कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२३ * मन्दानं विन्दुमत्तारं नान्यं धीरे न शोचति *
'अदर्शनादापतिता पुनश्चादर्शनं गता ।'
अर्थात् पूर्व, कुछ अदर्शन (अव्यक्त) से दर्शन (व्यक्त)
और दर्शन (व्यक्त) से अदर्शन (अव्यक्त) अवस्थाओंमें
परिवर्तन होते रहते हैं। अभावसे भाव और भावसे अभाव-
की उत्पत्ति कदापि नहीं होती।
इस उपनिषदात्मक सत्यका संस्कृत कवियोंने भी समर्थन
किया है। निम्न पद्य-खण्ड इसके दिग्दर्शन हैं।
'स्पर्शानुकूला अपि सूर्यकान्ता
स्वकीयतेजोऽभिभवाद् दहन्ति ।'
'शमप्रधानेषु तपोधनेषु
गूढ़ हि दाहात्मकमस्ति तेज ॥'
अर्थात् सूर्यकान्त मणिमें अव्यक्त तेज सूर्य-किरणोंके स्पर्श-
से व्यक्त होता है वैसे ही शान्ति-प्रधान तपोधनमें दाहत्मक
तेज अव्यक्त-अवस्थामें रहता है।
हमारा पुराण-साहित्य भी इस सत्यका साक्षी है। उसमे
न केवल प्राकृतिक विकारोंके व्यक्ताव्यक्त भावोंपर ही प्रकाश
डाला गया है, प्रत्युत यह भी बताया गया है कि योग बल-
रूप निमित्तको प्राप्तकर बाल्यावस्था, युवावस्था ओर वृद्धा-
वस्था भी एक दूसरीम परिणत हो जाती ह। साथ ही आकार-
प्रकार और रूप-रंग भी एक दूसरेमे परिणत किये जा सकते
हैं। कहा जाता है, चीनके लामा लोग इस समय भी ऐसे
परीक्षण किया करते हैं। श्रीमती नील अपने यात्रा-वृत्तान्तमें
लिखती हैं—
'मैं चुपचाप बैठी हुई लामाको देखती रही। उनमें
किसी तरहकी हरकत नहीं थी ओर वह जड़वत् प्रतीत होते
थे। मैने देखा कि धीरे धीरे उनकी आकृति बदल रही है,
उनके चेहरेपर झुर्रियाँ पैदा हो रही है और चेहरेपर ऐसा
रूप प्रकट हो रहा है जो मैंने उनमे कभी नहीं देखा था।
उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और प्रिंस आश्चर्यसे काँप उठे।'
'हमलोग जिस आदमीको देख रहे थे, यह डार्लिगके
गोनचेन नहीं थे। यह कोई दूसरा ही आदमी था, जिसे हम
नहीं जानते थे। बडी कठिनाईसे इस व्यक्तिने अपना मुँह
खोला और डार्लिगसे भिन्न वाणीमे बोला।'
'इसके बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आँखे बन्द कर लीं,
फिर उनकी आकृति बदलने लगी और डार्लिग लामाके
रूपमें आ गयी।'
हमारी प्रान्तीय भाषाओमे भी हमे इस सत्यके प्रकारान्तर-
से दर्शन होते है, प्राय लोग कहा करते हैं—
१. पिण्डे सो ब्रह्माण्डे।
२. ब्रह्माण्डे सो पिण्डे।
३ सबमें सो हममे और हममे सो सबमे।
इन वाक्योंका यही अभिप्राय है कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक
वस्तुमे मौजूद है। अन्तर केवल इतना ही है कि एक वस्तु व्यक्त
है किंतु उसीमें अनन्त अव्यक्त वस्तुएँ (प्राकृतिक विकार-भेद)
विद्यमान ह, परतु वे नैमित्तिक (Incidental) उपायोंसे
स्वप्रकृतिवश व्यक्त हो उठती हैं, किंतु इसका यह भाव
कदापि नहीं है कि नैमित्तिक उपाय स्वय अव्यक्त वस्तुओंका
रूप धारण कर लेते है। इसलिये कि वस्तु-प्रकृतिमे स्वत
व्यक्त होनेकी सत्ता विद्यमान है, किंतु है वह पुरुष-साध्य।
फिर पुरुष ब्रह्म हो या व्यक्तिविशेष वैज्ञानिक। इसी रहस्यको
आंग्ल-भाषामें एक भाष्यकारने इस तरह समझाया है—
The creative-causes are not moved
into-action by any incidental causes, but
that pierces the obstacles from it like
the husband man
साधुका स्वभाव
नान्तर्विचिन्तयति किञ्चिदपि प्रतीप-
माकोपितोऽपि सुजनः पिशुनेन पापम् ।
अर्कद्विषोऽपि हि मुखे पतिताग्रभागा-
स्तारापतेरमृतमेव कराः किरन्ति ॥
चुगली खानेवाले दुष्ट मनुष्यके द्वारा क्रोध दिलानेपर भी साधुपुरुष उसके विरुद्ध अमङ्गलमय प्रतिशोधकी बात अपने
मनमें नहीं लाते। राहु चन्द्रमाका सहज विद्वेषी है, किंतु चन्द्रमाकी सुधामयी किरणें उसके मुखमें पड़कर भी अमृतकी ही
वर्षा करती हैं।