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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेदके

उपनिषत्तत्त्व
( श्रीमदामण्डलके एक साधु-सेवकद्वारा लिखित )

सम्पूर्ण वेद तीन भागोंमें विभक्त हैं। यथा—उपनिषद्-
भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेदके
ज्ञानकाण्डका प्रकाशक है। इस मन्वन्तरमें वेदकी ११८०
शाखाएँ आविर्भूत हुईं । इतनी ही संख्यामें उपनिषद्,
ब्राह्मण और मन्त्रभाग भी प्रकट हुए। पुराणों और उप-
निषदोंमें वेदकी यह संख्या पायी जाती है। कलिकालके
प्रभावसे इस संख्यामेंसे सहस्रांश भी इस समय नहीं मिलता
है। उपनिषदोंके तुल्य ग्रन्थ पुराणोंमे भी मिलते हैं। जैसे
कि महाभारतमें श्रीमद्भगवद्गीता, जो कि उपनिषदोंका सार
कही जाती है।
वेद अनादि है । सृष्टिके प्रारम्भमें हमारे ब्रह्माण्डमें
जितना वेद प्रकट हुआ है, उसकी स्थिति सदा हमारे ब्राह्म-
सर्गमें बनी रहती है । हमारे मृत्युलोकरूपी भारतवर्षमे
वेदोंका आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है। सृष्टिकी
प्रारम्भिक दशामे महर्षियोंके अन्तःकरणोंमें वेद ज्यों का त्यों
सुनायी देता है, जैसे रेडियो-यन्त्रद्वारा हजारों कोसोंके शब्द
ज्यों-के-त्यों सुनायी देते हैं, उसी प्रकार महर्षियोंके अन्तः-
करणोंमें श्रुतियाँ अपने स्वरूपमें यथावत् प्रकट होती हैं।
जिन पूज्यपाद महापुरुषोंके हृदयोंमे वेद आविर्भूत होते हैं,
वे ही महर्षि कहलाते हैं। कितना ही बड़ा ज्ञानी पुरुष क्यों न
हो, वह मन्त्रद्रष्टा न होनेसे महर्षि नहीं कहला सकता। वेद-
मन्त्रोंके द्रष्टा ही ऋषि अथवा महर्षिपद-वाच्य हो सकते हैं।
शास्त्रोंमें ऐसा प्रमाण मिलता है कि प्रत्येक सत्ययुगमे
सम्पूर्ण वेदोंका आविर्भाव मोक्षभूमिरूप भारतखण्डमें हुआ
करता है और प्रत्येक कलियुगमें वेदोंका ह्रास होते होते इस मृत्यु-
लोकसे वेद ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। यही वेदके आविर्भाव
और तिरोभावका रहस्य है। वेदका स्वरूप समझनेके लिये
सबसे पहले देश-कालका ज्ञान अवश्य होना चाहिये। वेदके
साथ अनादि-अनन्तकाल और ब्रह्माण्डरूपी देश तथा ब्रह्मके
सदृश सत्, चित् और आनन्दभावका कैसा घनिष्ठ सम्बन्ध
है, उसके समझे बिना वेदका स्वरूप ठीक ठीक समझमें नहीं
आता। ब्रह्मका स्वरूप त्रिभावात्मक है। इस कारण
मीमांसाशास्त्र कहता है कि वेद भी तीन भावोंसे पूर्ण हैं और
ब्रह्मकी स्वाभावरूपिणी प्रकृति जब त्रिगुणमयी हैं तो शब्द-
ब्रह्मरूपी वेद भी तीन गुणोंसे पूर्ण हैं। वेद त्रिभावात्मक
होनेके कारण वेदका मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग और
उपनिषद्भाग भी प्रत्येक त्रिभावात्मक है और उनकी प्रत्येक
श्रुतिका तीन प्रकारसे अर्थ होना निश्चित है। इसी कारण
स्मृतिशास्त्र कहता है कि जैसे चावल, दुग्ध और
शर्करा—तीनों मिलकर परम पवित्र सुमिष्ट परमान्न बनता है,
वैसे ही प्रत्येक श्रुति त्रिभावात्मक होकर सब प्रकारके
कल्याणका कारण होती है। अतः जबतक त्रिभाव-रहस्य
और त्रिगुण रहस्यका ज्ञान साधकको नहीं होता और जबतक
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छह
वेदाङ्ग तथा न्यायदर्शन और वैशेषिक-दर्शन—ये दोनों
पदार्थवाददर्शन, योगदर्शन और सांख्यदर्शन—ये दोनों
सांख्यप्रवचनदर्शन और वेदके कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और
ज्ञानकाण्डके तीन मीमांसादर्शन—इस प्रकारके सात वैदिक
दर्शनोंका अच्छी तरहसे अनुशीलन साधक नहीं करता और
साथ-ही-साथ भगवद्-उपासनाके द्वारा योगयुक्त अन्तर्मुखवृत्ति
नहीं प्राप्त कर लेता, तबतक वेदार्थ समझनेमे साधक समर्थ
नहीं होता।
उपनिषद्-ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सृष्टिज्ञान और देश-
कालका ज्ञान प्राप्त करना अत्यावश्यक है। सृष्टिके साथ जो
कालका सम्बन्ध है, उसके विषयमे जैसा सुन्दर, विस्तृत और
अलौकिक वर्णन वेद और शास्त्रोंमें पाया जाता है, वैसा और
कहीं देखने अथवा सुननेमे नहीं आता। हमारे इस मृत्युलोक
भारतवर्षकी आयुके निर्णय करनेमें अनेक पदार्थ विद्यासेवी
(साइन्टिस्ट) विद्वानोंने अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की हैं।
उन्होंने सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें, मनुष्य सृष्टिके विषयमें,
वेदके आविर्भावके विषयमे और इसी प्रकारसे नाना देश और
नाना पर्वत आदिकी सृष्टिके स्तरोके विषयमें नाना कल्पनाएँ
भी की हैं। किसीने इसकी दो-चार हजार वर्षोंकी ही गणना
की है। अब वह गणना कुछ आगे अवश्य बढ़ी है; किंतु
उसके साथ भारतवर्षके प्राचीन सिद्धान्तोंको मिलानेपर एक
कौतुक-सा मालूम होता है। सनातन धर्मके प्राचीन ग्रन्थोंमें
एक ब्रह्माण्डकी आयुका निर्णय करनेमें इस प्रकारकी गणना
पायी जाती है कि १०० त्रुटिका एक पर, ३० परका एक
निमेष, १८ निमेषोंकी एक काष्ठा, २० काष्ठाओंकी एक कला,
३० कलाओंकी एक घटिका, दो घटिकाओंका एक क्षण, ३०

[Header] * उपनिषत्तरङ्ग * ५७.

क्षणोंका एक अहोरात्र अर्थात् मनुष्यका पूरा दिन-रात होता है।
इसी संख्यासे मानववर्ष-गणना की जाती है। इस हिसाबसे
१७२८००० मानववर्षोंका सत्ययुग, १२९६००० मानववर्षों-
का त्रेतायुग, ८६४००० वर्षोंका द्वापरयुग और ४३२९०००
वर्षोंका कलियुग है और ४३२०००० मानववर्षोंका महायुग
होता है। ७१ महायुगोंका अर्थात् ३०६७२०००० वर्षोंका
एक मन्वन्तर होता है और ८६४००००००० वर्षोंका ब्रह्मा-
का एक दिन रात अर्थात् एक कल्प होता है।
३११०४०००००००००० मानववर्षोंमें एक ब्रह्मापदधारी
बदल जाते हैं। १८६६२४००००००००००००० मानव-
वर्षोंमें एक विष्णुपदधारी बदल जाते हैं । इसी प्रकार
४४७८९७६०००००००००००००००००० मानववर्षोंकी
भगवान् शिवकी आयु समझी जाती है, जो ब्रह्माण्डका प्रलय
करके ब्रह्ममें लय हो जाते हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-भाण्डोदरी
ब्रह्मशक्ति जगदम्बाकी एक त्रुटिके शिवजीके पाँच करोड़ निमेष
होते हैं। इससे एक ब्रह्माण्डके लय होनेका समय निर्धारित
किया जा सकता है। इससे यह तात्पर्य है कि जगदम्बाकी एक
त्रुटिमे एक ब्रह्माण्डका सम्पूर्ण प्रलय हो जाता है। जैसे ब्रह्मा-
विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिके प्रकट होनेसे पहले प्राकृतिक
सृष्टि होती है और उसमे ब्रह्माण्डके उपादानरूपी परमाणु-
पुञ्जोंको एकत्र करनेमे समय लगता है, उसी प्रकार भगवान्
शिव जीवोंका प्रलय करके ब्रह्मीभूत हो जाते हैं। उसके बाद
भी परमाणुपुञ्जोंके बिखरनेमें समय लगता है। सृष्टिके और
प्रलयके सब कार्य जिस समयमें हों, उस समयको ब्रह्माण्डकी
आयु कह सकते हैं और वह ब्रह्माण्डकी आयुका काल
श्रीजगदम्बाकी एक त्रुटि समझी जा सकती है। *

श्रीमार्कण्डेय आदि पुराणोंमें १४ मन्वन्तरोंका संक्षिप्त
वर्णन है और यह भी स्पष्ट वर्णन है कि ७१ महायुगोंका एक
मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें देवराज इन्द्रपदधारी
देवता भी कालराज मनुके साथ ही बदल जाते हैं। उस
समय भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—तीनोंके बड़े-बड़े पदधारी

  • (१) चतुर्युगसहस्राणि दिन पैतामहं भवेत् ।
    पितामहसहस्राणि विष्णोश्च घटिका मता ॥
    विष्णोर्द्वादशसहस्राणि कलार्धं रौद्रमुच्यते ।
    (देवीमीमांसा भाष्य, उत्पत्तिपादसूत्र ४)
    (२) चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते ।
    पितामहसहस्राणि विष्णोरेका घटी मता ॥
    विष्णोर्द्वादशसहस्राणि निमेषार्धं महेशितु ।
    दश कोट्यो महेशानां श्रीमातुस्त्रुटिरूपका ॥
    ( शक्तिरहस्य )

सब देवता बदल जाते हैं । कर्मके चालक देवता, ज्ञानके
चालक ऋषि और स्थूल शरीर आदिके सञ्चालक पितृगण,
जो तीनों ही तीन श्रेणीके देवता हैं, इनके जितने बड़े-बड़े
पदधारी हैं, वे सब प्रत्येक मन्वन्तरमें बदल जाया करते हैं !
इस कारण भूः, भुवः, स्वः—इन तीनों लोकोंकी शृङ्खला और
सभ्यता आदिमें बड़ा अन्तर पड़ जाता है। प्रत्येक मन्वन्तरमे
जो परिवर्तन होता है, वह भूः, भुवः, स्व.रूपी त्रिलोकमें होता
है। मन्वन्तरमें कभी पूरा प्रलय नहीं होता, खण्ड-प्रलय
होता है और देवपदधारी तो अवश्य ही बदल जाते हैं। ये
सब बातें प्राचीन आर्योंके वेद और शास्त्रोंसे भलीभाँति
प्रमाणित हैं। इन सब कालके विभागोंकी संख्याके देखनेपर
दैवीजगत्के माननेवाले विद्वान् तो आनन्दित होते ही हैं, किंतु
जो दैवीजगत्पर आस्था न भी रखते हों, वे विद्वान्
भी प्राचीन आर्योंके कालके सम्बन्धके इन हिसाबोंको देखकर
चकित हुए बिना न रहेंगे। उपनिषदोंके देश-काल-ज्ञान प्राप्त
करनेके लिये शास्त्रोक्त दो मतोंका जानना परमावश्यक है। एक
'योगी-मत' और दूसरा 'वैष्णव-मत ।' योगी-मतमें—एक
अद्वितीय ब्रह्मसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि होती है और पुनः उसीमे
ब्रह्माण्डका लय हो जाता है। यह मत अद्वैतवादका पोषक है।
दूसरा मत वैष्णव-मत कहलाता है। उसके अनुसार सृष्टि प्रवाह-
रूपसे अनादि अनन्तरूप है । ब्रह्माण्ड कितने हैं, इसकी
गणना कोई नहीं कर सकता । ऐसे अगणित ब्रह्माण्डोंके
बीचमे एक गोलोक-धामका होना यह मत मानता है। उस
गोलोकधाममें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्णचन्द्र
विराजते हैं और वहाँ रास-महोत्सवका निरन्तर होना माना
जाता है । वे यह भी मानते हैं कि पूर्णावतार श्रीकृष्णने
भक्तोंके ऊपर कृपा करके इस महारास-महोत्सवका नमूना
व्रजगोपिकाओंको दिखाया था । ऐसे दूसरे मतवाले जब
अनादि अनन्त सृष्टि प्रवाहको मानते हैं तो स्वतः ही अद्वैत-
वादियोंकी तरह वे मुक्ति नहीं मानते हैं। उपनिषदोंमें अधिकतर
पहले मतका ओर कहीं-कहीं दूसरे मतका आभास मिलता है।

जब कोई ब्रह्माण्ड प्रथम उत्पन्न होता है, तब उस
ब्रह्माण्डके परमाणुपुञ्ज प्रकृति माताकी आकर्षणशक्तिके अनुसार
एकत्रित होकर जीववासोपयोगी स्थूल या सूक्ष्म लोकोंको उत्पन्न
करते हैं । उस समय एक ब्रह्माण्डके अधिष्ठाता भगवान् ब्रह्मा,
भगवान् विष्णु और भगवान् शिवका आविर्भाव नहीं रहता
है। उस समय चाहे देवलोकसमूह हों अथवा हमारा मृत्यु-
लोक हो, इन सबका केवल गोलक बनता है । इसी दशाको
प्राकृतिक सृष्टि कहते हैं। क्योकि ये सब ब्रह्मप्रकृति त्रिगुण-
मयी जगदम्बाके स्वाभाविक नियमके अनुसार ब्रह्माण्ड-गोलक-

बन जाते हैं। उस समय उनमें जीवोंका वास नहीं रहता।
इस विषयमें पूज्यपाद प्राचीन ऋषिगण और आजकलके
पदार्थविद्या (साइन्स) के विद्वज्जन दोनों एकमत हैं।
पदार्थ विद्यासेवी (साइन्टिस्ट) भी साधारणतः यही कहते
हैं कि हमारी पृथिवी पहले जीववासोपयोगी नहीं थी। इसी
जीववासोपयोगी बननेसे पहलेकी अवस्थाका नाम 'प्राकृतिक
सृष्टि' है। उसके अनन्तर सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की इच्छासे
जब ब्रह्मा विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिका आविर्भाव होता है और
भगवान्‌ ब्रह्मा अपनी इच्छाशक्तिसे जीव-सृष्टिका प्रारम्भ करते हैं
और देवसृष्टि प्रारम्भ हो जाती है, उसीको 'ब्राह्मी सृष्टि' कहते
हैं। उसके अनन्तर प्रजापतिगण उत्पन्न होकर विस्तृत सृष्टि-
को केवल अपनी मानसशक्तिसे उत्पन्न करते हैं, वही 'मानस-
सृष्टि' कहाती है। यह सृष्टि भी देवताओंकी ओरसे ही होती
है। उसके अनन्तर स्त्री पुरुषके संयोगसे जो सृष्टि होती
है, वह 'वैजी-सृष्टि' है। यही चार प्रकारका सृष्टिप्रकरण
है, जो प्राचीन वेद और शास्त्रोंमे पाया जाता है।
वेदके मन्त्रभाग और ब्राह्मणभागके सब मन्त्रोंमें यद्यपि
त्रिभावात्मक तीन प्रकारके प्रयोग हो सकते हैं, परन्तु उपनिषदों-
में, जो वेदके ज्ञानकाण्डके प्रकाशक हैं, इन तीन भावोंका
अद्भुत रहस्य प्रकाशित है। बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंके
पाठक इसको अच्छी तरह समझ सकते हैं। यद्यपि इस समय केवल
१०८ के लगभग उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं। शेष सहस्राधिक
लुप्त हो गये हैं तो भी जो उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं, वे
परमानन्दप्रद हैं। पञ्चम वेदरूपी महाभारतकी श्रीमद्भगवद्-
गीताके पाठ करनेसे भावुक भक्त यह समझ सकते हैं कि
वह जिन उपनिषदोंका सार कही जाती है, उनकी ज्ञान-
गरिमा कैसी है। उपनिषदोंके द्वारा काल ज्ञान, चतुर्दशभुवन-
रूपी देश-ज्ञान, दैवी जगत्‌का विस्तृत ज्ञान, देवपदधारियोंका
ज्ञान, सब वैदिक दर्शनोंका ज्ञान और कर्मका ज्ञान, जो
कर्म ब्रह्मके सचिदानन्दभावके त्यागका कारण होता है, उसका
रहस्य तथा अन्तिम वैदिक मीमांसाका सिद्धान्त, यथा-
जगत् ही ब्रह्म है, ब्रह्म ही जगत् है, जीव ही ब्रह्म है इत्यादि
आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण सभी सिद्धान्त मिलते हैं और वैदिक
उपनिषदोंमे सब प्रकारके ज्ञानका बीज कैसे पाया जाता है।
इसका दिग्दर्शन श्रीमद्भगवद्गीता कराती है, जिसके महत्त्व-
के विषयमे सारा संसार एकमत है। यही उपनिषत्तत्त्व है।


औपनिषद-सिद्धान्त

(श्रीश्रीस्वामीजी श्रीविशुद्धानन्दजी परिव्राजक)

विश्वके समस्त मानव समाजको नव चेतना देकर
आत्यन्तिक शान्ति प्रदान करनेका श्रेय हमारे औपनिषद-
सिद्धान्तको है। उपनिषदें साक्षात् कामधेनु हैं। ब्रह्मसूत्रोंकी
रचना इन्हींके आधारपर हुई है तथा श्रीमद्भगवद्गीता भी
गोपालनन्दनद्वारा दोहन किया हुआ इन्हीका परममधुर दुग्धा-
मृत है। भारतवर्षके जितने भी आस्तिक सम्प्रदाय हैं, सबके
आधार ये ही तीन ग्रन्थरत्न हैं, जो 'प्रस्थानत्रयी'के नामसे
प्रख्यात हैं। सभी सम्प्रदायों—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत,
द्वैताद्वैत, द्वैत और शिवाद्यैतादिकी आधारभूता प्रस्थानत्रयी
है। इस प्रस्थानत्रयीके आधारपर ही सभी सम्प्रदायाचार्योंने
अपने अपने विचारानुसार विवेचनात्मक व्याख्या करके परम
सत्यका अन्वेषण किया है।
उपनिषदोंका प्रादुर्भाव वेदके अत्युच्च शीर्षस्थानीय भाग-
से हुआ है, जिन्हें प्रायः वेदान्त, ब्रह्मविद्या या आम्नाय-
मस्तक कहते हैं। वस्तुतः उपनिषद् ही ब्रह्मविद्याके आदि-
स्रोत हैं। उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूपमें
विकसित हुई ज्ञान-गङ्गा जीवोंके पाप तापको शमन करती है।
जिनके मन्त्रोंके पाठमात्रसे ही हृदय एक अपूर्व मस्तीका
अनुभव करने लगता है, उन उपनिषदोंकी महिमा वर्णन
करना सूर्यको दीपक दिखानेके समान है। हमारा उपनिषत्-
सिद्धान्त ब्रह्मविद्याके जिज्ञासुओंको आत्मज्ञ होनेका आदेश
देता है, न कि अशेषविद्या-महार्णवसम्पन केवल शास्त्रज्ञ
होनेका ! क्योंकि केवल शास्त्रज्ञ होनेसे संसृतिचक्ररूप शोक-
समुद्रको पार नहीं किया जा सकता, इसके लिये तो अनुभव-
युक्त आत्मवेत्ता होनेकी ही आवश्यकता है। इसीलिये
उपनिषदोंमें अनेक आख्यायिकाओंद्वारा सृष्टि प्रपञ्चका निरसन
करके जिज्ञासुओंकी बुद्धिमें अभेद-ज्ञान स्थिर करनेके लिये
'एकमेवाद्वितीयम्' 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'उदरमन्तरं कुरुते,
अथ तस्य भयं भवति' आदि अनेक श्रुतियोंसे अभेददर्शीकी
प्रशंसा और भेददर्शीकी भर्त्सना की गयी है।
अद्वैत वेदान्त प्रक्रियानुसार जीव अविद्याकी तीन शक्तियों
'मल, विक्षेप और आवरण' से आवृत है। इनमें मल—

  • औपनिषद्-सिद्धान्त * ५९

अन्तःकरणके मलिन सस्कारजनित दोषोंकी निवृत्ति निष्काम-
कर्मसे होती है, विक्षेप (चित्तचाञ्चल्य ) का नाश उपासनासे
होता है और आवरण (स्वरूप-विस्मृति) का नाश तत्त्वज्ञान-
-से होता है, अर्थात् चित्तके इन त्रिविध दोषोंके लिये
उपनिषदोंमें अलग-अलग ओषधियाँ बतायी गयी हैं, जिनसे
-तीन ही प्रकारकी गतियाँ होती हैं। सकामकर्मी लोग धूममार्ग-
-से स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः
जन्म लेते हैं और निष्कामकर्मी उपासक अर्चिरादिमार्ग-
-से अपने उपास्यदेवके लोकमें जाकर अधिकारानुसार 'सालोक्य,
-सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य' मुक्तिविशेष प्राप्त करते हैं।
इन दोनों सकाम और निष्कामकर्मियोंसे भिन्न जो तत्त्वज्ञानी
होते हैं, उनके प्राणोंका उत्क्रमण—लोकान्तरगमन नहीं होता
अर्थात् उनके शरीर अपने-अपने तत्त्वोंमें लीन हो जानेसे
उन्हें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है ।
अस्तु; इस प्रकार हमारे अनादि उपनिषद् उस परब्रह्म-
के स्वरूपका विशद और स्फुट निरूपण कर हमारी हृदय-
भूमिको इस योग्य बनाते हैं कि जिससे उसमें तत्त्वज्ञानरूप
अङ्कुर शीघ्र ही प्रस्फुटित हो जाय एवं किसी भी कल्याण-
कारिणी विद्याको ग्रहण करनेकेलिये मनुष्यको कितने मत्य, तप,
-सेवा, त्याग, श्रद्धा और विनय आदिकी आवश्यकता है—
यह बात उपनिषदोंकी कई आख्यायिकाओंद्वारा प्रदर्शित
की गयी है। इतना ही नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्यकी अभय-प्राप्ति
-निरूपणके साथ-साथ ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व और सर्वनाम रूपत्व-
का वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता
अनेक स्थलोंमें दिखलायी गयी है । तात्पर्य यह है कि
प्रधानतया उपनिषदोंका लक्ष्य ब्रह्मविद्या-उपलब्धिकी ही
ओर है, इसीलिये तत्त्वज्ञान एव तदुपयोगी कर्म और
उपासनाओंका विशद तथा विस्तृत वर्णन किया गया है।
ब्रह्मविद्याके प्रसादसे समत्वदर्शन होता है । अज्ञानकी
ग्रन्थियोंका भेदन होकर समस्त सशयोंका विघात हो जाता
है एव कर्मचाञ्चल्य सुसयत होकर चित्त अन्तर्मुखी हो जाता
है । ब्रह्मविद्यासे ही मिथ्यानुभूतिका नाश होकर स्वयंप्रकाश
अवाङ्मनसगोचर चेतनानन्दघनैकघन विज्ञानस्वरूप परब्रह्म-
का साक्षात्कार होता है। ब्रह्मविद्यारूप अमृतपानका अकथनीय
महत्त्व है, जिसने इस अमृततत्त्वका पान किया, वह निहाल
हो गया; उसे फिर न कुछ कर्तव्य है, न प्राप्तव्य । ब्रह्मवेत्ता-
की दृष्टिमें सारे प्रपञ्च प्रसारका विलय होकर सच्चिदानन्द-
स्वरूप हो जाता है, उसे असत् जड और दुःखरूप प्रतीत
नहीं होता । उसकी दृष्टिमें तो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन-
रूप त्रिपुटीका भी विलय हो जाता है, वह एक निश्चल,
निर्बाध, निष्कल और चिदानन्दघन-सत्तामात्र रह जाता है ।
उसके द्वारा जो भी आदर्श कार्य होते हे, वे अन्य लोगोंकी दृष्टिमे
ही होते हैं । ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमे तो न कोई कार्य है और न
कोई करनेवाला ही । क्योंकि तत्त्वदर्शी लोगोको जल और
वीचिमे अन्तर नहीं दीखता । वह भिन्नत्व तो बाह्यदर्शी लोगों-
की दृष्टिमे ही प्रतीत होता है, जिससे प्रेरित होकर वे कहते
हैं कि जलमे तरङ्गे उठती हैं, किंतु जलने उन तरङ्ग-वीचियोंको
कब देखकर उनकी गणना की है? कहनेका तात्पर्य यह है कि
'एक अखण्ड चिद्घन वस्तुको छोड़कर उत्पत्ति, प्रलय, बद्ध,
साधक, मुमुक्षु और मुक्त आदि किसी भी प्रकारका व्यवहार
ही नहीं है।' ब्रह्मतत्त्व अत्यन्त ही दुर्दर्श है, क्योंकि निरन्तर
व्यवहारमें ही रत रहनेवाले विषयी जीवोंकी दृष्टि इस
व्यवहारातीत लभ्यतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है । जिन
वेदके पारगामी मुनिजनोंके राग, द्वेष, लोभ, भय और
क्रोधादि विकार श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी कृपासे सर्वथा
निवृत्त हो गये हैं, उन्हींको इस प्रपञ्चातीत अद्वयपदका बोध
होता है । इस विशुद्ध तत्त्वका बोध हो जानेपर वह महात्मा
सर्वथा निर्द्वन्द्व और निर्भय हो जाता है एव स्तुति,
नमस्कार और स्वधाकारादि कर्मश्रेणीसे ऊपर उठकर यदृच्छा-
लाभ-सन्तुष्ट हो जाता है । फिर बाहर-भीतर—सर्वत्र एक आत्म-
तत्त्वको ओतप्रोत देख उसीमें रमण करता हुआ कभी तत्त्व-
च्युत नही होता । यही बोधस्थिति है, इसीके लिये जिज्ञासुओं-
का सारा प्रयत्न होता है और इसी स्थितिको प्राप्त होनेपर
प्राणी कृतकृत्य होता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि
'औपनिषद दर्शन ही सम्यग्दर्शन है, जिसके प्रसादसे भव-
भयका निरसन होकर आत्यन्तिक आनन्दकी प्राप्ति होती है।'
इस विशुद्ध दृष्टिको प्राप्त कर लेना हीं मनुष्य जीवनका परम
उद्देश्य है। एव गहनतामे अनुप्रविष्ट हुए इस औपनिषद-सिद्धान्त-
को प्राप्त किये बिना जीवन व्यर्थ है । इसे प्राप्त न करना ही सबसे
बड़ी हानि है । अतः इस प्रस्तुत उपनिषद्-अङ्कसे इस दृष्टिको
पानेके लिये प्रत्येक कल्याणकामी पाठकको प्राणपणसे प्रयत्न
करना चाहिये, जिससे वह उपनिषद्के महान् और गूढतम
सिद्धान्तको धारण करनेकी क्षमता प्राप्त कर सके ।

उपनिषत्तत्त्व
( लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा )
सर्ववेदान्तप्रतिपाद्य परब्रह्म ही उपनिषदोंका चरम तत्त्व
है, किंतु इस तत्त्वको हृदयङ्गम करना अत्यन्त दुरूह है ।
विना अधिकारीके तत्त्वका साक्षात्कार भी नहीं होता ।
इसीलिये उपनिषदोंमे सर्वत्र ही अधिकारकी चर्चा आयी है ।
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥
'आचार्यवान् पुरुषो वेद', 'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्',
'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रिय
ब्रह्मनिष्ठम्'
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
—आदि उपनिषन्मन्त्रों एव गीताके शब्दोंमें तत्त्वज्ञान-
प्राप्तिके लिये अधिकारीके निमित्त गुरुपसदनादि कुछ विशिष्ट
नियम भी बतलाये गये हैं । श्रीमद्भागवतमे बतलाया गया
है कि वेदान्तके श्रवण-मननादिसे तथा भगवान्के गुणोंके
वार-वार श्रवण करनेसे भगवद्ध्यानादिके द्वारा कामादि दोषों-
का शीघ्र ही उपगमन होता है । इस तरह इन अमङ्गल-
जनक वस्तुओंके नष्टप्राय हो जानेपर श्रेष्ठ पुरुषोंकी नित्य
सङ्गति प्राप्त करनेसे भगवान्में नैष्ठिकी भक्ति उत्पन्न होती
है। ऐसी परिस्थितिमें कामादि दोषोंके शान्त पड़ जानेपर
निर्विक्ष चित्तमे केवल सत्त्वगुणकी स्थिति होती है, और
चित्त प्रसन्नताको प्राप्त होता है। इस तरह मुक्तात्मा प्रसन्नमन
पुरुषके हृदयमें भगवद्भक्तिके योगसे भगवत्तत्त्वका विज्ञान
उदय होता है—
शृण्वता स्वकथा कृष्ण पुण्यश्रवणकीर्तन ।
हृद्यन्तस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्य भागवतसेवया ।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥
तदा रजस्तमोभावा कामलोभादयश्च ये ।
चेत एतैरनाविद्ध स्थित सत्त्वे प्रसीदति ॥
एव प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगत ।
भगवत्तत्त्वविज्ञान मुक्तसङ्गस्य जायते ॥
( श्रीमद्भा० १ । २ । १७–२० )
तत्त्वज्ञानकी फलश्रुतिमें कहा गया है कि आत्मामें ही
ईश्वरके दर्शन होनेपर हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय
विलीन हो जाते हैं और सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं—
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥
( श्रीमद्भा० १ । २ । २१ )
'यही बात कुछ अन्तरम मुण्डकोपनिषद्के द्वितीय खण्डमे
कही गयी है ।
'तत्त्वं किम्'—तत्त्व क्या है—इस जिज्ञासा मे यदि उपनिषदों-
का आलोडन या श्रवण मनन किया जाय तो 'यहाँ ब्रह्मके
अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है' 'यथार्थतः वह ब्रह्म ही सत्य
है' और 'एकमात्र वही है' यही तत्त्व उपलब्ध होता है।
'ईशावास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत्', 'यस्मि-
न्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोह कः शोक
एकत्वमनुपश्यत', 'ऐतदात्म्यमिद सर्वम् 'स आत्मा
तत्त्वमसि श्वेतकेतो', 'ओमित्येतदक्षरमिद सर्वं तस्योपव्या-
ख्यानम्', 'सर्वं ह्येतद्ब्रह्म अयमात्मा ब्रह्म' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'
'नेह नानास्ति किञ्चन', 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव
पश्यति', 'एको देव सर्वभूतेषु गूढ', 'द्वितीयाद्वै भय भवति'
—आदि श्रुतियाँ इस तत्त्वको स्पष्ट प्रतिपादित करती
हैं । और—
'वासुदेव सर्वमिदम्', 'समं पश्यन्हि सर्वत्र', 'यो मां
पश्यति सर्वत्र' 'सकलमिदमह च वासुदेव', 'एक स
आत्मा पुरुष पुराण', 'सरित्समुद्राश्च हरे शरीरम्'
सर्वभूतेषु य पश्येद्भगवद्भावमात्मन ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥
—आदि वचनोंसे अन्यत्र भी यही कहा गया है। कुछ
लोग—
'ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशौ' 'क्षरं प्रधानममृताक्षर हरः
क्षरात्मानावीशते देव एकः', 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णा
बह्वी प्रजा जनयन्ती सरूपाम् ।'
—आदि श्रुतियोको सिद्धान्त मान बैठते है, किंतु यों
सिद्धान्ततः तत्त्वनिरूपणकी बात नहीं है । ऐसे तो उपनिषदोंमें
नचिकेता, यमराज, जनक, याज्ञवल्क्य आदि कितनोंके नाम
आये हैं, पर किसीका नाम आ जानेसे किन्हीं शब्दोंकी

[उपनिषत्तत्त्व]

उपनिषत्तत्त्व ६१


[बायाँ स्तम्भ]

पुनरुक्तियों मिल जानेसे उन्हें ही तत्त्व नहीं कहा जा सकता । यही कारण है कि विशिष्टाद्वैतसम्प्रदायाग्रणी भगवान् श्रीरामानन्दाचार्यने भी श्रीसुरसुरानन्दजीके 'तत्त्व किम्' इस प्रश्नके उत्तरमें —

विश्वं जात यतोऽद्या यदञ्चितमखिल लीनमप्यस्ति यस्मिन्
सूर्यो यत्तेजसेन्दु सकलमविरत भामयत्येतदेष ।
यद्धीत्या वाति वातोऽवनिरपि सुतल याति नैवेश्वरो ञ्च
साक्षी कूटस्थ एको बहुशुभगुणवानन्वयो विश्वभर्ता ॥

इस प्रकार ही तत्त्वका निरूपण किया है । इस श्लोकमें स्पष्ट है कि—

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति ।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।
( तैत्ति० ३ । १ । १)

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।
( श्वेता० ६ । १४ )

यदादित्यगत तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
( गी० १५ । १० )

तथा—

भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषास्मा-
दग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । ( तैत्ति० २ । ८ । १ )

'एवं य. सर्वज्ञ स सर्ववित्'
—आदि मन्त्रोका ही भाव व्यक्त किया गया है ।

इसपर आजकलके कुछ उपनिषद्चिन्तन करनेवाले वेदान्तियोंका कथन है कि श्रीरामानन्दाचार्य आदि विद्वानोंने तो इन लक्षणोंको श्रीरामचन्द्रादिमें घटाया है, किंतु वह ब्रह्म तो अवतार नहीं लेता, क्योंकि वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्याप्त है, सर्वदेशीय है—

'ईश्वरो नावतरति व्यापकत्वाद् आकाशवत्'

इस अनुमानसे ईश्वरका अवतार बाधित होता है, किंतु न तो यह अनुमान ही सही है न इसका दृष्टान्त ही, क्योंकि आकाश भी वायुरूपमे अवतीर्ण होता है एव पुनरपि उसका तेज, जल और पृथ्वीरूपमें अवतरण होता है । सर्वोपनिषदूपी गौओंके दोग्धा श्रीगोपालनन्दनका कथन है कि 'मै अज, अव्ययात्मा एव सभी भूतोंका ईश्वर होता हुआ भी आत्ममायासे अवतीर्ण होता हूँ'—

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
( गीता ४ । ६ )

यह बात अवश्य है कि भगवान्‌का आत्ममायामय


[दायाँ स्तम्भ]

शरीर तथा जन्म-कर्म साधारण देहधारियोकी भाँति नहीं होता । श्रीमद्भागवतमे तभी तो भगवान्‌के सभी स्वरूपोंको मायातीत, अनन्य सच्चिदानन्दरूप, अतुल माहात्म्ययुक्त तथा सर्वथा अस्पृष्ट कहा गया है—

सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय ।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥
( श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४ )

तभी तो जब विदेहराज श्रीजनकने भगवान् श्रीरामचन्द्रके स्वरूपका प्रथम बार दर्शन किया तो इनका सारा ब्रह्मज्ञान एवं वैराग्य हवा हो गया—

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥
सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चद चकोरा ॥
ताते प्रभु पूछउँ सति भाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥
इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरवस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥

—इत्यादि उद्गार उनके मुखसे हठात् निकल पड़े । यह दशा उनकी कई बार हुई । वनवासके समय भगवान् श्रीरामचन्द्रसे मिलकर तो इनकी दशा देखते ही बनती थी । गोस्वामीजी विभोर होकर लिखते है—

जासु ग्यान रवि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल विकासा ॥
तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बडाई ॥
बिषई साधक सिद्ध समाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ॥
राम सनेह सरस मन जासू । साधु सर्मा बड आदर तासू ॥
सोह न राम प्रेम बिनु ग्यानू । करनवार बिनु जिमि जलजानू ॥

यही बात भागवतमें भी—

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जित
न शोभते ज्ञानमल निरञ्जनम् ।
( श्रीमद्भा० १ । ५ । १२

—आदि श्लोकोंमे दर्शायी गयी है ।

इसपर कुछ लोग—

मायाख्याया कामधेनोर्जीवेशौ वत्सकावुभौ ।
यथेच्छ पिवता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥

( माया नामकी कामधेनुके जीव, ईश्वर दोनो बछड़े हैं । यथेच्छ द्वैतको दोनों ही पी लें, पर तत्त्व तो अद्वैत ही है ।)

इत्यादि वचनोंको पढकर भगवान्‌के सगुण स्वरूपसे घृणा करने लग जाते है, पर उन्हे समझ रखना चाहिये कि द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नही होता । जब विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय भक्तिके लिये कल्पना किया गया द्वैत तो अद्वैतकी अपेक्षा भी सुन्दर

६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
है । यदि पारमार्थिक अद्वैत-बुद्धि रहते हुए भजनके लिये
द्वैत-बुद्धि रक्खी जाय तो ऐसी भक्ति सैकड़ो मुक्तियोंसे
भी बढ़कर है—
द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग् जाते बोधे मनीषया ।
भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥
अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे ।
तादृशी यदि भक्तिःस्यात्तु मुक्तिश्शताधिका ॥
कुछ लोगोंका कहना है कि मधुसूदन स्वामीने माना है
कि अवतार नहीं होता, किंतु भक्तकी भावनासे विधुर-
परिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान श्रीकृष्ण आदिका
स्वरूप दिखलायी पड़ता है, किंतु यह कथन ठीक नहीं,
क्योंकि गीता ( ४ । ६ ) की टीकाम उन्होंने भगवदवतारको
बहुत प्रयत्नसे सिद्ध किया है और—
कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् ।
जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् ।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥
—आदि भागवतके श्लोकोंको सादर प्रमाणरूपसे उपन्यस्त
किया है । इतना ही क्यों ? तत्त्वविषयक प्रश्नपर तो वे
स्पष्ट कहते हैं कि मैं श्रीकृष्णसे बढ़कर और किसी तत्त्वको
नहीं जानता—
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् ।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुख्खदरविन्दनेत्राद्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥
अधिक क्या, अद्वैतसम्प्रदायाग्रगण्य भगवान् शङ्कर भी
कहते हैं कि जिसने ब्रह्माको अद्भुत, अनन्त ब्रह्माण्ड
दिखलाये, वत्सोंसहित सभी गोपोंको विष्णुरूपमें दिखलाया,
भगवान् शङ्कर जिनके चरणावनेजन-जलको अपने मस्तकपर
धारण करते हैं, वे श्रीकृष्ण तो ब्रह्मा, विष्णु, शिव—इन तीनोसे
परे कोई अविकृत चिदानन्दघन ही हैं—
ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमप्यद्भुतान्
गोपान्वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णून्दशांश्च यः ।
शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात्-
कृष्णोऽद्य पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा ॥
आनन्दसे विभोर होकर एक गोपी अपनी सखीसे कहती
है कि 'ऐ सखि ! सुन, मैने श्रीनन्दके आँगनमें एक विचित्र
कौतुक देखा है।' सखी पूछती है कि 'वह क्या ?' भगवद्दर्शनके
आनन्दसे आह्लादित हुई गोपिका उत्तर देती है कि—'सकल-
वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्म वहाँ गोधूलिसे सना हुआ नृत्य कर
रहा है—
शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् ।
गोधूलिधूसराङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥
इसी प्रकार एक अन्य प्रेममग्न भक्तके हृदयोद्गार हैं ।
वह कहता है—
वृन्दारण्यनिविष्टं चिलुठितमाभीरधीरनारीभिः ।
सत्यचिदानन्दघनं ब्रह्म नराकारमालम्बे ॥
मैं वृन्दावनमे प्रविष्ट परम बुद्धिमती आभीर-
नारियोंके सङ्गमे लुंठित नराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका
अवलम्बन लेता हूँ—शरण ग्रहण करता हूँ । जब ऐसी बात
है तभी तो श्रीब्रह्माजी भी कहते हैं कि व्रजमें कीटादि होकर
भी जन्म ग्रहण करना बड़े भाग्यकी बात है, क्योंकि उस
श्रीचरणकमलकी रज, जिसे सर्वदा श्रुतियाँ ढूँढती हैं, यहाँ
सहज ही उपलब्ध होती है—
तद्भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां
यद्गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् ।
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान्मुकुन्द-
स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥
( श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४ )
यहाँ 'अद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव' यह पद ध्यान
देने योग्य है । ब्रह्माजीका तात्पर्य है यहाँ श्रुतिरूपा गोपियोंसे ।
वे अब इस बातको समझ चुके हैं कि श्रुतिप्रतिपाद्य यह
ब्रह्म ही यहाँ ब्रजमे अवतीर्ण हुआ है, और इसकी प्रतिपादिका
श्रुतियाँ भी यहाँ गोपिकारूपमे अवतरित हुई हैं । 'सर्वे वै
देवताप्रायाः' यह प्रसिद्ध है । इस विषयमे उपनिषदोंका ही
प्रमाण देखनेयोग्य है ।
उपनिषदे कहती हैं कि 'एक बार श्रीरामचन्द्रजी ऋषि-
मुनियोंके दर्शनार्थ जङ्गलमें गये । महाविष्णु, सच्चिदानन्द-
लक्षण सर्वाङ्गसुन्दर भगवान् श्रीरामचन्द्रको देखकर सभी
वनवासी मुनि विस्मित हो गये । उन ऋषियोंने उनके शरीर-
स्पर्शकी कामना प्रकट की । भगवान्ने अन्यावतारमे उनकी
इच्छा पूर्ण करनेका वचन दिया—
श्रीमहानिष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा
सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं
होचुर्नोऽवद्यमवतारात्त्वं गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति ॥
उन सभी देवताओं तथा ऋषियोंकी प्रार्थना स्वीकृत

$$ॐ उपनिषत्तत्त्व ॐ\qquad\qquad६३$$

हुईं । वे सभी कृतकृत्य हो गये । कालान्तरमे भगवान्‌का
प्राकट्य हुआ । भगवान्‌का स्वरूपभूत परमानन्द ही नन्द हुआ,
ब्रह्मविद्या यशोदा हुईं । ब्रह्मपुत्रा गायत्री देवकी हुईं, स्वयं
निगम ही वसुदेव हुए, वेदकी ऋचाएँ ही गोपियों तथा
गौओंके रूपमे अवतीर्ण हुईं । भगवान्‌के मनोहर संस्पर्शके
निमित्त ब्रह्मा भी मनोहर यष्टि हुए, भगवान् रुद्र सप्त-
स्वरानुवादी वेणु होकर, इन्द्र गवयश्रृङ्ग होकर श्रीहस्तमें
सुशोभित हुए और पाप ही असुर हुए—
यो नन्द• परमानन्द. यशोदा मुक्तिगेहिनी ।
गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः ॥
वंशस्तु भगवान् रुद्रो शृङ्गमिन्रस्त्वघोऽसुरः ।
इसके अतिरिक्त वैकुण्ठ गोकुलवनके रूपमे अवतरित
हुआ, तपस्वीगण वृक्षोंके रूपमे अवतीर्ण हुए, क्रोध लोभादि
दैत्य हुए तथा मायासे विग्रह धारण करनेवाले साक्षात् श्रीहरि
ही गोपरूपसे अवतीर्ण हुए । श्रीगोपनाग बलराम हुए और
शाश्वत ब्रह्म ही श्रीकृष्ण हुआ । सोलह हजार एक सौ आठ
पत्नियोंके रूपमे ब्रह्मरूपा वेदोंकी ऋचाएँ तथा उपनिषदें
प्रकट हुईं—
गोकुल वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमा. ।
लोभक्रोधादयो दैत्या• कलिकालतिरस्कृत. ॥
गोपरूपो हरि• साक्षान्मायाविग्रहधारण• ।
शेषनागोऽभवद्रामः कृष्णो ब्रह्मैव शाश्वतम् ॥
अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्य. स्त्रियस्तथा ।
ऋचोपनिपदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋच स्त्रिय• ॥
यहाँतक कि द्वेष ही चाणूर मल्लरूपमें अवतीर्ण हुआ, मत्सर
ही अजेय मुष्टिक हुआ, दर्प कुवलयापीड हाथी तथा गर्व बकासुर
राक्षस हुआ । दया रोहिणी माताके रूपमें अवतीर्ण हुईं, धरा
सत्यभामा हुईं, महाव्याधि अघासुर बना तथा कलि कंसरूपमे
अवतीर्ण हुआ । शम मित्र सुदामा हुए, सत्य अक्रूर हुआ
तथा दम उद्धव हुआ एव सर्वदा संस्पर्श पानेके लिये साक्षात्
भगवान् विष्णु ही शङ्खरूपमें अवतीर्ण हुए—
द्वेषश्चाणूरमल्लोऽय मत्त्सरो मुष्टिकोऽजयः ।
दर्प. कुवलयापीडो गर्वो रक्ष. खगो वक ॥
दया सा रोहिणी माता सत्यभामा धरेति वै ।
अघासुरो महाव्याधि कलि. कस. स भूपतिः ॥
शमो मित्र सुदामा च सत्याक्रूरोद्धवो दम. ।
यः शङ्ख. स स्वयं विष्णुलैक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥
इसी प्रकार आगे चलकर कहा गया है कि जिस प्रकार
भगवान् पहले आनन्दपूर्वक क्षीरसमुद्रमें क्रीडन करते थे,
वैसा ही आनन्द लेनेके लिये उन्होने क्षीरसमुद्रको दधि-दुग्धके
भाण्डोंमे स्थापित किया एव शकटभञ्जन आदि लीलाएँ रचीं ।
गणेशजी चक्ररूपमे अवतीर्ण हुए, स्वय वायु ही चमर हुए
एव अग्निके समान प्रकाशवाले तलवाररूपमे स्वय भगवान्
महेश्वर आविर्भूत हुए । श्रीकश्यपजी उलूखल हुए, देवमाता
अदिति रज्जु हुईं । इस प्रकार भगवान्‌के समस्त परिकरके
रूपमें वे ही सब देवगण अवतीर्ण हुए जिन्हें सभी सादर
नित्य नमस्कार करते है, इसमे किसी प्रकार भी सशय नहीं
करना चाहिये । सर्वशत्रुनिवर्हिणी साक्षात् कालिका गदा-
रूपमे अवतीर्ण हुईं और भगवान्‌की वैष्णवी माया शार्ङ्ग-
धनुरूपमें उनके करकमलमे आ विराजी । शरद-ऋतु
भगवान्‌के सुन्दर भोजनोंके रूपमें प्रकट हुआ । श्रीगरुड़जी
भाण्डीरवट हुए तथा नारद मुनि श्रीदामानामक उनके सहचर
गोपाल हुए । भक्ति वृन्दा हुईं।
दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे ।
क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ ॥
सहारार्थं च शत्रूणा रक्षणाय च संस्थितः ।
यत्तत्पद्मीश्वरेणासीत्तच्चक्रं ग्रहरूपधृक् ।
जयन्तीसम्भवो वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः ॥
यत्त्वासौ ज्वलनाभास खड्गरूपो महेश्वरः ।
कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्मातादितिस्तथा ॥
यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जना• ।
नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशय. ॥
गदा च कालिका साक्षात्सर्वशत्रुनिवर्हिणी ।
धनु• शाङ्गं स्वमाया च शरत्काल• सुभोजन. ॥
गरुडो वटभाण्डीर श्रीदामा नारदो मुनि. ।
वृन्दाँ भक्ति क्रिया बुद्धि• सर्वजन्तुप्रकाशिनी ॥
इस तरह—
'नन्दाद्या ये व्रजे गोपा. याश्चामीपा च योषित. ।
वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रिय• ॥
सर्वे वै देवताप्रायाः'
यह श्रीनारदकी उक्ति सर्वथा सत्य सिद्ध हुई—
ऊपरके वर्णनसे यह सिद्ध हो गया कि परम पुरुप ही,
जो उपनिषदोंका चरमतत्त्व है, श्रीकृष्ण तथा श्रीरामादि रूपोंसे
विवक्षित है । वेदोंमें भी—
'इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्', 'त्रीणि पदानि
विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्,