कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
नारदके गुरु करने और चौरासी भोगसे छूटनेकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
२९
यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥
तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥
कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥
ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥
अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥
तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥
चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥
लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥
लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥
कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥
भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥
कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥
कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥
पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥
सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे
दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।
कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥
गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥
गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥
नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥
जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥
३०
कबीरकृष्णगीता ।
धन्य गुरु अब धन्य सो कहिये । जासु चिन्हाये गुरुपद लहिये ॥
यथमहि रजगुण गुरुकी महिमा । सुनहु सतोयुण गुरुकी महिमा ॥
तमगुण गुरुकी कहहुँ सुभाऊ । देवी पंथकर चाल लखाऊ ॥
देव निरंजन पंचम कहिये । जोत अकाश होय दरशन लहिये ॥
छठयें जीव सतयें सतनामा । सत्यनाम संतन सुखधामा ॥
संतके प्राण सब जीव सुखदाई । सोई सत कबीर गोसाई ॥
एक जीव त्रिगुण दरशावे । इंगला पिंगला सुखमन भावे ॥
दोहा-वौये इंगला दहिने पिंगला, मध्यसुषुम्णा नार ।
तापर मनपर मन निज मन है, सोई रूप हमार ॥
निज मनपर तिहासन साजा । तापर सतकबीर विराजा ॥
तहैं न काल जंजाल न व्यापा । नहिं तहैं पुन्य नहीं तहैं पापा ॥
तहां न रवि शाशिके उजियारी । एक रोम विध कोट चिकारी ॥
पांच पचीस तीन नहिं तहां । त्रिगुण न नाम कबीरसो जहां ॥
रूप स्वरूप सो निर्मल काया । अजरहिरंवर हंस रहाया ॥
दोहा-एक हंसकी शोभा, रवि शाशिको कोटन तूल ।
तहां सो सत्यकबीर विराजे, सब जीवनके मूल ॥
पूरण पुन्यमान जिव होई । सतकबीर कहैं सेवे सोई ॥
लखन कोट माहीं एक जीवा । सो करिहैं कबीरको पीवा ॥
जेहि होय दाम सो खाय मिठाई । मकरा घांस रंक ले खाई ॥
तैसे दाम सहज सतदाया । पूरण पुण्य सदुरु पद पाया ॥
सदुरु सत्यकबीर जिव व्याही । जीव व्याह अयरलोकलै जाही ॥