कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
षष्ठ अध्याय
ॐ
षष्ठ अध्याय
प्रथम खण्ड
आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुसे प्रश्न
अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा—
‘श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर, क्योंकि सौम्य ! हमारे कुलमे
उत्पन्न हुआ कोई भी पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा
नहीं होता’ ॥ १ ॥
वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामे उपनयन करा चौबीस
वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा
बुद्धिमान् और व्याख्यान करनेवाला मानते हुए अनम्रभावसे
घर लौटा। उससे पिताने कहा— ‘सौम्य ! तू जो ऐसा महामना,
पाण्डित्यका अभिमानी और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश
पूछा है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत
हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है।’
[यह सुनकर श्वेतकेतुने पूछा—] ‘भगवन् ! वह आदेश
कैसा है ?’ ॥ २ ३ ॥
[पिताने कहा—] ‘सौम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके
पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि
विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल
मृत्तिका ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणिका ज्ञान
होनेपर सम्पूर्ण लोहमय (सुवर्णमय) पदार्थ जान लिये जाते
हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल
सुवर्ण ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तन (नहन्ना)
के ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार
वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही
है; सौम्य ! ऐसा ही वह आदेश भी है’ ॥ ४-६ ॥
[श्वेतकेतुने कहा—] ‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव
इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते।
अब आप ही मुझे यह बतलाइये।’ तब पिताने कहा— ‘अच्छा,
सौम्य ! बतलाता हूँ’ ॥ ७ ॥
द्वितीय खण्ड
सद्रूप परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति
सौम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।
उसीके विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमे यह
एकमात्र अद्वितीय असत् ही था। उस असत्से सत्की उत्पत्ति
होती है। किंतु हे सौम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला
असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सौम्य !
आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था, ऐसे [आरुणिने]
कहा। उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—
अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर] उसने
तेज उत्पन्न [किया] । उस तेजने ईक्षण किया, ‘मैं बहुत हो
जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर]
उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक
(सन्ताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह
तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है। उस जलने ईक्षण किया,
‘हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।’ उसने अन्नकी
रचना की। इसीसे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न
होता है। वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ १-४ ॥
तृतीय खण्ड
आण्डज, जीवज और उद्भिज्जरूपमें त्रिविध सृष्टि
उन इन [पक्षी आदि] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज
होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज। उस इस [‘सत्’
नामवाली देवताने ईक्षण किया, ‘मैं इस जीवात्मरूपसे इन
तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति
करूँ और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ।’
ऐसा विचारकर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन
तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम-रूपका व्याकरण किया।
उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया। सौम्य !
जिस प्रकार ये तीनों देवता एक एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-
त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ १-४ ॥
खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४१
चतुर्थ खण्ड
त्रिवृत्करण
अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप वह अन्नका है । इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो
है; जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्न- गयी, क्योंकि [ विद्युद्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाम-
का है। इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि मात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ १-४ ॥
[ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल इस ( त्रिवृत्करण ) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ
तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । आदित्यका जो रोहित रूप और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें
है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं
कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्यसे आदित्यत्व कह सकेगा; क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब
निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर कुछ जानते थे । जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है—
अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल सा है वह जलका रूप है—
चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप
है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है । इस है—ऐसा उन्होंने जाना है। तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह
प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमा- इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है।
रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों
—इतना ही सत्य है । विद्युत्का जो रोहित रूप है वह तेजका देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो
रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है जाती है ॥ ५-७ ॥
पञ्चम खण्ड
मन अन्नमय, प्राण और वाक् तेजोमय है
खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो
जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग
मध्यम भाग है वह मास हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक्
होता है वह मन हो जाता है। पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो हो जाता है । [ इसलिये ] सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण
जाता है । उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु
जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये ।' तब आरुणिने
सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है । खाया हुआ 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-४ ॥
षष्ठ खण्ड
मथे जाते हुए दहीका
सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है,
वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है । उसी प्रकार और वह वाणी होता है । इस प्रकार हे सोम्य ! मन अन्नमय
हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने
प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है । सोम्य ! पीये कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर
हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ समझाइये ।' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ १-५ ॥
जाता है; वह प्राण होता है । सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका
उ० मं० ५६—