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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कृष्ण गरुड सम्वाद

कबीरकृष्णगीता ।

९९

एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥
निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥
जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥
तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥
तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥

दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।

ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥
जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥
सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥
सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥
विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥

कबीरवचन ।

हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥
हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥
जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥

दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।

दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥

गरुडवचन ।

गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥
कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥
कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा
औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥

१००

कबीरकृष्णगीता ।

श्रीकृष्णवचन ।

सुन खगेशे कहे त्रिभुवनराई । सबकी गति मैं कहों बुझाई ॥
सतकबीरकी भक्ति जो करि हैं। सो सत सत्यलोकपगु धरि हैं ॥
अमरवीर हिरभर काया । सवी सुवास अभी फल पाया ॥

दोहा—सत्यकबीरके सेवक, बहुर योनि नहीं आव ।
अमरलोक सुख विलसे, निरभे कैल कराव ॥

निरगुण अजर कबीरा जिवतारा । सरगुण भक्त जो दस औतारा ॥
नकली निरगुण निरंजनराई । जिनके हम योहदार कहाई ॥
सकल मूल निरगुणकबीरा । सरगुण राम कृष्ण मम लीला ॥
हमरी भक्ति जो करे सचेता । सब तज गुरु साधुनसो हेता ॥
ब्रह्म बोलता पूजे सोई । माटी पाथर साधु न जोई ॥
कपिलगऊ भाव धर रहई । भला बुरा ये सबके सहई ॥
जीव मृतक होय मोहिं भावे । सब वैकुंठ साधु तन पावे ॥

दोहा—जवलग मैं वैकुंठ रहों, तवलग मेरे पास ।

प्रभु आज्ञा मैं औतारों, मम अश्रित गर्भवास ॥
रहित मुक्त नहीं हमरे हांथा । रहित मुक्त कबीर गुरु दाता ॥
करे मम भक्त देह मैं तारों । सत्यकबीर देह निस्तारों ॥
सद्वरु समर्थ रूप हमारा । योह समान को आन विचारा ॥
एक भैन औ कबीरसे भाई । कलुक निरंजन अस्थान जब जाई
और सब हैं हमरे आसा । शिव अज सनकादिक मम दासा ॥
देह मुक्तको हम हैं दाता । जीवके मुक्त कबीरके हांथा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१०१

देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥
गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥

दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।

सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव।
रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥
रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥
कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥
निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥

दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।

पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥
कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥
सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥
पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥
जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥
कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥

दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।

सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥
सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली
निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥

दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।

कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥