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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 302 में से

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पृष्ठ 248

२२८ हितोपदेशः [ संधिः १९ -

दूसरे-और कौनसा बुद्धिमान् मित्रकी सेनाको, राज्यको, अपनेको, और
कीर्तिको संग्रामके संदेहरूपी हिंडोलेमें झुलावेगा अर्थात् संकटमें गिरा देगा ॥१८॥
अपरं च,—
संधिमिच्छेत् समेनापि संदिग्धो विजयो युधि ।
सुन्दोपसुन्दावन्योन्यं नष्टौ तुल्यबलौ न किम् ?' ॥ १९ ॥
और समानके साथ भी मेल करनेकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि युद्धमें
विजयका संदेह है । जैसे समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द आपसमें क्या
नष्ट नहीं हो गये ?' ॥ १९ ॥
राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—

कथा ९
सुन्द उपसुन्द नामक दो दैत्योंकी कहानी ९ ]
'पुरा दैत्यौ महोदारौ सुन्दोपसुन्दनामानौ महता क्लेशेन त्रैलो-
क्यकामनया चिराच्चन्द्रशेखरमाराधितवन्तौ । ततस्तयोर्भगवान्
परितुष्टः 'वरं वरयतम्' इत्युवाच । अनन्तरं तयोः समधिष्ठि-
तया सरस्वत्या तावन्वद्वक्तुकामावन्यदभिहितवन्तौ । यद्यावयो-
र्भगवान् परितुष्टस्तदा स्वप्रियां पार्वतीं परमेश्वरो ददातु । अथ
भगवता क्रुद्धेन वरदानस्यावश्यकतया विचारमूढयोः पार्वती
प्रदत्ता । ततस्तस्या रूपलावण्यलुब्धाभ्यां जगद्धातिभ्यां मनसो-
त्सुकाभ्यां पापतिमिरान्यां ममेत्यन्योन्यकलहाभ्यां प्रमाणपुरुषः
कश्चित् पृच्छ्यतामिति मतौ कृतायां स एव भट्टारको वृद्धद्विज-
रूपः समागत्य तत्रोपस्थितः । अनन्तरम् 'आवाभ्यामीयं स्वबल-
लब्धा, कस्येयमावयौर्भवति ?' इति ब्राह्मणमपृच्छताम् ।
'पहले बड़े उदार सुन्द और उपसुन्द नाम दो दैत्योंने बड़े क्लेशसे तीनों
लोककी इच्छासे बहुत काल तक महादेवजीकी आराधना की । फिर उन दोनों पर
भगवान्ने प्रसन्न हो कर यह कहा कि “वर माँगो” । फिर हृदयमें स्थित सर-
स्वतीकी प्रेरणासे वे दोनों, कहना तो कुछही चाहते थे और कुछका कुछ कह
दिया कि जो हम दोनों पर भगवान् प्रसन्न हैं तो परमेश्वर अपनी प्रिया पार्वती-