कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
इसी ब्राह्मणमे आगे चलकर कहा गया है—
ॐ उपनिषद् और अद्वैतवाद ॐ ९३
श्रोति' से जीवात्माको द्रष्टा कहा गया है। इसलिये यह मन्त्र
जीवात्मा और परमात्माका नही—अन्तःकरण और जीवात्माका
प्रतिपादक है।
इसी ब्राह्मणमे आगे चलकर कहा गया है—
'तदेतत्सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति । अथ योऽय शारीर
उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञाविति ।'
'जिसके ऽद्वारा स्वप्न देखा जाता है उसका नाम
सत्त्व वा अन्तःकरण है। जो 'शारीर' वा जीवात्मा द्रष्टा है,
उसका नाम क्षेत्रज्ञ है।' अचेतन अन्त करणका भोक्तृत्व कैसे
सम्भव है। इसका उत्तर शङ्कराचार्यने यों दिया है—
'नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति
प्रवृत्ता किन्तर्हि ? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मस्वभावतां
च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्त्वे भोक्तृत्व-
मद्ध्यारोपयति ।'
अर्थात् अचेतन अन्तःकरणका भोक्तृत्व बताना मन्त्रका
उद्देश्य नहीं है । चेतन क्षेत्रज्ञका अभोक्तृत्व और ब्रह्म-
स्वभावत्वका प्रतिपादन करना ही मन्त्रका लक्ष्य है। इसी
अभोक्तापन और ब्रह्मकी स्वभावताको समझानेके लिये क्षेत्रज्ञके
उपाधिभूत और सुखादिके विकारसे युक्त अन्तःकरणमें
भोक्तृत्वका आरोप किया गया है, क्योकि अन्तःकरण और
क्षेत्रज्ञके अविवेकके कारण क्षेत्रज्ञमे कर्तृत्व और भोक्तृत्वकी
कल्पना की जाती है। सुखादि विकारोंसे युक्त सत्त्व (अन्तःकरण)
में चित्प्रतिबिम्ब पतित होनेपर चित्का भोक्तृत्व मालूम पड़ता
है। फलतः वह अविद्याजन्य है, पारमार्थिक नहीं।
कदाचित् यहाँ यह लिखनेकी आवश्यकता नहीं कि
वेदमन्त्रोका यथार्थ अर्थ समझनेके लिये कितनी धीरता,
सावधानता और बहुदर्शिताकी आवश्यकता होती है और
इस दिशामें जरा-सी भी त्रुटि कितना बड़ा अनर्थ कर सकती
है । वेदवेत्ताओंके मतसे जो वाक्य जीवके ब्रह्मभावका
बोधक है वही वाक्य जीव और ब्रह्मके भेदका बोधक मालूम
पड़ जाता है—अर्थका अनर्थ उपस्थित कर देता है। इसीलिये
वेदमन्त्रोंका रहस्य समझनेवालोंने कहा है—
'बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।'
अल्पविद्य (नीम हकीम) से वेद इसलिये डरता है कि
यह मुझे मार डालेगा । वेदज्ञोंने और भी कहा है—
'पौर्वापर्यापरामृष्ट शब्दोऽन्यां कुरुते मतिम् ।'
'पूर्वापरकी आलोचना नहीं करनेसे शब्द विपरीत अर्थ-
बोधका कारण होता है।'
एक बात और । वन्ध्यापुत्र, कूर्मरोम, शशशृङ्ग वा
गगन-कमलिनीके समान द्वैत-प्रपञ्चको अद्वैतवादी तुच्छ वा
अलीक नहीं कहते । वे केवल इतना ही कहते हैं कि
जैसे मनुष्यके निद्रादोषके कारण स्वप्नमे देखा गया
पदार्थ मिथ्या है, वैसे ही अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रद-
वस्थामें देखा गया पदार्थ भी मिथ्या है। एकमात्र ब्रह्म ही
परमार्थ सत्य है। ब्रह्मके अतिरिक्त कोई भी पदार्थ 'परमार्थ
सत्य' नहीं है, परतु पारमार्थिक सत्ता नहीं होनेपर भी
संसारी पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता और स्वप्नमें देखे पदार्थों-
की प्रातीतिक वा प्रातिभासिक सत्ता है। सपनेमें देखे पदार्थ
जैसे स्वप्नकालमें यथार्थ मालूम पडते हैं, वैसे ही जागतिक
पदार्थ व्यवहार-दशामें यथार्थ ज्ञात होते हैं। ब्रह्मवादियोँने
कहा भी है—
देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पित ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥
अर्थात् शरीरमें आत्मबुद्धि वस्तुतः मिथ्या है तो भी
देह-भिन्न आत्माके जानके पहले सत्य विदित होती है। इसी
तरह सारी लौकिक वस्तुओंके मिथ्या होनेपर भी आत्म-
निश्चयतक वे सच्ची मालूम पड़ती हैं। 'ज्ञाते द्वैतं न विद्यते'—
आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर द्वैत नहीं रहता ।
निष्कर्ष यह है कि व्यवहार-दशामें अद्वैतवादी भी
जीवेश्वर-भेद, द्वैत-प्रपञ्च तथा परमात्मा और जीवात्माका
उपास्य-उपासक भाव स्वीकार करते हैं । वेदान्तवेत्ताओंने
ठीक ही कहा है—
मायाख्याया. कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ ।
यथेच्छ पिबता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥
'माया नामकी कामधेनुके दो बछड़े हैं—जीव और
ईश्वर । ये दोनों इच्छानुसार द्वैतरूप दुग्धका पान करें,
परन्तु परमार्थ-तत्त्व तो अद्वैत ही है।'
पारमार्थिक और व्यावहारिक भावोके उदाहरण संसारमें
भी देखे जाते हैं। जिसके साथ वास्तविक आत्मीयता नहीं
है, उसके साथ भी लोग बाह्य होकर आत्मीयके समान
व्यवहार करते हैं। यह केवल व्यावहारिक आत्मीयता है,
पारमार्थिक नहीं। अगले मन्त्रमें इस बातको बड़ी स्पष्टतासे
कहा गया है—
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति । यत्र
त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् ॥
'जबतक द्वैत रहता है, तबतक एक दूसरेको देखता
९ ९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
है और जब कि सारे पदार्थ आत्मरूप हो जाते हैं तब कौन
किसको देख सकता है ?'
मुख्य बात यह है कि अद्वैतवाद और व्यावहारिक
द्वैतवाद—दोनों ही वेदसम्मत हैं । इसलिये उपनिषदोंमे
उपास्य उपासक-भावसे परमात्मा और जीवात्माका निर्देश
रहना कुछ विचित्र बात नहीं है। इससे अद्वैतवादकी कोई
हानि भी नहीं है। व्यावहारिक द्वैतावस्था माननेके कारण
उपनिषदोंके द्वैतवादी वाक्योंके द्वारा अद्वैतवादका खण्डन
नहीं हो सकता । व्यावहारिक द्वैतावस्था अद्वैतावस्थाकी
विरोधिनी हो ही नहीं सकती ।
फलतः अद्वैतवादके सम्बन्धमे द्वैतवादियोंकी आपत्तियाँ
निर्मूल हैं और उपनिषदोंके अनुसार अद्वैतवाद ही परमार्थ
सत्य है । किसी भी उपनिषद्के किसी भी मन्त्रमे द्वैतवाद
परमार्थ सत्य सिद्ध नहीं होता ।
उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य
( लेखक-पण्डित श्रीरामनिवासजी शर्मा )
वस्तुका तत्त्वतः नाश ( Annihilation ) नहीं होता,
अपितु उसका रूपान्तर होता है—यह एक आधुनिक सत्य
है, किंतु वैदिक ऋषियोंको आजसे बहुत पहले इसका पता
था। वे इस बातको अच्छी तरह समझते थे कि वस्तुका
आविर्भाव और तिरोभाव ही होता है, न कि नाश
( Annihilation )। उनकी भाषाकी 'जनी' और 'णशू'
धातुएँ इस सत्यकी प्रतिपादक हैं, क्योंकि इनका अर्थ क्रमशः
आविर्भाव और तिरोभाव ही है। किंतु इसमे एक विशेष
और विलक्षण बात भी है, वह यह कि वैदिक ऋषि न केवल
तत्त्वत अपितु स्वरूपतः भी प्राकृतिक वस्तुओंका नाश नहीं
मानते थे। न केवल व्यष्टि समूहका प्रत्युत समष्टि समूहका भी।
यह सत्य 'नारायण और महानारायण उपनिषद्'के निम्नलिखित
प्रवचनसे पूर्णतः स्पष्ट होता है—
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥
अर्थात् विधाताने सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक, पृथिवी और
अन्तरिक्षकी रचना पूर्व सृष्टि क्रमके अनुसार ही की है।
उपनिषत्प्राण श्रीमद्भगवद्गीता इस सत्यका समधिक
स्पष्टीकरण है। उससे पूर्णतः यह सिद्ध हो जाता है कि
वस्तुतः सृष्टि नयी नहीं बनती और न नष्ट ही होती है, प्रत्युत
अव्यक्तसे व्यक्त होती है और व्यक्तसे अव्यक्त। उसके अपने
शब्द इस प्रकार हैं—
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
( गीता २।२८)
छान्दोग्य उपनिषद् भी इसी सत्यको प्रकारान्तरसे इस
तरह स्पष्ट करता है—
' प्राकृतिक शक्तियाँ द्युलोकरूप अग्निमें परमाणुरूप साहित्यका
हवन करती रहती हैं, जिससे इस निःसीम आकाश प्राङ्गणमे
नित्य ही आह्लादजनक विश्व ब्रह्माण्डों और वस्तुओंका
प्राग्म्य होता रहता है। प्रत्येक वस्तु अपने अव्यक्तरूपसे
व्यक्तरूपमे आती रहती है। यह बृहद् यज्ञ परमात्माकी
ओरसे प्रकृति प्रवाहमं सदैव होता रहता है।'
यह सृष्टि किन किन तत्त्वों और साधनोसे अव्यक्तमे
व्यक्त दशामे आती है—इसकी रूपकालङ्कार-सम्मत सक्षिप्त
उपनिषत्तालिका इस प्रकार है—
संक्षिप्त तालिका
१ द्युलोक ... अग्नि कुण्ड
२ द्युलोकस्थ शक्ति • प्रथमाग्नि
३ आदित्य • समिधा
४ हवनीय द्रव्य .. • परमाणु
५ हवन-कर्ता देवता प्राकृतिक शक्तियाँ
६ अध्वर्यु • परमात्म-तत्त्व
७ वसन्त-ऋतु • घृत स्थानीय
८ ग्रीष्म-ऋतु .. समित्स्थानीय
९ शरद्-ऋतु ... हवि
१० यज्ञ-नाम • प्राकृतिक
यहाँ यह कहते हुए आश्चर्य होता है कि यह उपनिषदात्मक
किंतु व्यक्ताव्यक्तविषयक विश्व दुर्लभ सत्य इस समय भी
भारतीय घर-आँगनकी वस्तु बना हुआ है। आज भी सन्ध्या-
वन्दनके समय कोटि कोटि कण्ठोंसे अघमर्षणमें इस प्रकार
दुहराया जाता है—
१ पृथिवीजलतेजोवायुगगनरूपेषु गन्धादिविशेषवस्तुषु जन्तुषु
प्राणिषु च । श० म०
१ छा० खण्ड ४। महामहोपाध्याय श्रीआर्यमुनिकृत-भाष्य ।
- उपनिषदोंका नवीन वैज्ञानिक तथ्य * ९५
ॐ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।
दिवञ्च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व ॥
इस तरह हम देखते हैं कि उपलब्ध उपनिषद्वाङ्मय आज भी वैज्ञानिक संसारको यह बता रहा है कि व्यष्टि और समष्टि विश्व न केवल तत्त्वतः अपितु स्वरूपतः भी नाश-रहित है ।
परंतु यह कहते हुए भी दुःख होता है कि आजके वैदिक विद्वानोंकी दृष्टिमें यह सत्य पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, किंतु यह जानकर थोड़ा सन्तोष होता है कि इस सत्यके सक्रिय मर्मको जाननेवाले व्यक्ति अभी सर्वथा नाम-शेष नहीं हुए हैं । आज भी गिरि-गुहाओंमे ऐसे लोग मौजूद हैं जो इस सत्यके क्रियात्मक पक्षको स्वयं भी समझते और दूसरोको भी समझा सकते हैं, ऐसे ही महात्माओंके एक स्वर्गीय शिष्य श्रीस्वामी विशुद्धानन्दजी परमहंस भी थे । उनका भी यह विश्वास था कि वस्तु स्वरूपतः भी विनश्वर नहीं है । न केवल विश्वास, अपितु वे प्रायः एक प्रकारके फूलको दूसरे प्रकारके फूलोंमे परिणत कर दिखाया भी करते थे । वैज्ञानिक शब्दोंमें इसीको इस तरह भी कहा जा सकता है कि—
उनमे एक प्रकारके फूलको तिरोहित कर उसमेंसे अव्यक्त नवीन फूलको व्यक्त कर दिखानेका सामर्थ्य था । यही नही, प्रत्युत वे प्राकृतिक विकारों (वस्तुओं) के अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारोंकी क्रमशः विकासात्मक और लयात्मक प्रक्रियाओंको भी अच्छी तरह समझते थे। साथ ही वे अनुलोमज क्रियात्मक परीक्षणके साथ-साथ विलोमज परीक्षणको भी दिखा सकते थे । इस विषयपर उनके अपने शब्द इस प्रकार है—
'वत्स ! वस्तुके अनुलोमज और विलोमज दोनों प्रकारका विकास और लय सत्य है । उदाहरणार्थ दूधसे दही, दहीसे नवनीत और नवनीतसे घृत उत्पन्न होता है, परंतु घृतमे नवनीत, नवनीतमें दही और दहीमें दूधके उपादान अव्यक्त रूपसे रहते हैं । वास्तविक योगी या वैदिक विज्ञान-वेत्ता इन अदृष्ट उपादानोंको विलोम प्रक्रियासे घृतको नवनीतमें, नवनीतको दहीमें और दहीको दूधमें परिणत कर सकता है । इतना ही नहीं, अपितु योगी दुग्धको भी विलोम क्रियाके द्वारा तृण-राशिमें भी परिवर्तित कर सकता है¹।'
स्वामीजी ऐसा कहते ही न थे, प्रत्युत वे योग्य अधिकारियोंको कभी-कभी इस विलोम प्रक्रियाके प्रयोग भी दिखा दिया करते थे ।
यह सत्य केवल वैदिक ही नहीं है, अपितु दार्शनिक भी है । इसका प्रमाण यह है कि इस सत्यको आजसे बहुत पहले हमारे दर्शनकारोंने भी प्रकारान्तरसे समझने-समझानेकी कोशिश की थी । महर्षि पतञ्जलिने भी अपने पातञ्जल-दर्शनके कैवल्य-पादमें इस विषयको इस तरह स्पष्ट किया है—
'जात्यन्तरपरिणाम प्रकृत्यापूरात् ।'
अर्थात् प्रकृतिके आपूरणसे जात्यन्तर-परिणाम होता है, किंतु वह क्यों और कैसे होता है ? इस विषयको उन्होंने निम्नलिखित सूत्रद्वारा समझाया है—
'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीनां वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् ।'
तात्पर्य यह है कि धर्मादि निमित्त प्रयोजक कारण उपादान-स्वरूप प्रकृतिको प्रेरित नहीं करते, वे तो केवल प्रकृतिक्स आवरणको ही दूर कर सकते है, परंतु प्रकृति आवरणसे उन्मुक्त होकर स्वतः अपने विकारों—विभिन्न रूपोंमें परिणत होने लगती है । उदाहरणके लिये रजतमें जो स्वर्ण-प्रकृति है, वह आवरणसे आवृत है और रजत-प्रकृति आवरणसे मुक्त है; किंतु यदि स्वर्ण-प्रकृतिका यह आवरण किसी उपायसे हटा दिया जाय तो रजत-प्रकृति तिरोहित हो जायगी और स्वर्ण-प्रकृति-धारामें विकार उत्पन्न करेगी¹ । इस तरह रजत-प्रकृति अव्यक्त स्वर्ण प्रकृतिमे व्यक्त हो जायगी अर्थात् रजत स्वर्णमें बदल जायगा । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि धर्मादि प्रयोजक कारणसे ही ऐसा होता है, अपितु प्रकृति स्वय भी अपनी लयोन्मुखता और विकासोन्मुखताके कारण क्रमशः अनन्त विकारों और वस्तुओंमें विकासोन्मुख और लयोन्मुख होती रहती है । इसी सत्यको महर्षि व्यासने अपने भाष्यमें इस प्रकार स्पष्ट किया है—
'निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीना वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । न हि धर्मादिनिमित्तं तत्प्रयोजक भवति प्रकृतीनाम्। न कार्येण कारण प्रावर्त्यत इति । कथ तर्हि ? वरणभेदस्तु तत क्षेत्रिकवत् । यथा क्षेत्रिक केदारादपां पूर्णात्के दारान्तरं पिप्लावयिषु समं निम्न निम्नतरं वा नाप पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासा भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवाप केदारान्तरमाप्लावयन्ति तथा धर्म प्रकृतीनामावरणधर्मं भिनत्ति तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतय स्व स्वं विकारमाप्लावयन्ति।'
महाभारत भी इस सत्यका इस प्रकार समर्थन करता है—
१ श्रीश्रीविशुद्धानन्दप्रसङ्ग । महामहोपाध्याय श्रीगोपीनाथ कविराजकृत ।
१ म म गो ना द्वारा समर्थित और उदाहृत ।
२३ * मन्दानं विन्दुमत्तारं नान्यं धीरे न शोचति *
'अदर्शनादापतिता पुनश्चादर्शनं गता ।'
अर्थात् पूर्व, कुछ अदर्शन (अव्यक्त) से दर्शन (व्यक्त)
और दर्शन (व्यक्त) से अदर्शन (अव्यक्त) अवस्थाओंमें
परिवर्तन होते रहते हैं। अभावसे भाव और भावसे अभाव-
की उत्पत्ति कदापि नहीं होती।
इस उपनिषदात्मक सत्यका संस्कृत कवियोंने भी समर्थन
किया है। निम्न पद्य-खण्ड इसके दिग्दर्शन हैं।
'स्पर्शानुकूला अपि सूर्यकान्ता
स्वकीयतेजोऽभिभवाद् दहन्ति ।'
'शमप्रधानेषु तपोधनेषु
गूढ़ हि दाहात्मकमस्ति तेज ॥'
अर्थात् सूर्यकान्त मणिमें अव्यक्त तेज सूर्य-किरणोंके स्पर्श-
से व्यक्त होता है वैसे ही शान्ति-प्रधान तपोधनमें दाहत्मक
तेज अव्यक्त-अवस्थामें रहता है।
हमारा पुराण-साहित्य भी इस सत्यका साक्षी है। उसमे
न केवल प्राकृतिक विकारोंके व्यक्ताव्यक्त भावोंपर ही प्रकाश
डाला गया है, प्रत्युत यह भी बताया गया है कि योग बल-
रूप निमित्तको प्राप्तकर बाल्यावस्था, युवावस्था ओर वृद्धा-
वस्था भी एक दूसरीम परिणत हो जाती ह। साथ ही आकार-
प्रकार और रूप-रंग भी एक दूसरेमे परिणत किये जा सकते
हैं। कहा जाता है, चीनके लामा लोग इस समय भी ऐसे
परीक्षण किया करते हैं। श्रीमती नील अपने यात्रा-वृत्तान्तमें
लिखती हैं—
'मैं चुपचाप बैठी हुई लामाको देखती रही। उनमें
किसी तरहकी हरकत नहीं थी ओर वह जड़वत् प्रतीत होते
थे। मैने देखा कि धीरे धीरे उनकी आकृति बदल रही है,
उनके चेहरेपर झुर्रियाँ पैदा हो रही है और चेहरेपर ऐसा
रूप प्रकट हो रहा है जो मैंने उनमे कभी नहीं देखा था।
उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और प्रिंस आश्चर्यसे काँप उठे।'
'हमलोग जिस आदमीको देख रहे थे, यह डार्लिगके
गोनचेन नहीं थे। यह कोई दूसरा ही आदमी था, जिसे हम
नहीं जानते थे। बडी कठिनाईसे इस व्यक्तिने अपना मुँह
खोला और डार्लिगसे भिन्न वाणीमे बोला।'
'इसके बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आँखे बन्द कर लीं,
फिर उनकी आकृति बदलने लगी और डार्लिग लामाके
रूपमें आ गयी।'
हमारी प्रान्तीय भाषाओमे भी हमे इस सत्यके प्रकारान्तर-
से दर्शन होते है, प्राय लोग कहा करते हैं—
१. पिण्डे सो ब्रह्माण्डे।
२. ब्रह्माण्डे सो पिण्डे।
३ सबमें सो हममे और हममे सो सबमे।
इन वाक्योंका यही अभिप्राय है कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक
वस्तुमे मौजूद है। अन्तर केवल इतना ही है कि एक वस्तु व्यक्त
है किंतु उसीमें अनन्त अव्यक्त वस्तुएँ (प्राकृतिक विकार-भेद)
विद्यमान ह, परतु वे नैमित्तिक (Incidental) उपायोंसे
स्वप्रकृतिवश व्यक्त हो उठती हैं, किंतु इसका यह भाव
कदापि नहीं है कि नैमित्तिक उपाय स्वय अव्यक्त वस्तुओंका
रूप धारण कर लेते है। इसलिये कि वस्तु-प्रकृतिमे स्वत
व्यक्त होनेकी सत्ता विद्यमान है, किंतु है वह पुरुष-साध्य।
फिर पुरुष ब्रह्म हो या व्यक्तिविशेष वैज्ञानिक। इसी रहस्यको
आंग्ल-भाषामें एक भाष्यकारने इस तरह समझाया है—
The creative-causes are not moved
into-action by any incidental causes, but
that pierces the obstacles from it like
the husband man
साधुका स्वभाव
नान्तर्विचिन्तयति किञ्चिदपि प्रतीप-
माकोपितोऽपि सुजनः पिशुनेन पापम् ।
अर्कद्विषोऽपि हि मुखे पतिताग्रभागा-
स्तारापतेरमृतमेव कराः किरन्ति ॥
चुगली खानेवाले दुष्ट मनुष्यके द्वारा क्रोध दिलानेपर भी साधुपुरुष उसके विरुद्ध अमङ्गलमय प्रतिशोधकी बात अपने
मनमें नहीं लाते। राहु चन्द्रमाका सहज विद्वेषी है, किंतु चन्द्रमाकी सुधामयी किरणें उसके मुखमें पड़कर भी अमृतकी ही
वर्षा करती हैं।