हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
कथा ८
२२६ हितोपदेशः [ संधिः १५-
कथा ८
[ देवशर्मा नामक ब्राह्मण और कुम्हारकी कहानी ८ ]
'अस्ति देवीकोटनाम्नि नगरे देवशर्मा नाम ब्राह्मणः । तेन महा-
विषुवसंक्रान्त्यां सक्तुपूर्णशराव एकः प्राप्तः । तमादायासौ कुम्भ-
कारस्य भाण्डपूर्णमण्डपैकदेशे रौद्रेणाकुलितः सुप्तः । ततः सक्तु-
रक्षार्थं हस्ते दण्डमेकमादायाचिन्तयत्—'यद्यहं सक्तुशरावं
विक्रीय दश कपर्दकान् प्राप्स्यामि तदाऽत्रैव तैः कपर्दकैर्घटशरावा-
दिकमुपक्रीयानेकधावृद्धैस्तद्धनैः पुनः पुनः पूगवस्त्रादिकमुपक्रीय
विक्रीय लक्षसंख्यानि धनानि कृत्वा विवाहचतुष्टयं करिष्यामि ।
अनन्तरं तासु सपत्नीषु रूपयौवनवती या तस्यामधिकानुरागं
करिष्यामि । सपत्न्यो यदा द्वन्द्वं करिष्यन्ति तदा कोपाकुलोऽहं
ता लगुडेन ताडयिष्यामि' इत्यभिधाय लगुडः क्षिप्तः । तेन सक्तु-
शरावश्चूर्णितो भाण्डानि च बहूनि भग्नानि । ततस्तेन शब्देनाग-
तेन कुम्भकारेण तथाविधानि भाण्डान्यवलोक्य ब्राह्मणस्तिरस्कृतो
मण्डपाद्बहिःकृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि—"अनागतवतीं चिन्ताम्"
इत्यादि ॥' ततो राजा रहसि गृध्रमुवाच—'तात ! यथा कर्तव्यं
तथोपदिश ।'
'देवीकोट नाम एक नगरमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था । उसने मेषकी
संक्रान्ति पर सत्तूसे भरा एक सकोरा पाया । उसको ला कर वह कुम्हारके बर्त-
नोंसे भरे हुए अवेकी एक ओर गरमीके कारण सो गया । फिर सत्तूकी रख-
वालीके लिये हाथमें एक लकड़ी ला कर सोचने लगा कि-'जो मैं सत्तूके सकोरे-
को बेच कर दस कौड़ी पाऊंगा तो यहाँ ही उन कौड़ियोंसे घड़े, सकोरे आदि
मोल ले कर अनेक रीतिसे बढ़ाये हुए उस धनसे बार बार सुपारी कपड़े आदि
मोल ले कर और बेच कर लाखों रुपयेका धन इकट्ठा करके चार विवाह करूँगा ।
फिर उन स्त्रियोंमें जो रूपरंगमें अच्छी होगी उसी पर अधिक स्नेह करूँगा,
और सौतें जब लड़ाई करेंगी तब क्रोधसे उखता कर मैं उन्हें लकड़ीसे मारूँगा—
यह कह कर लकड़ी फेंकी । उससे सत्तूका सकोरा चूर चूर हो गया और बहुतसे
बर्तन भी फूट गये । फिर उस शब्दको सुन कुम्हार आया। उसने वैसे फूटे टूटे
बर्तनोंको देख कर ब्राह्मणका तिरस्कार किया और अवेसे बाहर निकाल दिया !
इसलिये मैं कहता हूँ—"विना आई चिंताको" इत्यादि ।' फिर राजा एकांतमें
गिद्धसे बोला-'प्यारे ! जो करना हो सो कहो ।
-१८ ] समयानुसार कथन २२७
गृध्रो ब्रूते, —
'मदोद्धतस्य नृपतेः संकीर्णस्येव दन्तिनः ।
गच्छन्त्युन्मार्गयातस्य नेतारः खलु वाच्यताम् ॥ १६ ॥
गृद्ध बोला-'कुमार्गमें जाने वाले अर्थात् अनुचित काम करने वाले अभिमानी
राजाके मंत्री लोग, कुमार्गमें जाने वाले तथा मत्त वाले हाथीवानोंके समान, निश्चय
करके निन्दाको पाते हैं ॥ १६ ॥
शृणु देव ! किमस्माभिर्बलदर्पाह्दुर्गं भग्नम् ? न; किंतु तव
प्रतापाधिष्ठितेनोपायेन।' राजाह—'भवतामुपायेन।' गृध्रो ब्रूते—
‘यद्यस्मद्वचनं क्रियते तदा स्वदेशे गम्यताम् । अन्यथा वर्षाकाले
प्राप्ते पुनर्विग्रहे सत्यस्माकं परभूमिष्ठानां स्वदेशगमनमपि दुर्लभं
भविष्यति । सुखशोभार्थं संधाय गम्यताम् । दुर्गं भग्नं कीर्तिश्च
लब्धैव । मम संमतं तावदेतत् ।
सुनिये महाराज ! क्या हमने बलके घमंडसे गढ़ तोड़ा है ? यह बात नहीं है ।
परन्तु आपके प्रतापसे निश्चित किये उपायसे तोड़ा है।' राजा बोला-'तुम्हारे
उपायसे टूटा है।' गिद्ध बोला-'जो मेरा कहना मानो तो अपने देशमें चले चलो।
नहीं तो वर्षा आने पर फिर लड़ाई होनेमें, पराई भूमिमें रहने वाले हम लोगोंका
अपने देशको जाना भी कठिन होगा। इसलिये सुख और शोभाके लिये मेल करके
चलिये, गढ़ टूट गया और यश भी मिला । मेरी तो यह राय है ।
यतः,—
यो हि धर्मं पुरस्कृत्य हित्वा भर्तुः प्रियाऽप्रिये ।
अप्रियाण्याह तथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १७ ॥
क्योंकि—जो मनुष्य धर्मको आगे रख कर स्वामीके प्रिय और अप्रियको छोड़
कर अप्रिय भी सत्य कहता है उससे राजाको सहारा होता है, अर्थात् कटु भले
हो, सच्चा और योग्य सलाह देने वालाही मंत्री राजाका सचमुच सहायकती
होता है ॥ १७ ॥
अन्यच्च,—
सुहृद्बलं तथा राज्यमात्मानं कीर्तिमेव च ।
युधि संदेहदोलास्थं को हि कुर्याद्बालिशः ? ॥ १८ ॥
२२८ हितोपदेशः [ संधिः १९ -
दूसरे-और कौनसा बुद्धिमान् मित्रकी सेनाको, राज्यको, अपनेको, और
कीर्तिको संग्रामके संदेहरूपी हिंडोलेमें झुलावेगा अर्थात् संकटमें गिरा देगा ॥१८॥
अपरं च,—
संधिमिच्छेत् समेनापि संदिग्धो विजयो युधि ।
सुन्दोपसुन्दावन्योन्यं नष्टौ तुल्यबलौ न किम् ?' ॥ १९ ॥
और समानके साथ भी मेल करनेकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि युद्धमें
विजयका संदेह है । जैसे समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द आपसमें क्या
नष्ट नहीं हो गये ?' ॥ १९ ॥
राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
कथा ९
सुन्द उपसुन्द नामक दो दैत्योंकी कहानी ९ ]
'पुरा दैत्यौ महोदारौ सुन्दोपसुन्दनामानौ महता क्लेशेन त्रैलो-
क्यकामनया चिराच्चन्द्रशेखरमाराधितवन्तौ । ततस्तयोर्भगवान्
परितुष्टः 'वरं वरयतम्' इत्युवाच । अनन्तरं तयोः समधिष्ठि-
तया सरस्वत्या तावन्वद्वक्तुकामावन्यदभिहितवन्तौ । यद्यावयो-
र्भगवान् परितुष्टस्तदा स्वप्रियां पार्वतीं परमेश्वरो ददातु । अथ
भगवता क्रुद्धेन वरदानस्यावश्यकतया विचारमूढयोः पार्वती
प्रदत्ता । ततस्तस्या रूपलावण्यलुब्धाभ्यां जगद्धातिभ्यां मनसो-
त्सुकाभ्यां पापतिमिरान्यां ममेत्यन्योन्यकलहाभ्यां प्रमाणपुरुषः
कश्चित् पृच्छ्यतामिति मतौ कृतायां स एव भट्टारको वृद्धद्विज-
रूपः समागत्य तत्रोपस्थितः । अनन्तरम् 'आवाभ्यामीयं स्वबल-
लब्धा, कस्येयमावयौर्भवति ?' इति ब्राह्मणमपृच्छताम् ।
'पहले बड़े उदार सुन्द और उपसुन्द नाम दो दैत्योंने बड़े क्लेशसे तीनों
लोककी इच्छासे बहुत काल तक महादेवजीकी आराधना की । फिर उन दोनों पर
भगवान्ने प्रसन्न हो कर यह कहा कि “वर माँगो” । फिर हृदयमें स्थित सर-
स्वतीकी प्रेरणासे वे दोनों, कहना तो कुछही चाहते थे और कुछका कुछ कह
दिया कि जो हम दोनों पर भगवान् प्रसन्न हैं तो परमेश्वर अपनी प्रिया पार्वती-
जीको दें । पीछे भगवान्ने क्रोधसे वरदान देने की आवश्यकतासे उन विचारहीन
मूर्खोंको पार्वतीजी दे दी । तब उनके रूप और सुन्दरतासे लुभाये संसारके
नाश करने वाले, मनमें उत्कंठित, कामसे अंधे तथा 'यह मेरी है मेरी है' ऐसा
आपसमें झगड़ा करने वाले इन दोनोंकी "किसी निर्णय करने वाले पुरुषसे पूछना
चाहिये" ऐसी बुद्धि करने पर स्वयं ईश्वर बूढ़े ब्राह्मणके वेषसे आ कर वहाँ उप-
स्थित हुए । पीछे, 'हम दोनोंने अपने बलसे इनको पाया है; हम दोनोंमेंसे यह
किसकी है ?'—ऐसा ब्राह्मणसे पूछा ।
ब्राह्मणो ब्रूते,—
'वर्णश्रेष्ठो द्विजः पूज्यः क्षत्रियो बलवानपि ।
धनधान्याधिको वैश्यः शूद्रस्तु द्विजसेवया ॥ २० ॥
ब्राह्मण बोला—'वर्णोंमें श्रेष्ठ होनेसे ब्राह्मण, बली होनेसे क्षत्रिय, अधिक धन-
धान्यवान् होनेसे वैश्य और इन तीनों वर्णोंकी सेवासे शूद्र पूज्य होता है ॥२०॥
तद्युवां क्षत्रधर्मानुगौ, युद्ध एव युवयोर्नियमः।' इत्यभिहिते सति
'साधुक्तमनेन' इति कृत्वाऽन्योन्यतुल्यवीर्यौ समकालमन्योन्यघा-
तेन विनाशमुपगतौ । अतोऽहं ब्रवीमि—"संधिमिच्छेत्
समेनापि" इत्यादि ॥' राजाह—'प्रागेव किं नोक्तं भवद्भिः ?'।
मन्त्री ब्रूते—'मद्वचनं किमवसानपर्यन्तं श्रुतं भवद्भिः ? तदापि
मम संमत्या नायं विग्रहारम्भः । साधुगुणयुक्तोऽयं हिरण्यगर्भो
न विग्राह्यः।
गिद्ध बोला—'इसलिये तुम दोनों क्षत्रियधर्म पर चलने वाले होनेसे तुम
दोनोंका युद्ध ही नियम है । ऐसा कहते ही "यह इसने अच्छा कहा" यह कह
कर समान बल वाले वे दोनों एक ही समय आपसमें लड़ कर मर गये । इसलिये
मैं कहता हूँ—"समान बल वाले के साथ भी संधि करनी चाहिये" इत्यादि।' राजा
बोला-'तुमने पहलेही क्यों नहीं कहा ?' मंत्रीने कहा-क्या मेरी बात आपने
अंत तक सुनी थी ? तोभी मेरी संमतिसे यह युद्ध आरंभ नहीं हुआ है ।
सुन्दर गुणोंसे युक्त यह हिरण्यगर्भ विरोध करनेके योग्य नहीं है ।
तथा चोक्तम्,—
सत्यार्यौ धार्मिकोऽनार्यो भ्रातृसंघातवान् बली ।
अनेकयुद्धविजयी संधेयाः सप्त कीर्तिताः ॥ २१ ॥
२३० हितोपदेशः [ संधिः २२-
जैसा कहा है—सत्य बोलने वाला, सज्जन, धर्मशील, दुर्जन, अधिक भाई-
बंधु वाला, शूरवीर और अनेक संग्रामोंमें जय पाने वाला ये सात मनुष्य सन्धि
करनेके योग्य कहे गये हैं ॥ २१ ॥
सत्योऽनुपालयेत् सत्यं संधितो नैति विक्रियाम् ।
प्राणबाधेऽपि सुव्यक्तमार्यों नायात्यनार्यताम् ॥ २२ ॥
सत्यभाषी सत्यके अनुसार संधि करके विश्वासघात नहीं करता है, और सज्जन
प्राण जाने पर भी प्रत्यक्षमें नीचता नहीं करता है ॥ २२ ॥
धार्मिकस्याभियुक्तस्य सर्व एव हि युध्यते ।
प्रजानुरागाद्धर्माच्च दुःखोच्छेद्यो हि धार्मिकः ॥ २३ ॥
शत्रुओंसे घिरे हुए धार्मिकके सभी अनुकूल होते हैं इसलिये धर्मसे तथा
प्रजाके अनुरागसे धार्मिक राजा दुःखसे जीतनेके योग्य होता है ॥ २३ ॥
संधिः कार्योंऽप्यनार्येण विनाशे समुपस्थिते ।
विना तस्याश्रयेणार्यों न कुर्यात् कालयापनम् ॥ २४ ॥
विनाश उपस्थित होने पर दुष्टके साथ भी मेल कर लेना चाहिये और उसके
आश्रयके विना सज्जनको कालयापन (समय काटना) नहीं करना चाहिये ॥ २४ ॥
संहतत्वाद्यथा वेणुर्निबिडैः कण्टकैर्वृतः ।
न शक्यते समुच्छेत्तुं भ्रातृसंघातवांस्तथा ॥ २५ ॥
और जैसे बहुतसे काँटोंसे लदा हुआ बाँस आपसमें मिले रहनेसे नहीं कट
सकता है वैसे ही भाई-बन्धुओंसे मिला हुआ पुरुष भी नष्ट नहीं हो सकता है २५
बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ।
प्रतिवातं न हि घनः कदाचिदुपसर्पति ॥ २६ ॥
बली शत्रुके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसा उदाहरण नहीं है, क्योंकि बादल
पवनके प्रतिकूल कभी नहीं चलता है, अर्थात् जिधरको पवन जाती है उधरको
ही चलता है ॥ २६ ॥
जमदग्नेः सुतस्येव सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ।
अनेकयुद्धजयिनः प्रतापादेव भुज्यते ॥ २७ ॥
और जमदग्निके पुत्र अर्थात् परशुरामके समान अनेक युद्धोंमें जीतने वाले
राजाके प्रतापसे बहुतसे संग्रामोंमें सब मनुष्य सब स्थानमें सब कालमें पराये
राजाको अधिकारमें कर लेते हैं ॥ २७ ॥
-३२] सन्धिका गुणदोषकथन २३१
अनेकयुद्धविजयी संधानं यस्य गच्छति ।
तत्प्रतापेन तस्याशु वशमायान्ति शत्रवः ॥ २८ ॥
अनेक संग्रामोंमें जीतने वाला मनुष्य जिस राजासे मेल कर लेता है तो उसके
प्रतापसे (जिसके साथ संधि की है) उसके शत्रु शीघ्र वशमें हो जाते हैं ॥२८॥
तत्र तावद्बहुभिर्गुणैरुपेतः संधेयोऽयं राजा।' चक्रवाकोऽवद-
त्—'प्रणिधे ! सर्वत्रावव्रज । सर्वमवगतम् । गत्वा पुनरा गमिष्य-
सि।' राजा चक्रवाकं पृष्टवान्—'मन्त्रिन् ! असंघेयाः कति
तान्श्रोतुमिच्छामि ।'
इसलिये अनेक गुणोंसे युक्त यह राजा मेल करनेके योग्य है।' चकवा कहने
लगा—'हे दूत ! सब स्थानोंमें जा, तुमने सब समझ लिया है, और जा कर फिर
लोट आना।' राजाने चकवेसे पूछा-'हे मंत्री ! कितने मनुष्य संधि करनेके
योग्य नहीं हैं, उन्हें सुनना चाहता हूँ।'
मन्त्री ब्रूते—'देव ! कथयामि । शृणु,—
मंत्री बोला-महाराज ! कहता हूँ सुनिये—
बालो वृद्धो दीर्घरोगी तथा ज्ञातिबहिष्कृतः ।
भीरुको भीरुजनको लुब्धो लुब्धजनस्तथा ॥ २९ ॥
बालक, बूढ़ा, बहुत दिनोंका रोगी और जाति बाहर किया हुआ, डरपोक,
भय उत्पन्न करने वाला, लोभी और जिसका लोभी मंत्री हो ॥ २९ ॥
विरक्तप्रकृतिश्चैव विषयेष्वतिसक्तिमान् ।
अनेकचित्तमन्त्रस्तु देवब्राह्मणनिन्दकः ॥ ३० ॥
और रूठी हुई प्रजा वाला, विषयभोगादिमें आसक्त, अनेकोंके चित्तमें जिसका
मंत्र रहे अर्थात् जिसका मंत्र गुप्त न हो, और देवता-ब्राह्मणोंकी निन्दा
करने वाला हो ॥ ३० ॥
दैवोपहतकश्चैव तथा दैवपरायणः ।
दुर्भिक्षव्यसनोपेतो बलव्यसनसंकुलः ॥ ३१ ॥
भाग्यहीन, प्रारब्धकी चिन्ता करने वाला, अकालके दुःखसे दुःखी और सेनाकी
पीडासे व्याकुल हो ॥ ३१ ॥
अदेशस्थो बहुरिपुर्युक्तः कालेन यश्च न ।
सत्यधर्मव्यपेतश्च विंशतिः पुरुषा अमी ॥ ३२ ॥
२३२ हितोपदेशः [ संधिः ३३-
दूसरेके राज्यमें रहने वाला, बहुतसे शत्रुओंसे युक्त, वे अवसर लडाई ठानने
वाला, और सत्य धर्मसे रहित, ये बीस पुरुष हैं ॥ ३२ ॥
एतैः संधिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केवलम् ।
एते विगृह्यमाणा हि क्षिप्रं यान्ति रिपोर्वशम् ॥ ३३ ॥
इनके साथ सन्धि न करे, केवल ही संग्राम करे, क्योंकि ये लड़ कर अवश्य
शीघ्र ही शत्रुके वशमें आ जाते हैं ॥ ३३ ॥
बालस्याल्पप्रभावत्वान्न लोको योद्धुमिच्छति ।
युद्धायुद्धफलं यस्माज्ज्ञातुं शक्तो न बालिशः ॥ ३४ ॥
बालकके थोड़े प्रताप होनेसे पुरुष युद्ध (विरोध)करनेकी इच्छा नहीं करता है,
क्योंकि बालक लड़ने और नहीं लड़नेका फल ( भला या बुरा ) नहीं जान
सकता है ॥ ३४ ॥
उत्साहशक्तिहीनत्वाद्वृद्धो दीर्घामयस्तथा ।
स्वैरेव परिभूयेते द्वावप्येतावसंशयम् ॥ ३५ ॥
और वृद्ध तथा बहुत कालका रोगी ये दोनों, उत्साह और शक्तिसे हीन होनेके
कारण अवश्य आप ही पराजय पाते हैं ॥ ३५ ॥
सुखोच्छेद्यो हि भवति सर्वज्ञातिबहिष्कृतः ।
त एवैनं विनिघ्नन्ति ज्ञातयस्त्वात्मसात्कृताः ॥ ३६ ॥
सब जातिसे बाहर निकाला गया शत्रु सहजही मारा जा सकता है, क्योंकि
उसी जातिके ही मनुष्य इसके धनादिको अपने वशमें करके इसको मार डालते
हैं ॥ ३६ ॥
भीरुर्युद्धपरित्यागात् स्वयमेव प्रणश्यति ।
तथैव भीरुपुरुषः संग्रामे तैर्विमुच्यते ॥ ३७ ॥
और डरपोक मनुष्य युद्धमें पीठ दे कर भाग जानेसे अपने आप ही नष्ट हो
जाता है, और उस डरपोकको संग्राममें उसके साथी भी छोड़ देते हैं ॥ ३७ ॥
लुब्धस्यासंविभागित्वान्न युध्यन्तेऽनुयायिनः ।
लुब्धानुजीविकैरेष दानभिन्नैर्निहन्यते ॥ ३८ ॥
और यथा योग्य भाग नहीं देनेसे लोभीकी सेनाके लोग नहीं लड़ते हैं और
पारितोषिक नहीं पाने वाले लोभी सेवकोंसे वह मार डाला जाता है-अर्थात्
विपत्ति आने पर वे उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥ ३८ ॥
-४५ ] उन्नतिपथमें अनुचित कृत्यसे हानि २३३
संत्यज्यते प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि ।
सुखाभियोज्यो भवति विषयेष्वतिसक्तिमान् ॥ ३९ ॥
बिगड़ी हुई प्रजा वाला ( राजा ) युद्धमें प्रजासे छोड़ दिया जाता है, और
जो विषयोंमें अधिक आसक्त होकर रहता है वह सहजहीमें हराया जा सकता
है ॥ ३९ ॥
अनेकचित्तमन्त्रस्तु भेद्यो भवति मन्त्रिणा ।
अनवस्थितचित्तत्वात् कार्यतः स उपेक्ष्यते ॥ ४० ॥
अनेक मनुष्योंसे गुप्त परामर्शको प्रकट करने वालेकी मंत्रीके साथ फूट हो जाती
है, और अनवस्थित(डामाडोल) चित्तके कारण कार्यमें मंत्री उसे छोड़ देता है ॥
सदा धर्मबलीयस्त्वाद्देवब्राह्मणनिन्दकः ।
विशीर्यते स्वयं ह्येष दैवोपहतकस्तथा ॥ ४१ ॥
धर्मके कारण बलवान् होनेसे भी, देवता और ब्राह्मणोंकी निंदा अथवा अवज्ञा
करने वाला और प्रारब्धहीन निस्सन्देह अपने आपही नाश हो जाता है ॥४१॥
संपत्तेश्च विपत्तेश्च दैवमेव हि कारणम् ।
इति दैवपरो ध्यायन् नात्मानमपि चेष्टते ॥ ४२ ॥
संपत्ति और विपत्तिका प्रारब्ध ही कारण है ऐसा सोच कर केवल प्रारब्धको
(ही प्रधान) मानने वाला अपने आपको काममें नहीं लगाता है ॥ ४२ ॥
दुर्भिक्षव्यसनी चैव स्वयमेव विषीदति ।
बलव्यसनयुक्तस्य योद्धुं शक्तिर्न जायते ॥ ४३ ॥
दुर्भिक्षकी पीड़ासे दुखी प्रजा वाला राजा आप ही दुर्बल होता है और पीड़ित
सेना वालेको लड़नेकी शक्ति नहीं होती है, अर्थात् नष्ट हो जाती है ॥ ४३ ॥
अदेशस्थो हि रिपुणा स्वल्पकेनापि हन्यते ।
ग्राहोऽल्पीयानपि जले गजेन्द्रमपि कर्षति ॥ ४४ ॥
पराये राज्यमें रहने वाला राजा थोड़े शत्रुओंसे भी मारा जाता है, क्योंकि
जलमें छोटेसे छोटाभी मकर बड़े हाथीको खींच लेता है ॥ ४४ ॥
बहुशत्रुस्तु संत्रस्तः श्येनमध्ये कपोतवत् ।
येनैव गच्छति पथा तेनैवाशु विपद्यते ॥ ४५ ॥
बहुतसे शत्रु वाला, डरा हुआ मनुष्य, बाज पक्षियोंके मध्यमें कबूतरके
समान जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गसे दुखी होता है ॥ ४५ ॥
२३४ हितोपदेशः [ संधिः ४६-
अकालसैन्ययुक्तस्तु हन्यते कालयोधिना ।
कौशिकेन हतज्योतिर्निशीथ इव वायसः ॥ ४६ ॥
युद्धके अनुचित समयमें सेनासे युक्त भी मनुष्य उचित समय पर लड़ने वालेसे
आधी रातमें नहीं दीखनेके कारण उलूकसे मारे हुए कागके समान मारा जाता है ॥
सत्यधर्मव्यपेतेन संदध्यान्न कदाचन ।
स संधितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ ४७ ॥
सत्य तथा धर्मरहितके साथ कभी मेल न करना चाहिये, क्योंकि वह संधिके
हो जाने पर भी असज्जनताके कारण तुरन्त पलट जाता है ॥ ४७ ॥
अपरमपि कथयामि । संधिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गु-
ण्यम् । कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनि-
पातप्रतीकारः कार्यसिद्धिश्च पञ्चाङ्गो मन्त्रः । सामदानभेददण्डा-
श्चत्वार उपायाः । उत्साहशक्तिर्मन्त्रशक्तिः प्रभुशक्तिश्चेति शक्ति-
त्रयम् । एतत्सर्वमालोच्य नित्यं विजिगीषवो भवन्ति महान्तः ।
और भी कहता हूँ—संधि (मैत्रीभाव), विग्रह (युद्ध), यान (यात्रा), आसन
(समय देखना), संश्रय (आश्रय लेना), द्वैधीभाव (छल), ये छः गुण हैं और
कर्मोंके आरंभका यत्न, पुरुष और द्रव्यका संग्रह, देशकालका विभाग और
विनिपातप्रतीकार (आपत्तिका दूर करना), कार्यसिद्धि ये पाँच विचारके अंग
हैं । साम, दान, भेद, दंड ये चार उपाय हैं और उत्साहशक्ति, मन्त्रशक्ति और
प्रभुशक्ति ये तीन शक्तियाँ हैं । इन सबको विचार कर बड़े पुरुष जीतनेकी इच्छा
करने वाले होते हैं ॥
या हि प्राणपरित्यागमूल्येनापि न लभ्यते ।
सा श्रीर्नीतिविदं पश्य चञ्चलापि प्रधावति ॥ ४८ ॥
जो लक्ष्मी प्राणत्यागरूपी मोलसे भी नहीं मिलती है वह लक्ष्मी चंचला
होनेसे भी नीति जानने वालोंके घर दौड़ती है, अर्थात् उनके वहाँ निवास
करती है ॥ ४८ ॥
तथा चोक्तम् ,—
जैसा कहा है,—
-५० ] राजा का सन्धि करने में हठ २३५
वित्तं यदा यस्य समं विभक्तं
गूढश्चरः संनिभृतश्च मन्त्रः ।
न चाप्रियं प्राणिषु यो ब्रवीति
स सागरान्तां पृथिवीं प्रशास्ति ॥ ४९ ॥
जिसका धन बराबर बाँट दिया गया है, तथा दूत गुप्त है, और मंत्र प्रका-
शित नहीं है, और जो प्राणियोंसे अप्रिय (कटु) वचन नहीं बोलता है वह
समुद्रपर्यन्त पृथिवीका राज्य करता है अर्थात् चक्रवर्ती राजा हो जाता है ॥४९॥
किंतु यद्यपि महामन्त्रिणा गृध्रेण संधानमुपन्यस्तं तथापि तेन
राज्ञा संप्रति भूतजयदर्पान्न मन्तव्यम् । देव ! तदेवं क्रियताम् ।
सिंहलद्वीपस्य महाबलो नाम सारसो राजाऽस्मन्मित्रं जम्बुद्वीपे
कोपं जनयतु ।
परन्तु यद्यपि महामंत्री गिद्धने संधि करनेका आरंभ किया है तोभी वह
राजा विजय होनेके घमंडसे अब नहीं मानता है, इसलिये महाराज ! ऐसा
कीजिये कि सिंहलद्वीपका राजा महाबल नाम सारस हमारा मित्र जम्बूद्वीप पर
कोप करे ।
यतः,—
सुगुप्तिमाधाय सुसंहतेन
बलेन वीरो विचरन्नरातिम् ।
संतापयेद्येन समं सुतप्त-
स्तप्तेन संधानमुपैति तप्तः ॥ ५० ॥
क्योंकि—वीर, बड़े गुप्त प्रकारसे अनुरक्त सेनाके द्वारा शत्रुको घेर कर पीड़ा
दे कि जिस पीड़ासे वह समान तप्ता अर्थात् उग्र हो जाय, क्योंकि तप्ता
तत्तेके साथ मिल जाता है, अर्थात् तुल्य पराक्रम वाला सहजमें मिला लिया
जाता है ॥ ५० ॥
राज्ञा 'एवमस्तु' इति निगद्य विचित्रनामा बकः सुगुप्तलेखं दत्त्वा
सिंहलद्वीपं प्रहितः ।
राजाने 'बहुत अच्छा' ऐसा कह कर विचित्र नाम बगुलेको गुप्त चिट्ठी दे कर
सिंहलद्वीपको भेज दिया ।
२३६ हितोपदेशः [ संधिः ५१-
अथ प्रणिधिरागत्योवाच—'देव ! श्रूयतां तत्रत्यप्रस्तावः । एवं
तत्र गृध्रेणोक्तम्—'देव ! यन्मेघवर्णस्तत्र चिरमुषितः स वेत्ति
किं संधेयगुणयुक्तो हिरण्यगर्भो न वा ?' इति । ततोऽसौ राज्ञा
समाहूय पृष्टः—'वायस ! कीदृशोऽसौ हिरण्यगर्भः ? चक्रवाको
मन्त्री वा कीदृशः ?' वायस उवाच—'देव ! हिरण्यगर्भो राजा
युधिष्ठिरसमो महाशयः, चक्रवाकसमो मन्त्री न क्वाप्यवलो-
क्यते ।' राजाह—'यद्येवं तदा कथमसौ त्वया वञ्चितः ?' ।
फिर दूतने आ कर कहा-'महाराज ! वहाँका समाचार सुनिये । वहाँ गिद्धने
यों कहा है कि हे महाराज ! मेघवर्ण काक जो वहाँ बहुत दिनों तक रहा था वह
जानता है कि हिरण्यगर्भ मिलापके योग्य गुणोंसे युक्त है या नहीं।' फिर राजाने
उसे बुला कर पूछा-'हे कौए ! वह हिरण्यगर्भ कैसा है?' और चकवा मंत्री कैसा
है ?' कौएने उत्तर दिया-'महाराज ! राजा हिरण्यगर्भ युधिष्ठिरके समान सज्जन
है; चकवेके समान मंत्री कहीं भी नहीं दीखा है।' राजा बोला—'जो ऐसाही
है तो तूने उसे कैसे ठग लिया ?'
विहस्य मेघवर्णः प्राह—'देव !
मेघवर्णने हँस कर कहा-'महाराज !
विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता ? ।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हत्वा किं नाम पौरुषम् ? ॥ ५१ ॥
विश्वास करने वाले मनुष्योंको ठगनेमें क्या चतुराई है ? जैसे गोदमें लेट कर
सोए हुएको मार देनेमें कौनसा पुरुषार्थ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ५१ ॥
शृणु देव ! तेन मन्त्रिणाहं प्रथमदर्शन एव ज्ञातः । किंतु महाशयो-
ऽसौ राजा । तेन मया विप्रलब्धः ।
सुनिये महाराज ! उस मंत्रीने पहले देखते ही मुझे जान लिया था, परन्तु
वह राजा बड़ा सज्जन है इसलिये मेरी ठगाईमें आ गया;
तथा चोक्तम्,—
आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् ।
स तथा वञ्च्यते धूर्तैर्ब्राह्मणश्छागतो यथा' ॥ ५२ ॥