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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 832 में से

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पृष्ठ 77

$$ॐ उपनिषत्तत्त्व ॐ\qquad\qquad६३$$

हुईं । वे सभी कृतकृत्य हो गये । कालान्तरमे भगवान्‌का
प्राकट्य हुआ । भगवान्‌का स्वरूपभूत परमानन्द ही नन्द हुआ,
ब्रह्मविद्या यशोदा हुईं । ब्रह्मपुत्रा गायत्री देवकी हुईं, स्वयं
निगम ही वसुदेव हुए, वेदकी ऋचाएँ ही गोपियों तथा
गौओंके रूपमे अवतीर्ण हुईं । भगवान्‌के मनोहर संस्पर्शके
निमित्त ब्रह्मा भी मनोहर यष्टि हुए, भगवान् रुद्र सप्त-
स्वरानुवादी वेणु होकर, इन्द्र गवयश्रृङ्ग होकर श्रीहस्तमें
सुशोभित हुए और पाप ही असुर हुए—
यो नन्द• परमानन्द. यशोदा मुक्तिगेहिनी ।
गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः ॥
वंशस्तु भगवान् रुद्रो शृङ्गमिन्रस्त्वघोऽसुरः ।
इसके अतिरिक्त वैकुण्ठ गोकुलवनके रूपमे अवतरित
हुआ, तपस्वीगण वृक्षोंके रूपमे अवतीर्ण हुए, क्रोध लोभादि
दैत्य हुए तथा मायासे विग्रह धारण करनेवाले साक्षात् श्रीहरि
ही गोपरूपसे अवतीर्ण हुए । श्रीगोपनाग बलराम हुए और
शाश्वत ब्रह्म ही श्रीकृष्ण हुआ । सोलह हजार एक सौ आठ
पत्नियोंके रूपमे ब्रह्मरूपा वेदोंकी ऋचाएँ तथा उपनिषदें
प्रकट हुईं—
गोकुल वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमा. ।
लोभक्रोधादयो दैत्या• कलिकालतिरस्कृत. ॥
गोपरूपो हरि• साक्षान्मायाविग्रहधारण• ।
शेषनागोऽभवद्रामः कृष्णो ब्रह्मैव शाश्वतम् ॥
अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्य. स्त्रियस्तथा ।
ऋचोपनिपदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋच स्त्रिय• ॥
यहाँतक कि द्वेष ही चाणूर मल्लरूपमें अवतीर्ण हुआ, मत्सर
ही अजेय मुष्टिक हुआ, दर्प कुवलयापीड हाथी तथा गर्व बकासुर
राक्षस हुआ । दया रोहिणी माताके रूपमें अवतीर्ण हुईं, धरा
सत्यभामा हुईं, महाव्याधि अघासुर बना तथा कलि कंसरूपमे
अवतीर्ण हुआ । शम मित्र सुदामा हुए, सत्य अक्रूर हुआ
तथा दम उद्धव हुआ एव सर्वदा संस्पर्श पानेके लिये साक्षात्
भगवान् विष्णु ही शङ्खरूपमें अवतीर्ण हुए—
द्वेषश्चाणूरमल्लोऽय मत्त्सरो मुष्टिकोऽजयः ।
दर्प. कुवलयापीडो गर्वो रक्ष. खगो वक ॥
दया सा रोहिणी माता सत्यभामा धरेति वै ।
अघासुरो महाव्याधि कलि. कस. स भूपतिः ॥
शमो मित्र सुदामा च सत्याक्रूरोद्धवो दम. ।
यः शङ्ख. स स्वयं विष्णुलैक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥
इसी प्रकार आगे चलकर कहा गया है कि जिस प्रकार
भगवान् पहले आनन्दपूर्वक क्षीरसमुद्रमें क्रीडन करते थे,
वैसा ही आनन्द लेनेके लिये उन्होने क्षीरसमुद्रको दधि-दुग्धके
भाण्डोंमे स्थापित किया एव शकटभञ्जन आदि लीलाएँ रचीं ।
गणेशजी चक्ररूपमे अवतीर्ण हुए, स्वय वायु ही चमर हुए
एव अग्निके समान प्रकाशवाले तलवाररूपमे स्वय भगवान्
महेश्वर आविर्भूत हुए । श्रीकश्यपजी उलूखल हुए, देवमाता
अदिति रज्जु हुईं । इस प्रकार भगवान्‌के समस्त परिकरके
रूपमें वे ही सब देवगण अवतीर्ण हुए जिन्हें सभी सादर
नित्य नमस्कार करते है, इसमे किसी प्रकार भी सशय नहीं
करना चाहिये । सर्वशत्रुनिवर्हिणी साक्षात् कालिका गदा-
रूपमे अवतीर्ण हुईं और भगवान्‌की वैष्णवी माया शार्ङ्ग-
धनुरूपमें उनके करकमलमे आ विराजी । शरद-ऋतु
भगवान्‌के सुन्दर भोजनोंके रूपमें प्रकट हुआ । श्रीगरुड़जी
भाण्डीरवट हुए तथा नारद मुनि श्रीदामानामक उनके सहचर
गोपाल हुए । भक्ति वृन्दा हुईं।
दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे ।
क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ ॥
सहारार्थं च शत्रूणा रक्षणाय च संस्थितः ।
यत्तत्पद्मीश्वरेणासीत्तच्चक्रं ग्रहरूपधृक् ।
जयन्तीसम्भवो वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः ॥
यत्त्वासौ ज्वलनाभास खड्गरूपो महेश्वरः ।
कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्मातादितिस्तथा ॥
यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जना• ।
नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशय. ॥
गदा च कालिका साक्षात्सर्वशत्रुनिवर्हिणी ।
धनु• शाङ्गं स्वमाया च शरत्काल• सुभोजन. ॥
गरुडो वटभाण्डीर श्रीदामा नारदो मुनि. ।
वृन्दाँ भक्ति क्रिया बुद्धि• सर्वजन्तुप्रकाशिनी ॥
इस तरह—
'नन्दाद्या ये व्रजे गोपा. याश्चामीपा च योषित. ।
वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रिय• ॥
सर्वे वै देवताप्रायाः'
यह श्रीनारदकी उक्ति सर्वथा सत्य सिद्ध हुई—
ऊपरके वर्णनसे यह सिद्ध हो गया कि परम पुरुप ही,
जो उपनिषदोंका चरमतत्त्व है, श्रीकृष्ण तथा श्रीरामादि रूपोंसे
विवक्षित है । वेदोंमें भी—
'इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्', 'त्रीणि पदानि
विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्,