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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 832 में से

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पृष्ठ 472

ॐ
षष्ठ अध्याय
प्रथम खण्ड
आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुसे प्रश्न

अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा—
‘श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर, क्योंकि सौम्य ! हमारे कुलमे
उत्पन्न हुआ कोई भी पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा
नहीं होता’ ॥ १ ॥
वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामे उपनयन करा चौबीस
वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा
बुद्धिमान् और व्याख्यान करनेवाला मानते हुए अनम्रभावसे
घर लौटा। उससे पिताने कहा— ‘सौम्य ! तू जो ऐसा महामना,
पाण्डित्यका अभिमानी और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश
पूछा है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत
हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है।’
[यह सुनकर श्वेतकेतुने पूछा—] ‘भगवन् ! वह आदेश
कैसा है ?’ ॥ २ ३ ॥
[पिताने कहा—] ‘सौम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके
पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि
विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल
मृत्तिका ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणिका ज्ञान
होनेपर सम्पूर्ण लोहमय (सुवर्णमय) पदार्थ जान लिये जाते
हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल
सुवर्ण ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तन (नहन्ना)
के ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार
वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही
है; सौम्य ! ऐसा ही वह आदेश भी है’ ॥ ४-६ ॥
[श्वेतकेतुने कहा—] ‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव
इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते।
अब आप ही मुझे यह बतलाइये।’ तब पिताने कहा— ‘अच्छा,
सौम्य ! बतलाता हूँ’ ॥ ७ ॥

द्वितीय खण्ड
सद्रूप परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति
सौम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।
उसीके विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमे यह
एकमात्र अद्वितीय असत् ही था। उस असत्से सत्की उत्पत्ति
होती है। किंतु हे सौम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला
असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सौम्य !
आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था, ऐसे [आरुणिने]
कहा। उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—
अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर] उसने
तेज उत्पन्न [किया] । उस तेजने ईक्षण किया, ‘मैं बहुत हो
जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर]
उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक
(सन्ताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह
तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है। उस जलने ईक्षण किया,
‘हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।’ उसने अन्नकी
रचना की। इसीसे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न
होता है। वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ १-४ ॥

तृतीय खण्ड
आण्डज, जीवज और उद्भिज्जरूपमें त्रिविध सृष्टि
उन इन [पक्षी आदि] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज
होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज। उस इस [‘सत्’
नामवाली देवताने ईक्षण किया, ‘मैं इस जीवात्मरूपसे इन
तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति
करूँ और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ।’
ऐसा विचारकर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन
तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम-रूपका व्याकरण किया।
उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया। सौम्य !
जिस प्रकार ये तीनों देवता एक एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-
त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ १-४ ॥