रय ल बाह्य सूत्रका तो त्याग करे और
इस ब्रह्मस्वरूप सूत्रको धारण करे। जो यो करता है, वही चेतन
है। उम ब्रह्मरूप सूत्रके धारण करनेसे सन्यासी न तो कभी
उच्छिष्ट (जूठे मुँह) होता है और न कभी अपवित्र ही होता
है। ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करनेवाले जिन सन्यासियोंके
भीतर वह ब्रह्मरूपी सूत्र विद्यमान है, वे ही इस ससारमे
सूत्रके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले तथा यज्ञोपवीतधारी हैं।
सन्यासी ज्ञा मयी शिखा धारण करते हैं, ज्ञानमे ही स्थित
होते हैं और ज्ञानका ही यज्ञोपवीत पहनते हैं। उनके लिये
ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। ज्ञान ही सबसे पवित्र
बताया गया है। जैसे अग्निकी शिखा उसके स्वरूपसे भिन्न
नहीं होती, उसी प्रकार जिस विद्वान् सन्यासीने ज्ञानमयी
शिखा धारणा कर रक्खी है, वही शिखाधारी कहलाता है, दूसरे
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ४
लोग, जो केवल केश धारण करते हैं, वास्तविक शिखाधारी नहीं हैं। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मके अधिकारी माने जाते हैं, उन्हींको यह बाह्य सूत्र—यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये, क्योंकि वह कर्मका अङ्ग माना गया है। जिसके ज्ञानमयी शिखा और ज्ञानमय ही यज्ञोपवीत है, उसीमे पूर्णरूपसे ब्राह्मणत्व प्रतिष्ठित है—ब्रह्मज्ञ पुरुष यही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥
'यह सब जानकर ब्राह्मण घरका त्याग करके सन्यासी हो जाय, एक वस्त्र धारण करे, सिरके बाल मुँडा ले और किसी भी वस्तुका संग्रह न करे। यदि शारीरिक क्लेश सहनेमें समर्थ न हो, तो कौपीन आदि धारण करे । यदि वह शारीरिक क्लेश सह सकता हो तो विधिपूर्वक सन्यास ले दिगम्बर रहे। अपने पुत्र, मित्र, स्त्री, माननीय गुरुजन तथा भाई-बन्धु आदिको छोड़कर चला जाय, स्वाध्याय एव वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका त्याग करके समस्त ब्रह्माण्डके साथ सम्बन्ध त्याग दे। कौपीन, दण्ड और अङ्ग ढकनेका वस्त्र भी न रक्खे। सब प्रकारके द्वन्द्वोंका सहन करते हुए न सर्दीकी परवा करे न गर्मीकी; न सुखके लिये लालायित हो और न दुःख-से भयभीत ही हो । निद्राकी भी चिन्ता न करे । मान-अपमानमें समान भावसे रहे। छहों ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो। निन्दा, अहङ्कार, मत्सरता (डाह), गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि छोड़कर, अपने शरीरको मुर्देके समान मानकर, आत्मासे अतिरिक्त दूसरी किसी भी वस्तुको बाहर भीतर न स्वीकार करते हुए, न तो किसीके सामने मस्तक झुकाये, न यज्ञ और श्राद्ध करे, न किसीकी निन्दा या स्तुति करे। अकेला ही स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहे। दैवेच्छासे भोजन आदिके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीपर सन्तुष्ट रहे । सुवर्ण आदिका संग्रह न करे। न किसीका आवाहन करे न विसर्जन । न मन्त्रका प्रयोग करे न मन्त्रका त्याग करे। न ध्यान करे न उपासना। न कोई लक्ष्य हो न लक्ष्यहीनता। न किसीसे अलग रहे, न सयुक्त । न किसी एक स्थानपर रहनेका आग्रह हो, न अन्यत्र जानेका । कोई उसका अपना घर या आश्रम न हो । उसकी बुद्धि सदा स्थिर रहे । जनशून्य भवन, वृक्षकी जड़, देवालय, घास फूसकी कुटिया, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर, नदी-तट, पुलिन (कछार), भूगृह (गुफा), पर्वतीय गुफा, झरनेके पास, चबूतरे या वेदीपर अथवा वनमें रहे । श्वेतकेतु, ऋभु, निदाघ, ऋषभ, दुर्वासा, संवर्तक, दत्तात्रेय तथा रैवतककी भाँति न कोई चिह्न धारण करे और न अपने आचारको ही किसीपर प्रकट होने दे । बालक, उन्मत्त अथवा पिशाचकी भाँति व्यवहार करे । उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्तकी भाँति आचरण करे । त्रिदण्ड, झोली, पात्र, कमण्डलु, कटिसूत्र और कौपीन—सब कुछ 'भूः स्वाहा' कहकर जलमें छोड़ दे ॥ ९० ॥
'कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबको जलमें छोड़कर दिगम्बर होकर विचरे । आत्माका अनुसंधान करे । दिगम्बरकी भाँति रहकर द्वन्द्वोंको सहन करे—उनसे प्रभावित न हो । किसी भी वस्तुका संग्रह न करे । तत्त्व एव ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले ज्ञानमार्गमे भलीभाँति स्थित रहे । मनको शुद्ध रक्खे । प्राण-रक्षाके लिये उचित समयपर हाथरूपी पात्रसे अथवा ओर किसी पात्रसे बिना माँगे ही मिले हुए आहारको ग्रहण करे । लाभ हानिको समान मानकर ममतासे रहित हो जाय । केवल ब्रह्मका चिन्तन करे । अध्यात्म चिन्तनमें ही निष्ठा रक्खे । शुभाशुभ कर्मोंका निर्मूलन करके अपने आत्माके अतिरिक्त प्रत्येक वस्तुको सर्वथा त्याग दे । एकमात्र पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके बोधसे सम्पन्न हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) ऐसी निश्चित धारणा रखकर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी तरह केवल ब्रह्मस्वरूप प्रणवका ही चिन्तन करे । तीनों शरीरोंके प्रति अहंता और ममताका भाव त्यागकर, सर्वत्याग करके ही वह शरीरका त्याग करे । इस प्रकार करनवाला सन्यासी कृतकृत्य होता है, यह उपनिषद् है ॥ ९१-९२ ॥
॥ तृतीय उपदेश समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ उपदेश
संन्यास-धर्मके पालनका महत्त्व तथा संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि
'जो लोक, वेद, विषय भोग तथा इन्द्रियोंकी अधीनता त्यागकर केवल आत्मामें ही स्थित रहता है, वह सन्यासी परमगतिको प्राप्त होता है। श्रेष्ठ सन्यासी नाम, गोत्र आदिके वरण देश, काल, शास्त्रज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, मत और शीलका विज्ञापन न करे। किसी भी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी स्त्रीका स्मरणतक न करे, उनकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे । सम्भाषण, स्मरण, चर्चा और चित्रावलोकन—स्त्रीसम्बन्धी
उपदेश ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४३
इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उसके
चित्तमें अवश्य ही विकार उत्पन्न होता है और उस
विकारसे उसका धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा,
क्रोध, असत्य, माया, लोभ, मोह, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला,
व्याख्यानमे योग देना, कामना, राग, सग्रह, अहङ्कार, ममता,
चिकित्साका व्यवसाय, धर्मके लिये साहसका कार्य, प्रायश्चित्त,
दूसरोंके घरपर रहना, मन्त्र प्रयोग, औषध वितरण, जहर देना,
आशीर्वाद देना-ये सब सन्यासीके लिये निषिद्ध हैं। इनका
सेवन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे नीचे गिर जाता है।
मोक्षधर्ममे तत्पर रहनेवाला मुनि (सन्यासी) अपने किसी
सुहृद्के लिये भी 'आओ, जाओ, ठहरो' स्वागत और सम्मान-
की बात न करे। भिक्षु स्वप्नमें भी कभी किसीका दिया हुआ
दान न ले। दूसरोंको भी न दिलाये और न स्वय किसीको
देने-लेनेके लिये प्रेरित ही करे। स्त्री, भाई, पुत्र आदि तथा अन्य
बन्धु बान्धवोंके शुभ या अशुभ समाचारको सुनकर या देखकर भी
संन्यासी कभी कम्पित (विचलित) न हो; वह शोक और
मोहको सर्वथा त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न
करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (किसी वस्तुका सग्रह न
करना), उद्दण्डताका अभाव, किसीके सामने दीन न बनना,
स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, स्नेह न करना, गुरुकी
सेवा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, सबके
प्रति उदासीनताका भाव, धीरता, स्वभावकी मधुरता, सहन-
शीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान-विज्ञान परायणता, स्वल्प आहार
तथा धारणा-यह मनको वशमें रखनेवाले सन्यासियोंका
विख्यात सुधर्म है। द्वन्द्वोंसे रहित, सत्त्वगुणमें सर्वदा स्थित
और सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला तुरीयाश्रममे स्थित परमहंस
सन्यासी साक्षात् नारायणका स्वरूप है। गाँवमें एक रात रहे और
बड़े नगरमें पाँच रात, किंतु यह नियम वर्षाके अतिरिक्त
समयके लिये ही है, वर्षा में चार महीनेतक वह किसी एक
ही स्थानपर निवास करे। भिक्षु गाँवमे दो रात कभी न रहे।
यदि रहता है तो उसके अन्तःकरणमे राग आदिका प्रसङ्ग
आ सकता है। इससे वह नरकगामी होता है। गाँवके एक
किनारे किसी निर्जन प्रदेशमें मन और इन्द्रियोंको सयममे
रखते हुए निवास करे। कहीं भी अपने लिये मठ या आश्रम
न बनाये। जैसे कीड़े हमेशा घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आठ
महीनोंतक सन्यासी इस पृथिवीपर विचरता रहे। केवल वर्षाके
चार महीनोंमें वह एकत्र निवास करे। वह एक वस्त्र पहन-
कर रहे अथवा बिना वस्त्रके दिगम्बर होकर रहे। उसकी
दृष्टि इधर-उधर चञ्चल न होकर एक लक्ष्यपर ही स्थिर रहे।
वह कभी विषयोंमें आसक्त न हो तथा सत्पुरुषोंके पथको कलङ्कित
न करते हुए ध्यानपरायण रहकर पृथ्वीपर विचरे। संन्यासी
अपने धर्मका पालन करते हुए सदा पवित्र स्थानपर रहे।
योगपरायण भिक्षु पृथवीतलपर दृष्टि रखते हुए ही सदा
विचरण करे। रातको, दोपहरमें तथा दोनों सन्ध्याओंके समय
कभी भ्रमण न करे तथा ऐसे स्थानोंपर भी न घूमे जो
शून्य, दुर्गम तथा प्राणियोंके लिये बाधाकारक हों। गाँवमें एक
रात, पुरवेमे दो दिन, पत्तन (छोटे शहर, कस्बे) में तीन दिन और
नगरमें पाँच रात्रियोंतक सन्यासीको रहना चाहिये। वर्षाकालमे
किसी एक स्थानपर, जो पवित्र जलसे घिरा हुआ हो, निवास करना
चाहिये। भिक्षु सम्पूर्ण भूतोंको अपने ही समान देखता
हुआ अंधे, जड़, बहरे, पागल और गूँगेकी भाँति चेष्टा
रखकर पृथ्वीपर विचरण करे। बहूदक और वनस्थ यतियोंके
लिये तीनों कालोंका स्नान बताया गया है। परन्तु जो 'हंस'
सन्यासी है, उसके लिये एक ही बार स्नान करनेका विधान
है। हमसे भी ऊंची स्थितिमें जो परमहंस है, उसके लिये
स्नान आदिका कोई बन्धन नहीं है ॥ १-२२ ॥
'मौन, योगासन, योग, तितिक्षा, एकान्तशीलता,
निस्पृहता तथा समता - ये सात एकदण्डी सन्यासियोंके
पालन करनेयोग्य नियम हैं। जो परमहंसकी स्थितिमें
पहुँचा हुआ है, उसके लिये स्नान आदि अनिवार्य न
होनेके कारण वह केवल सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंका त्यागमात्र
करे। चमड़ी, मास, रक्त, नाड़ी, मज्जा, मेद और हड्डियों-
के समुदायरूप इस शरीरमे रमनेवाले पुरुषों तथा मल,
मूत्र और पीवमे रमनेवाले कीड़ोंमें कितना अन्तर
है ? सम्पूर्ण कफ आदि घृणित वस्तुओंकी महाराशिरूप यह
शरीर कहाँ और अङ्गशोभा, सौन्दर्य एव कमनीयता आदि
गुण कहाँ । मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, विष्ठा, मूत्र, नाड़ी,
मज्जा और हड्डियोंके समुदायरूप इस शरीरमें यदि प्रीति
करता है, तो नरकमें भी उसकी अवश्य प्रीति होगी। स्त्रियोंके
उच्चारण न करने योग्य गुप्त अङ्ग और सड़े हुए नाड़ीके घावमे
कोई भेद न होनेपर भी मनुष्य अपने मनकी मान्यताके
भेदसे प्रायः ठगा जाता है। स्त्रियोंका वह गुप्त अङ्ग क्या है?
- दो भागोंमें विदीर्ण हुआ चर्मखण्डमात्र। वह भी अपानवायु-
के निकलनेसे दुर्गन्धपूर्ण रहता है। जो लोग उसमें रमण
करते हैं, उन्हें नमस्कार है। भला, इससे बढकर दुस्साहस
और क्या हो सकता है। विद्वान् सन्यामीके लिये न कोई
कर्तव्य शेष रहता है और न चिह्नविशेषको धारण करनेकी
आवश्यकता। वह ममतारहित, निर्भय, शान्त, निर्द्वन्द्व, वर्ण
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् ' [ उपदेश ४
आदिके अभिमानमे रहित एव आहारोपार्जनकी चेष्टासे रहित
होता है । संन्यासी मुनि कौपीन पहनकर रहे अथवा नगा
ही रहकर ध्यानसे तत्पर रहे । इस प्रकार ज्ञानपरायण योगी
ब्रह्मभावकी प्राप्तिमे समर्थ होता है । संन्यासका चिह्नविशेष होने
हुए भी उनमें ज्ञान ही मोक्षका विशेष कारण है । प्राणियोके लिये
नाना प्रकारके चिह्नोंका धारण मोक्षसाधक ज्ञानके अभावम निरर्थक
ही होता है । जिसके विषयमे कोई भी यह नहीं जानता कि
यह साधु है या असाधु, मूर्ख है या बहुत बड़ा विद्वान्, अथवा
सदाचारी है या दुराचारी, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण है । इसलिये
विद्वान संन्यासी किसी भी चिह्नविशेषको न धारण करके
स्वधर्मका ज्ञान रखते हुए सर्वोत्तम ब्रह्मचिन्तन न्तका पालन
करे। वह गूढ धर्मका आश्रय लेकर इस प्रकार आचरण करे, जिससे
उसके आचरणके विषयकी कोई बात दूसरोपर प्रकट न हो ।
समस्त प्राणियोंके लिये सदेहता विषय बना हुआ वह वर्ण और
आश्रमसे रहित हो अन्ध, जड और मूककी भाँति पृथिवीपर
विचरण करे । उस शान्तचित्त सन्यासीका दर्शन करके देवता
भी वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये लालायित होते हैं । जब
आत्मसत्ताके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुके अस्तित्वका चिह्न
भी न रह जाय, तभी कैवल्य प्राप्त होता है । यही ब्रह्म-
तत्त्वका उपदेश है' ॥ २३-३६ ॥
तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा-'भगवन् !
सन्यासकी विधि क्या है, यह बतानेकी कृपा करें।' तब
ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दी और इस प्रकार
कहा-'आतुर-मन्त्रासमे अथवा क्रम सन्यासमे चतुर्थ आश्रम
स्वीकार करनेके लिये पहले प्रायश्चित्तरूपमे कृच्छ्र आदि व्रत
करके फिर अष्टश्राद्ध करे । देवता, ऋषि, दिव्यमनुष्य,
भूत, पितर, माताएँ और आत्मा-इन आठके निमित्त आठ
श्राद्ध करना आवश्यक है । पहले 'सत्य' और 'वसु' नामके
विश्वेदेवोंका आवाहन करे, फिर देवश्राद्धमें ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवजीका, ऋषिश्राद्धमें देवर्षि, राजर्षि तथा
मानवर्षियोंका, दिव्यश्राद्धमे आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों तथा बारह
आदित्योका, मनुष्य-श्राद्धमे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार तथा
सनत्सुजातका, भूतश्राद्धमे पृथिवी आदि पञ्च महाभूतो, नेत्र
आदि इन्द्रियों तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदायोंका,
पितृश्राद्धमें पिता, पितामह तथा प्रपितामहका, मातृश्राद्धमे
माता, पितामही और प्रपितामहीका तथा आत्मश्राद्धमे अपना,
अपने पिताका और पितामहका-यदि उसके पिता जीवित हो
तो पिताको छोड़कर अपना, पितामह और प्रपितामहका
आह्वान करे । आठो श्राद्धोंको एक ही यज्ञका अङ्ग बनाकर
करनेपर प्रत्येक श्राद्धम दो ठाके क्रममे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके
उनका विधिवत् पूजन करे । अथवा यदि आठ पृथक्-पृथक् यज्ञ
किये जायँ तो ऐसी स्थितिम अपनी आग्नामे आये हुए मन्त्रोंद्वारा
इन आठ श्राद्धोंको आठ दिनम या एक दिनमें करे । पितृयाग
( श्राद्धकल्प ) म बताये हुए विधानके अनुसार ब्राह्मणोंके
पूजनसे लेकर भाजनतक सब कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करके
पिण्डदान दे । फिर दक्षिणा और ताम्बूलसे ब्राह्मणोंको सतुष्ट
करके उन्हें विदा कर और शेष कमकी सिद्धिके लिये सात
या आठ छोड़कर शेष गर्भा देर्शोको मुँड़वा दे । साथ
ही मूँछ, दाढी और नग्न भी कटवा दे । ऊपर बताये अनुसार
सात केशाको अवश्य बचा ल । काँग्त और उपस्थके केश भी
न कटाये । औरके पश्चात् स्नान करे । उसके बाद सायंकालीन
सध्या वन्दन करके एक सहस्र गायत्रीका जप करे । फिर
ब्रह्मयज्ञ करके स्वतन्त्र अग्निकी स्थापना कर । फिर अपनी
शाखाका उपमहार करके उसमे बताये अनुसार आज्यभागपर्यन्त
घीकी आहुति दे । हवनकी विधि पूरी करके तीन ग्रास सत्तूका
प्राशन (भोजन) कर । फिर आचमन करके अग्निकी रक्षाके
लिये उसमे ईधन आदि रखकर स्वय अग्निसे उत्तरकी ओर
काल मृगचर्मपर बैठ जाय और पुराण कथा सुनते हुए रातभर
जागरण करे । रातके चौथे पहरके अन्तमे स्नान करके पूर्वोक्त
अग्निमे चरु पकायें । फिर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोद्वारा उस
चरुकी सोलह आहुतियाँ अग्निमे डाले और विरजा होम करके
आचमनपूर्वक दक्षिणासहित वस्त्र, सुवर्ण, पात्र और धेनुका
दान करे और इस प्रकार त्रिविकी पूर्ण करे । इसके बाद
ब्रह्माका विसर्जन करके-
स मा सिञ्चन्तु मरुत समिन्द्र स बृहस्पति ।
स मायमग्नि सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन नायुष्मन्त
करोतु मा ॥*
या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानमात्मन् ।
अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्मे नर्या पुरूणि ॥
यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वा योनिम् ।
जातवेदो भुव आजायमान सक्षय एहि ॥†
- अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि-ये सभी
देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें । ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञान-
रूपी धन तथा साधनकी शक्तिमे सम्पन्न करें, साथ ही मुझको
दीर्घजीवी भी बनायें ।
† हे अग्निदेव ' जो तुम्हारा यज्ञिय ( यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला )
स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से
उपदेश ४ ] • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।
—इन दो मन्त्रोंद्वारा अग्निके आधिदैविक स्वरूपको अपने
आत्मामें स्थापित कर ले। फिर अग्निका ध्यान करके प्रदक्षिणा
और नमस्कारपूर्वक अग्निशालामे उसका विसर्जन कर दे।
तदनन्तर प्रात.मध्याेपासन करके सहस्र बार गायत्रीका जप
और सूर्योपस्थान करे। तत्पश्चात् नाभितक जलमें प्रवेश करके
उसमें बैठकर अष्ट दिक्पालोंको अर्घ्य दे। फिर गायत्रीका
विसर्जन करके सावित्रीको व्याहृतियोंमें प्रविष्ट करे अर्थात्
- सावित्रीदेवीसे व्याहृतियोंमें प्रवेश करनेकी प्रार्थना करे।
प्रार्थनाके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो
वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतो-
क्षित। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।' *
'यदश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृता-
त्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो
भूयासम् ॥†
शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां
भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मण कोशोऽसि मेधयापिहितः। श्रुतं मे
गोपाय ॥‡'
'दारैषणायाश्च धनैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम्'
'ॐ भूः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया'
'ॐ सुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं
मया' §
'इस प्रकार मन्द, मध्यम और उच्च स्वरसे वाणीद्वारा
अथवा मन-ही-मन इन मन्त्रोंका उच्चारण करके तथा 'अभय
मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति) की सृष्टि करते हुए
आत्मारूपमे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यशरूप
होकर अपने कारणरूप यशमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम
पृथिवीसे सम्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।
- इस मन्त्रका अर्थ इसी अङ्कके पृष्ठ ३०८ पर देखिये।
†-‡ ये दोनों मन्त्र एक ही मन्त्रके भाग हैं। पूरे मन्त्रका अर्थ
भी अङ्कके पृष्ठ ३१८ पर देखिये।
§ इन वाक्योंका अर्थ इस प्रकार है—'मैं स्त्रीकी कामना,
धनकी कामना और लोकमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ
गया हूँ। मैंने भूलोकका सन्यास (पूर्णत त्याग) कर दिया।
मैंने भुव (अन्तरिक्ष) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने
स्वर्गलोकको भी सर्वथा त्याग दिया। मैंने भूलोक, भुवर्लोक और
स्वर्गलोक—इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया।'
उ० अं० १५—
सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते स्वाहा' (मेरी ओरसे सब
प्राणियोंको अभयदान दिया गया, मुझसे ही सबकी प्रवृत्ति
होती है) इस मन्त्रसे जलका आचमन करके पूर्व दिशाकी
ओर पूरी अञ्जलि भर जल डालकर 'ॐ स्वाहा' कहकर शेष
बचे हुए शिखाके बालोंको उड़ाड़ डाले। तत्पश्चात्—
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
यज्ञोपवीतं बहिर्न निवसेत् त्वमन्त प्रविश्य मध्ये ह्यजस्रम्।
परमं पवित्रं यशो बलं ज्ञानवैराग्य मेधा प्रयच्छ ॥*
—यह मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत तोड़ डाले। और उसे
जलाञ्जलिके साथ हाथमें लेकर 'ॐ भूः समुद्रे गच्छ स्वाहा'
—इस मन्त्रके द्वारा जलमे ही होम दे। फिर 'ॐ भूः
सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ सुवः सन्न्यस्तं
मया'—इस प्रकार तीन बार कहकर, तीन बार जलको
अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ भूः
स्वाहा' कहकर वस्त्र और कटिसूत्रको भी जलमें ही त्याग दे।
तदनन्तर इस बातका स्मरण करते हुए कि मैं सब कर्मोंका
त्यागी हूँ, दिगम्बर होकर स्वरूपका चिन्तन करते हुए ऊपर
बाँह उठाये हुए उत्तर दिशाकी ओर चला जाय ॥ ३७ ॥
'यदि पूर्ववत् विद्वत्-सन्यासी हो तो गुरुसे प्रणव और
महावाक्यका उपदेश प्राप्त करके, मुझसे भिन्न दूसरा कोई
नहीं है—इस निश्चयके साथ आनन्दपूर्वक विचरण करता
रहे। फल, पत्र और जलका ही आहार करे। पर्वत, वन
तथा देवमन्दिरोंमें संचरण करे। संन्यासके बाद यदि दिगम्बर
हो गया तो वह अपने हृदयमें सदा केवल आनन्दस्वरूप
आत्माकी अनुभूतिका ही भरकर कर्मोंसे अत्यन्त दूर रहनेमें ही
लाभ मानता हुआ फलोंके रस, छिलके, पत्ते, मूल एवं जलसे
प्राण धारण करे और केवल मोक्षकी ही अभिलाषा रखकर
पर्वतकी कन्दराओंमें प्रणवका जप एव ब्रह्मका चिन्तन करते
हुए सर्वत्र संचरण करनेवाले अपने शरीरका त्याग कर दे॥३८॥
- यह यज्ञसूत्र परम पवित्र है। यह पूर्वकालमें प्रजापतिके
साथ ही प्रकट हुआ था। यह सर्वश्रेष्ठ आयुष्य (आयु बढ़ानेका साधन)
है। इस यज्ञोपवीतको मेरे कण्ठमें पहना दो। यह शुभ्र यज्ञोपवीत
मेरे बल और तेजको बढ़ानेवाला हो। यज्ञोपवीत बाहर न रहे। हे
यज्ञमय सूत्र ! तुम मेरे भीतर प्रवेशकर मेरे आत्माके साथ निरन्तर
एक होकर रहो। तुम परम पवित्र हो। मुझे सुयश, बल, ज्ञान,
वैराग्य तथा धारणाशक्ति प्रदान करो।