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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 791, कुल 832 में से

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पृष्ठ 791

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
'अथर्ववेदीय
नारदपरिव्राजकोपनिषद्

शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

प्रथम उपदेश
नारद-शौनक-संवाद

[बायाँ स्तम्भ]
एक समयकी बात है, परिव्राजकोंके समुदायको सुशोभित
करनेवाले नारदजी सब लोकोंमें विचरण कर रहे थे । उन्होंने
अपूर्व-अपूर्व पुण्य-स्थलों एव पुण्य-तीर्थोंमें जाकर उन्हें
और भी पवित्र बनाया और उन तीर्थोंके दर्शनसे स्वयं भी
चित्तशुद्धि प्राप्त की । उनके मनमे कही किसी भी प्राणीके
प्रति वैरका भाव नहीं था । उनका मन शान्त था और
सम्पूर्ण इन्द्रियाँ वशमे हो गयी थीं । वे सब ओरसे विरक्त
होकर अपने स्वरूपके अनुसंधानमें लगे हुए थे । घूमते-
घूमते वे नैमिषारण्यमे आये, जो नियमजनित आनन्दके
कारण विशेषरूपसे गणना करनेयोग्य पवित्र तीर्थ है । वह
स्थान असंख्य मुनिजनोंसे भरा हुआ था । उन्होंने उस पुण्य-
स्थलीका दर्शन किया । वे अपनी वीणाके तारोंसे वैराग्य-
बोधक 'स रि ग म प ध नि' इन स्वरविशेषोंका झकार
कर रहे थे । वे जागतिक चर्चासे दूर रहकर मुखसे भगवान्-
की मधुर कथाके गीत आलाप रहे थे । उन्हें सुनकर स्थावर-
जङ्गम सभी प्राणी आनन्दसे झूम उठते थे। वे उस भक्तिप्रधान
संगीतसे मनुष्य, मृग, किम्पुरुष, देवता, किंनर तथा अप्सराओंको
भी मोहित कर रहे थे । नैमिषारण्यमें बारह वर्षांका सत्रयाग
चल रहा था । उसमें वेदाध्ययनसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, तपस्यामे सलग्न
रहनेवाले और ज्ञान-वैराग्यसे विभूषित शौनक आदि महर्षि
सम्मिलित हुए थे । उन्होंने परम भागवत ब्रह्मकुमार देवर्षि
नारदको आया देख उनकी अगवानी की । उनके चरणोंमें
मस्तक झुकाया और यथायोग्य अतिथि-सत्कार करके उन्हें एक
सुन्दर आसनपर बैठाया । फिर स्वय भी सब लोग यथास्थान
बैठ गये । तत्पश्चात् शौनक आदि महर्षियोंने विनयपूर्वक
उनसे पूछा—'भगवन् ! ब्रह्मकुमार नारदजी ! ससार-बन्धन-

[दायाँ स्तम्भ]
से मुक्ति कैसे होती है ? उस मुक्तिका उपाय क्या है—यह
हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें' ॥ १ ॥
उनके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वे त्रिभुवनप्रसिद्ध
देवर्षि नारदजी इस प्रकार बोले—'उत्तम कुलमे उत्पन्न पुरुष
यदि उपनयन-सस्कारसे युक्त न हुआ हो तो पहले विधिपूर्वक
उपनयन सस्कार कराये। फिर चौवालीस* सस्कारोंसे सम्पन्न

* चौवालीस सस्कार इस प्रकार हैं—( १ ) गर्भाधान,
( २ ) पुसवन, ( ३ ) सीमन्तोन्नयन, ( ४ ) विष्णुवलि, ( ५ )
जातकर्म, ( ६ ) नामकरण, ( ७ ) उपनिष्क्रमण, ( ८ ) अन्नप्राशन,
( ९ ) चूडाकर्म, ( १० ) कर्णवेध, ( ११ ) अक्षरारम्भ, ( १२ )
उपनयन, ( १३ ) व्रतारम्भ, ( १४ ) समावर्तन, ( १५ ) विवाह,
( १६ ) उपाकर्म, ( १७ ) उत्सर्जन ।
सप्त पाकयज्ञ-संस्था
( १८ ) हुत, ( १९ ) प्रहुत, ( २० ) आहुत, ( २१ ) शूलगव,
( २२ ) बलिहरण, ( २३ ) प्रत्यवरोहण, ( २४ ) अष्टकाहोम ।
सप्त हविर्यज्ञ-संस्था
( २५ ) अग्न्याधान, ( २६ ) अग्निहोत्र, ( २७ ) दर्श-पूर्णमास,
( २८ ) चातुर्मास्य, ( २९ ) आग्रयणेष्टि, ( ३० ) निरूढपशु-
बन्ध, ( ३१ ) सौत्रामणी ।
सप्त सोमयज्ञ-संस्था
( ३२ ) अग्निष्टोम, ( ३३ ) अत्यग्निष्टोम, ( ३४ ) उक्थ्य,
(३५) षोडशी, (३६) वाजपेय, (३७) अतिरात्र, (३८) आप्तोर्याम ।
( ३९ ) वानप्रस्थ, ( ४० ) सन्यास—ये तो चालीस
सस्कार हैं, इनके साथ शौच, सतोष, तप और स्वाध्याय—ये
चार और गिन लेनेसे चौवालीस सस्कार होते हैं ।