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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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वे ब्रह्म अर्थात् वेद ब्रह्मचारियों सहित जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट हुए हैं, उस शय्या
युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख
और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (८)
इन्द्रो वीर्ये ३ णोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः.
तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (९)
इंद्र अपने शक्तिशाली बाहुओं के द्वारा जिस पुर की रक्षा को उद्यत होते हैं, उस शैया
युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख
और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (९)
देवा अमृतेनोदक्रास्तां पुरं प्र णयामि वः.
तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (१०)
सभी देव अमृत के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं, उस शय्या युक्त पुर में
मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच
अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (१०)
प्रजापतिः प्रजाभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः.
तामा विशत तं प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (११)
प्रजापति ने मनुष्य आदि के साथ जिस पुर की रक्षा की है, उस शय्या युक्त पुर में मैं
तुझ राजा को पत्नी और प्रजा सहित प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुझ को सुख और कवच
अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (११)
सूक्त-२० देवता—मंत्र में कहे गए
अप न्यधुः पौरुषेयं वधं यमिन्द्राग्नी धाता सविता बृहस्पतिः.
सोमो राजा वरुणो अश्विना यमः पूषा ऽ स्मान् परि पातु मृत्योः.. (१)
शत्रु पुरुषों द्वारा गुप्त रूप से हमारे विरुद्ध जो मृत्यु साधन किया गया है, उस में इंद्र,
अग्नि, धाता, सविता, बृहस्पति, सोम, वरुण, अश्विनीकुमार, यम और पूषा हमारे कवचधारी
राजा की रक्षा करें. (१)
यानि चकार भुवनस्य यस्पतिः प्रजापतिर्मातरिश्वा प्रजाभ्यः.
प्रदिशो यानि वसते दिशश्च तानि मे वर्माण बहुलानि सन्तु.. (२)
सभी प्राणियों के पालनकर्ता प्रजापति ने मनुष्य, पशु आदि प्रजाओं की रक्षा के लिए
जो कवच बनाए हैं तथा सभी दिशाएं, प्रदिशाएं तथा अवांतर दिशाएं जिन कवचों को रक्षा के
लिए धारण करती हैं, वे कवच मुझ युद्ध करने के इच्छुक के लिए अधिक संख्या में प्राप्त हों.
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(२)
यत् ते तनूष्वनह्यन्त देवा द्युराजयो देहिनः.
इन्द्रो यच्चक्रे वर्म तदस्मान् पातु विश्वतः.. (३)
स्वर्गलोक में विराजमान शरीरधारी देवों ने असुरों से युद्ध करते समय अपने शरीर की
रक्षा के लिए जिन कवचों को धारण किया था, इंद्र ने भी जिस कवच को पहना था, वह
कवच युद्ध करने के लिए उद्यत हमारी सभी ओर से रक्षा करे. (३)
वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मार्हवर्म सूर्यः.
वर्म मे विश्वे देवाः क्रन् मा मा प्रापत् प्रतीचिका.. (४)
द्यावा पृथिवी, अग्नि एवं सूर्य मुझ युद्ध करने के इच्छुक को रक्षा करने वाला कवच प्रदान
करे. हमारे अथवा हमारे राजा के समीप शत्रु सेना गुप्त रूप से न पहुंच सके. (४)
सूक्त-२१ देवता—इंद्र
गायत्र्यु १ ष्णिगुनुष्टुब् बृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब् जगत्यै.. (१)
गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप तथा जगती नाम के छंदों के लिए यह
आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१)
सूक्त-२२ देवता—मंत्र में कहे गए
आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा.. (१)
आंगिरसों अर्थात् अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए आरंभ के पांच अनुवाकों के द्वारा
यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१)
षष्ठाय स्वाहा.. (२)
षष्ठ अर्थात छठे के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२)
सप्तमाष्टमाभ्यां स्वाहा.. (३)
सातवें और आठवें के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (३)
नीलनखेभ्यः स्वाहा.. (४)
नीले नाखून वालों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (४)
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हरितेभ्यः स्वाहा.. (५)
हरित नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (५)
क्षुद्रेभ्यः स्वाहा.. (६)
क्षुद्रों अर्थात् तुच्छ व्यक्तियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (६)
पर्यायिकेभ्यः स्वाहा.. (७)
पर्यायिकों अर्थात् पर्यायिक नाम वाले ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(७)
प्रथमेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (८)
प्रथम शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (८)
द्वितीयेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (९)
द्वितीय शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (९)
तृतीयेभ्यः शङ्खेभ्यः स्वाहा.. (१०)
तीसरे शंख नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१०)
उपोत्तमेभ्यः स्वाहा.. (११)
उपोत्तम अर्थात् उत्तमों के समीपवर्ती ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(११)
उत्तमेभ्यः स्वाहा.. (१२)
उत्तम ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१२)
उत्तरेभ्यः स्वाहा.. (१३)
उत्तरवर्ती अर्थात् बाद में होने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१३)
ऋषिभ्यः स्वाहा.. (१४)
ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१४)
शिखिभ्यः स्वाहा.. (१५)
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शिखि नाम के ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१५)
गणेभ्यः स्वाहा.. (१६)
गणों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१६)
महागणेभ्यः स्वाहा.. (१७)
महागणों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१७)
सर्वेभ्योऽङ्गिरोभ्यो विदगणेभ्यः स्वाहा.. (१८)
सभी विद्वान् अंगिरा गणों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१८)
पृथक्सहस्राभ्यां स्वाहा.. (१९)
पृथक् और सहस्र ऋषियों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१९)
ब्रह्मणे स्वाहा.. (२०)
ब्रह्मा के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२०)
ब्रह्मज्येष्ठा संभृता वीर्याणि ब्रह्माग्रे ज्येष्ठं दिवमा ततान.
भूतानां ब्रह्मा प्रथमोत जज्ञे तेनार्हति ब्रह्मणा स्पर्धितुं कः.. (२१)
ब्रह्मा जिन ऋषियों में ज्येष्ठ अर्थात् बड़े हैं, उन ऋषियों ने जो वीर कर्म किए, वे ही सब
से श्रेष्ठ हैं, इस दृष्टि से सृष्टि के आदि में ज्येष्ठ ब्रह्म ने द्युलोक का विस्तार किया. ब्रह्मा सभी
प्राणियों से पहले उत्पन्न हुए. उन ब्रह्मा से स्पर्धा करने के लिए कौन देव अथवा मनुष्य समर्थ
है. (२१)
सूक्त-२३ देवता—मंत्र में कहे गए
आथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा.. (१)
आथर्वणों की पांच ऋचाओं को अर्थात् इन ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को
यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१)
पञ्चर्चेभ्यः स्वाहा.. (२)
पांच ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२)
षडृचेभ्यः स्वाहा.. (३)
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छह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (३)
सप्तर्चेभ्यः स्वाहा.. (४)
सात ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (४)
अष्टर्चेभ्यः स्वाहा.. (५)
आठ ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (५)
नवर्चेभ्यः स्वाहा.. (६)
नौ ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (६)
दशर्चेभ्यः स्वाहा.. (७)
दस ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (७)
एकादशर्चेभ्यः स्वाहा.. (८)
ग्यारह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (८)
द्वादशर्चेभ्यः स्वाहा.. (९)
बारह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (९)
त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा.. (१०)
तेरह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१०)
चतुर्दशर्चेभ्यः स्वाहा.. (११)
चौदह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (११)
पञ्चदशर्चेभ्यः स्वाहा.. (१२)
पंद्रह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१२)
षोडशर्चेभ्यः स्वाहा.. (१३)
सोलह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(१३)
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सप्तदशर्चेभ्यः स्वाहा.. (१४)
सत्रह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१४)
अष्टादशर्चेभ्यः स्वाहा.. (१५)
अठारह ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(१५)
एकोनविंशतिः स्वाहा.. (१६)
उन्नीस ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(१६)
विंशतिः स्वाहा.. (१७)
बीस ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१७)
महत्काण्डाय स्वाहा.. (१८)
बीस कांड वाले अर्थात् बीस कांडों की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति
भलीभांति प्राप्त हो. (१८)
तृचेभ्यः स्वाहा.. (१९)
तीन ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१९)
एकर्चेभ्यः स्वाहा.. (२०)
एक ऋचा की रचना करने वाले ऋषियों की यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२०)
क्षुद्रेभ्यः स्वाहा.. (२१)
यजुर्वेद के मंत्रों की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
(२१)
एकानृचेभ्यः स्वाहा.. (२२)
आधी ऋचाओं की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२२)
रोहितेभ्यः स्वाहा.. (२३)
रोहित आदि कांडों की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो.
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(२३)
सूर्याभ्यां स्वाहा.. (२४)
सूर्या नाम की दो ऋषि पत्नियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२४)
व्रात्याभ्यां स्वाहा.. (२५)
व्रात्य नाम के दोनों ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२५)
प्राजापत्याभ्यां स्वाहा.. (२६)
प्रजापति के पुत्र दो ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२६)
विषासह्यै स्वाहा.. (२७)
सत्रह कांडों की रचना करने वाले ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२७)
मङ्गलिकेभ्यः स्वाहा.. (२८)
मांगलिक नाम के ऋषियों को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२८)
ब्रह्मणे स्वाहा.. (२९)
ब्रह्मा को यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२९)
ब्रह्मज्येष्ठा संभृता वीर्याणि ब्रह्माग्ने ज्येष्ठं दिवमा ततान.
भूतानां ब्रह्मा प्रथमोत जज्ञे तेनार्हति ब्रह्मणा स्पर्धितुं कः.. (३०)
ब्रह्मा जिन ऋषियों में ज्येष्ठ अर्थात् बड़े हैं. उन ऋषियों ने जो वीर कर्म किए. सब में
यही श्रेष्ठ है, इस दृष्टि से सृष्टि के आदि में ब्रह्मा ने द्युलोक अर्थात स्वर्ग का विस्तार किया.
ब्रह्मा सभी प्राणियों से पहले उत्पन्न हुए. उन ब्रह्मा से कौन देव तथा मनुष्य स्पर्धा कर सकता
है. (३०)
सूक्त-२४ देवता—मंत्र में कहे गए
येन देवं सवितारं परि देवा अधारयन्.
तेनेमं ब्रह्मणस्पते परि राष्ट्राय धत्तन.. (१)
इंद्र आदि देवों ने सब के प्रेरक आदि देव को जिस कारण चारों ओर से घेर लिया था.
उस कारण से हे शत्रु विनाशकर्ता ब्रह्मणस्पति! महा शांति का प्रयोग करने वाले इस यजमान
को राजा बनाओ. (१)
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परीममिन्द्रमायुषे महे क्षत्राय धत्तन.
यथैनं जरसे याज् ज्योक् क्षत्रे ऽ धि जागरत्... (२)
हे परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र! मुझ साधक को आयु और महान बल लाभ करने के लिए
स्थापित करो. चिरकाल तक बाधा नष्ट करने वाला बल प्राप्त होने पर यह शांतिकर्ता यजमान
जागृत रहे. इसे वृद्धावस्था को प्राप्त कराओ. (२)
परीमं सोमायुषे महे श्रोत्राय धत्तन.
यथैनं जरसे याज् ज्योक् श्रोत्रे ऽ धि जागरत्.. (३)
हे सोम! शांतिकर्ता मुझ यजमान को चिरकालीन जीवन के लिए तथा इंद्रियों से साध्य
उपदान आदि कार्यों के लिए सभी ओर से धारण करो. चिरकाल तक सभी इंद्रियां सक्रिय
रहने पर यह शांतिकर्ता यजमान जागृत रहे. इसे वृद्धावस्था को प्राप्त कराओ. (३)
परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः.
बृहस्पतिः प्रायच्छद् वास एतत् सोमाय राज्ञे परिधातवा उ.. (४)
हे देवो! इस ब्रह्मचारी को वस्त्र धारण कराओ. हमारे इस ब्रह्मचारी को तेज से पोषित
करो. वृद्धावस्था ही इसकी मृत्यु करने वाली हो. इसे ऐसी दीर्घ आयु वाला बनाओ. बृहस्पति
ने यह वस्त्र राजा सोम को धारण करने के हेतु दिया था. (४)
जरां सु गच्छ परि धत्स्व वासो भवा गृष्टीनामभिशस्तिपा उ.
शतं च जीव शरदः पुरूची रायश्व पोषमुपसंव्ययस्व.. (५)
हे शांति प्रयोक्ता! तुम वृद्धावस्था को प्राप्त करो. तुम इस वस्त्र को धारण करो. तुम
गायों को हिंसा के भय से बचाने वाले बनो. तुम अनेक प्रकार के पुत्रपौत्रों को प्राप्त करने
वाली सौ शरद् ऋतुओं तक जीवित रहो. तुम धन और पुष्टि धारण करो. (५)
परीदं वासो अधिथाः स्वस्तये ऽ भूर्वापीनामभिशस्तिपा उ.
शतं च जीव शरदः पुरूचीर्वसूनि चारुवि भजासि जीवन्.. (६)
हे शांतिकर्ता यजमान! तुम ने यह वस्त्र क्षेम अर्थात् पात्र की रक्षा के लिए धारण किया
है. इस वस्त्र को धारण कर के तुम गायों को चमड़ा उतारने के भय से रक्षा करने वाले बनो.
तुम अनेक प्रकार के पुत्रपौत्रों को प्राप्त कराने वाली सौ शरद् ऋतुओं तक जीवित रहो. सौ
वर्ष तक जीवित रहने वाले तुम सुंदर वस्त्र से सुशोभित रहो तथा धनों को पुत्र, मित्र आदि में
विभाजित करो. (६)
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७)
हम स्तुतिकर्ता सभी अप्राप्त फलों की प्राप्ति होने पर तथा अन्नादि की प्राप्ति होने पर
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इंद्र देव को अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (७)
हिरण्यवर्णो अजरः सुवीरो जरामृत्युः प्रजया सं विशस्व.
तदग्निराह तदु सोम आह बृहस्पतिः सविता तदिन्द्रः.. (८)
हे यजमान! तू सोने के समान कांति वाला, जरा रहित, कर्म करने में कुशल पुत्रों वाला
तथा वृद्धावस्था से ही मृत्यु प्राप्त करने वाला हो कर अपने घर में निवास करे. अग्नि इस सूक्त
में कहे गए अर्थ से परिचित हैं. यही सोम देव ने कहा है. बृहत् पति, सविता और इंद्र ने भी
यही कहा है. (८)
सूक्त-२५ देवता—वाजी
अश्रान्तस्य त्वा मनसा युनज्मि प्रथमस्य च.
उत्कूलमुद्वहो भवोदुह्य प्रति धावतात्.. (१)
हे अश्व! मैं तुझे शत्रु सेना पर आक्रमण करने में भी न थकने वाला तथा सृष्टि के आदि
में उत्पन्न घोड़े के मन से युक्त करता हूं. शरीर की दृढ़ता, शीघ्र गमन तथा शत्रु सेना को
पराजित करने वाली सामर्थ्य वाले तुम गर्वीले बनो. जिस प्रकार सरिता का प्रवाह तटों को
नष्ट कर के चलता है, उसी प्रकार तुम भी युद्ध के लिए प्रस्तुत हो. इस प्रकार के अश्व से मैं
मन चाहे फल प्राप्त करूं. हे अश्व! तुम जीतने योग्य स्थान की ओर शीघ्र दौड़ो. (१)
सूक्त-२६ देवता—अग्नि
अग्नेः प्रजातं परि यद्धिरण्‍यममृतं दध्रे अधि मर्त्येषु.
य एनद् वेद स इदेनमर्हति जरामृत्युर्भवति यो बिभर्ति.. (१)
अग्नि से उत्पन्न स्वर्ण तथा मरणधर्मा मनुष्यों में अमृत अर्थात् आत्मा के रूप में व्याप्त
सुवर्ण के रूपों को जानने वाला पुरुष ही स्वर्ण को धारण करने का अधिकारी है. इस सुवर्ण
का आभूषण जो धारण करता है, वह वृद्धावस्था में मृत्यु को प्राप्त करता है. (१)
यद्धिरण्यं सूर्येण सुवर्णं प्रजावन्तो मनवः पूर्व ईषिरे.
तत् त्वा चन्द्रं वर्चसा सं सृजत्यायुष्मान् भवति यो बिभर्ति.. (२)
प्रज्ञावान मनु ने सूर्य से उत्पन्न जिस सुवर्ण को प्राप्त किया था, मनुष्यों द्वारा धारण
किया गया वह सुवर्ण प्रसन्नता पहुंचाने वाले तेज से तुम्हें संयुक्त करे. जो पुरुष इस सुवर्ण को
धारण करता है, वह चिरजीवी होता है. (२)
आयुषे त्वा वर्चसे त्वौजसे च बलाय च.
यथा हिरण्यतेजसा विभासासि जनाँ अनु.. (३)
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हे स्वर्ण को धारण करने वाले पुरुष! चंद्रमा उस स्वर्ण को तुम्हारे बल, लाभ एवं तेज
प्राप्त करने के लिए निर्माण करे. जिस प्रकार स्वर्ण तेज से भास्वर होता है, उसी प्रकार तुम
भी मनुष्यों को लक्ष्य कर के सुशोभित बनो. (३)
यद् वेद राजा वरुणो वेद देवो बृहस्पतिः.
इन्द्रो यद् वृत्रहा वेद तत् त आयुष्यं भुवत् तत् ते वर्चस्यं भुवत्.. (४)
जिस स्वर्ण को तेजस्वी वरुण देव जानते हैं तथा बृहस्पति देव जानते हैं, वह स्वर्ण
तुम्हारी आयु बढ़ाने वाला हो तथा तेज प्रदान करने वाला हो. (४)
सूक्त-२७ देवता—विवृत
गोभिष्ट्वा पात्वृषभो वृषा त्वा पातु वाजिभिः.
वायुष्ट्वा ब्रह्मणा पात्विन्द्रस्त्वा पात्विन्द्रियैः.. (१)
हे विवृत नाम की मणि धारण करने वाले पुरुष! सांड गायों के साथ तुम्हारी रक्षा करे
तथा प्रजनन करने में समर्थ अश्व घोड़ों के साथ तुम्हारी रक्षा करे. अंतरिक्ष में विचरण करने
वाले वायु देवता यज्ञलक्षण वाले कर्म के द्वारा तुम्हारी रक्षा करें. इंद्र देवता इंद्रियों के साथ
तुम्हारी रक्षा करें. (१)
सोमस्त्वा पात्वोषधीभिर्नक्षत्रैः पातु सूर्यः.
माद्भ्यस्त्वा चन्द्रो वृत्रहा वातः प्राणेन रक्षतु.. (२)
ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों के राजा सोम ओषधियों की सहायता से तुम्हारी रक्षा
करें. सूर्य देव नक्षत्रों की सहायता से तुम्हारी रक्षा करें. महीनों की सहायता से चंद्रमा, वृत्र
अर्थात् आवरण करने वाले अंधकार का नाश करने वाले इंद्र एवं प्राण वायु की सहायता से
वायु देव तुम्हारी रक्षा करें. (२)
तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवीस्त्रीण्यन्तरिक्षाणि चतुरः समुद्रान्.
त्रिवृतं स्तोमं त्रिवृत आप आहुस्तास्त्वा रक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्भिः.. (३)
तीन द्युलोक, तीन पृथ्वियां, तीन अंतरिक्ष अर्थात् मध्यम लोक, चार सागर, त्रिवृत नाम
के तीन प्रकार के स्तोत्र तथा तीन प्रकार के जल ये—सभी त्रिवृत नाम की मणि के साथ
तुम्हारी रक्षा करें. (३)
त्रीन्नाकांस्त्रीन् समुद्रांस्त्रीन् ब्रध्नांस्त्रीन् वैष्टपान्.
त्रीन् मातरिश्वनस्त्रीन्सूर्यान् गोप्तॄन् कल्पयामि ते.. (४)
हे हिरण्य! रजत और लोहे की तीन प्रकार की मणि धारण करने वाले पुरुष! मैं तीन
आकाशों, तीन समुद्रों, तीन आदित्यों, तीन भुवनों, तीन वायुओं तथा तीन स्वर्गों को तेरा
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रक्षक नियुक्त करता हूं. (४)
घृतेन त्वा समुक्षाम्यग्न आज्येन वर्धयन्.
अग्नेश्चन्द्रस्य सूर्यस्य मा प्राणं मायिनो दभन्.. (५)
हे अग्नि! मैं होम के साधन घृत से तुम्हें बढ़ाता हुआ तुम्हें घी से सींचता हूं. घृत के
कारण वृद्धि प्राप्त अग्नि की, चंद्र की एवं सूर्य की कृपा से हे त्रिवृत मणि धारण करने वाले
पुरुष! तेरे प्राणों का अपहरण राक्षस न करें. (५)
मा वः प्राणं मा वो ऽ पानं मा हरो मायिनो दभन्.
भ्राजन्तो विश्ववेदसो देवा दैव्येन धावत.. (६)
हे पुरुष! तुम्हारे प्राणों की हिंसा मायवी राक्षस न करें. तुम्हारी अपान वायु की हिंसा
मायावी राक्षस न करें. हे अग्नि, चंद्र आदि देवो! प्रकाशित होते हुए सभी ज्ञानी देव संबंधी रथ
आदि साधन से हमारी प्राण रक्षा के लिए दौड़ कर आएं. (६)
प्राणेनाग्निं सं सृजति वातः प्राणेन संहितः.
प्राणेन विश्वतोमुखं सूर्य देवा अजनयन्.. (७)
पुरुष मुख में स्थित प्राण वायु से अग्नि को संयुक्त करता है. इसलिए प्राण की रक्षा
करनी चाहिए. बाहरी वायु मुख में स्थित प्राण वायु से मिलती है. इंद्र आदि देवों ने प्राण वायु
से सर्वत्र प्रकाश करने वाले सूर्य को उत्पन्न किया है. (७)
आयुषायुः कृतां जीवायुष्मान् जीव मा मृथाः.
प्राणेनात्मन्वतां जीव मा मृत्योरुदगा वशम्.. (८)
हे मणिधारक पुरुष! दूसरों की आयु की वृद्धि करने वाले प्राचीन महर्षि तप आदि के
द्वारा चिरकाल तक जीवित रहते थे. उन के द्वारा जीवित आयु से तुम जीवित रहो एवं मृत्यु
को प्राप्त मत करो. स्थिर आत्मा वालों के प्राणों से तुम जीवित रहो तथा मृत्यु के वश में मत
जाओ. (८)
देवानां निहितं निधिं यमिन्द्रो ऽ न्वविन्दत् पथिभिर्देवयानैः.
आपो हिरण्यं जुगुपुस्त्रिवृद्भिस्तास्त्वा रक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्भिः.. (९)
सुरक्षित रूप से स्थापित देवों के जिस हिरण्य नाम के धन को इंद्र ने देवों के गमन पर
चल कर प्राप्त किया था, उस को तीन प्रकार के जलों ने तीन प्रकार के साधनों से सुरक्षित
किया. ये तीन प्रकार के जल, स्वर्ण, रजत और लोहे के तीन रूपों के द्वारा तुम्हारी रक्षा करें.
(९)
त्रयस्त्रिंशद् देवतास्त्रीणि च वीर्याणि प्रियायमाणा जुगुपुरप्स्व१न्तः.
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अस्मिंश्चन्द्रे अधि यद्धिरण्यं तेनायं कृणवद् वीर्याणि.. (१०)
तैंतीस देवाओं ने कायिक, वाचिक तथा मानसिक तीन प्रकार के सामर्थ्य से प्रसन्न होते
हुए जलों में स्वर्ण को सुरक्षित रखा था. इस चंद्रमा में जो स्वर्ण है, उस से यह त्रिवृत नाम की
मणि तैंतीस देवों के तीन बलों के समान मणिधारक पुरुष में धारण करे. (१०)
ये देवा दिव्येकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (११)
जो आदित्य नाम के देव द्युलोक में एकादश हैं, वे इस हवन किए जाते हुए हवि का
सेवन करें. (११)
ये देवा अन्तरिक्ष एकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (१२)
जो आदित्य नाम के देव अंतरिक्ष अर्थात मध्य भाग में एकादश हैं, वे इस हवन किए
जाते हुए हवि का सेवन करें. (१२)
ये देवाः पृथिव्यामेकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (१३)
जो आदित्य नाम के देव पृथ्वी पर एकादश हैं, वे इस हवन किए जाते हुए हवि का
सेवन करें. (१३)
असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नो अभयं कृतम्.
सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः. (१४)
अग्नि और सविता नाम के दो देव पूर्व दिशा को शत्रुओं से रहित बनाएं तथा पश्चिम
दिशा को भय रहित बनाएं. सविता दक्षिण दिशा में तथा शचीपति इंद्र उत्तर दिशा में मेरी रक्षा
करें. (१४)
दिवो मादित्या रक्षन्तु भूम्या रक्षन्त्वग्नयः...
इन्द्राग्नी रक्षतां मा पुरस्तादश्विनावभितः शर्म यच्छताम्.
तिरश्चीनघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म.. (१५)
आदित्य अर्थात् सूर्य मेरी द्युलोक से रक्षा करें. अग्नि मेरी भूमि से रक्षा करें. इंद्र और
अग्नि सामने से मेरी रक्षा करें. अश्विनीकुमार मुझे चारों ओर से सुख प्रदान करें. हिंसा रहित
अग्नि तिरछी दिशाओं में मेरी रक्षा करें. पृथ्वी आदि भूतों की रचना करने वाले अग्नि आदि
देव सभी ओर से मेरे लिए कवच अर्थात् रक्षक बनें. (१५)
सूक्त-२८ देवता—दर्भमणि
इमं बध्नामि ते मणिं दीर्घायुत्वाय तेजसे. दर्भं सपत्नदम्भनं द्विषतस्तपनं
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हृदः.. (१)
हे विजय, बल आदि के इच्छुक पुरुष! मैं तुम्हें दीर्घ आयु और तेज को प्राप्त कराने के
लिए यह दर्भमय मणि तुम्हारे हाथ में बांधता हूं. यह मणि शत्रुओं की हिंसा करने वाली और
शत्रुओं के हृदय को संताप देने वाली है. (१)
द्विषतस्तापयन् हृदः शत्रूणां तापयन् मनः.
दुर्हार्दः सर्वांस्त्वं दर्भ घर्म इवाभीन्संतापयन्.. (२)
हे दर्भमणि! तू द्वेष करने वाले के हृदय को संतप्त करने वाली तथा शत्रुओं के मन को
दुखी करने वाली है. दुष्ट हृदय वालों के घर, खेत, पशु आदि तुम इस प्रकार संतप्त करते हुए
नष्ट कर दो, जिस प्रकार सूर्य सब को सुखा देता है. जो दुष्ट जन भय रहित हैं, उन्हें तुम
संतप्त करो. (२)
घर्म इवाभितपन् दर्भ द्विषतो नितपन् मणे.
हृदः सपत्नानां भिन्द्धीन्द्र इव विरुजं बलम्.. (३)
हे दर्भमणि! गरमी की धूप के समान हम से द्वेष करने वाले शत्रुओं को नष्ट करो. इंद्र
जिस प्रकार अपने शत्रुओं के बल को नष्ट करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे शत्रुओं को समाप्त
करो. (३)
भिन्द्धि दर्भ सपत्नानां हृदयं द्विषतां मणे.
उद्यन् त्वचमिव भूम्याः शिर एषां वि पातय.. (४)
हे दर्भमणि! हमारे शत्रुओं तथा हम से द्वेष करने वालों के हृदय का भेदन करो. तुम
हमारे शत्रुओं का शीश इस प्रकार काट कर गिरा दो, जिस प्रकार धरती पर उपजने वाले तृण,
घास आदि को काट दिया जाता है. (४)
भिन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे भिन्द्धि मे पृतनायतः.
भिन्द्धि मे सर्वान् दुर्हार्दो भिन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (५)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का विनाश करो. तुम
मेरे प्रति दुर्भावना रखने वालों तथा मुझ से द्वेष करने वालों का विनाश करो. (५)
छिन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे छिन्द्धि मे पृतनायतः.
छिन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दश छिन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (६)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को काट दो. मेरे प्रति
दुर्भावना रखने वालों और द्वेष करने वालों को काट दो. (६)
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वृश्च दर्भ सपत्नान् मे वृश्च मे पृतनायतः.
वृश्च मे सर्वान् दुर्हर्दो वृश्च मे द्विषतो मणे.. (७)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का छेदन करो. तुम
मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी को तथा मेरे प्रति द्वेष करने वालों का छेदन करो. (७)
कृन्त दर्भ सपत्नान् मे कृन्त मे पृतनायतः.
कृन्त मे सर्वान् दुर्हर्दा कृन्त मे द्विषतो मणे.. (८)
हे दर्भमणि! तुम मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को काट दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सब को तथा मुझ से द्वेष करने वालों को काट दो. (८)
पिंश दर्भ सपत्नान् मे पिंश मे पृतनायतः.
पिंश मे सर्वान् दुर्हर्दः पिंश मे द्विषतो मणे.. (९)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को पीस दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी को तथा मुझ से द्वेष रखने वालों को पीस डालो. (९)
विध्य दर्भ सपत्नान् मे विध्य मे पृतनायतः.
विध्य मे सर्वान् दुर्हर्दो विध्य मे द्विषतो मणे.. (१०)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को ताड़ित करो.
जो मेरे प्रति दुर्भावना रखते हैं तथा जो मेरे द्वेषी हैं, तुम उन की ताड़ना करो. (१०)
सूक्त-२९ देवता—दर्भमणि
निक्ष दर्भ सपत्नान् मे निक्ष मे पृतनायतः.
निक्ष मे सर्वान् दुर्हर्दो निक्ष मे द्विषतो मणे.. (१)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को चूम ले. जो मेरे प्रति
दुर्भावना रखते हैं तथा जो मेरे द्वेषी हैं, तुम उन्हें चूम लो. (१)
तृन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे तृन्द्धि मे पृतनायतः.
तृन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दस्तृन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (२)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं का तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का नाश करो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी मनुष्यों का तथा मुझ से द्वेष करने वालों का नाश करो. (२)
रुन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे रुन्द्धि मे पृतनायतः.
रुन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दो रुन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (३)
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हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को रोक दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों तथा मुझ से द्वेष करने वालों को रोक दो. (३)
मृण दर्भ सपत्नान् मे मृण मे पृतनायतः.
मृण मे सर्वान् दुर्हार्दो मृण मे द्विषतो मणे.. (४)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं की तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों की हिंसा करो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों की तथा मुझ से द्वेष करने वालों की हिंसा करो. (४)
मन्थ दर्भ सपत्नान् मे मन्थ मे पृतनायतः.
मन्थ मे सर्वान् दुर्हार्दो मन्थ मे द्विषतो मणे.. (५)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र वालों को मथ दो. मेरे प्रति दुर्भावना
रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा मुझ से द्वेष रखने वालों को मथ दो. (५)
पिण्ड्ढि दर्भ सपत्नान् मे पिण्ड्ढि मे पृतनायतः.
पिण्ड्ढि मे सर्वान् दुर्हार्दः पिण्ड्ढि मे द्विषतो मणे.. (६)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं का तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का चूर्ण बना दो.
मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा मुझ से द्वेष रखने वालों का चूर्ण बना
दो. (६)
ओष दर्भ सपत्नान् मे ओष मे पृतनायतः.
ओष मे सर्वान् दुर्हार्द ओष मे द्विषतो मणे.. (७)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को जला दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा मुझ से द्वेष करने वालों को जला दो. (७)
दह दर्भ सपत्नान् मे दह मे पृतनायतः.
दह मे सर्वान् दुर्हार्दो दह मे द्विषतो मणे.. (८)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे प्रति सेना एकत्र करने वालों को जला दो. मेरे प्रति
दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा मुझ से द्वेष रखने वालों को जला दो. (८)
जहि दर्भ सपत्नान् मे जहि मे पृतनायतः.
जहि मे सर्वान् दुर्हार्दो जहि मे द्विषतो मणे.. (९)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को मारो. तुम मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी व्यक्तियों को तथा मुझ से द्वेष करने वालों को मारो. (९)
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सूक्त-३० देवता—दर्भमणि

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सूक्त-३० देवता—दर्भमणि
यत् ते दर्भ जरामृत्युः शतं वर्मसु वर्म ते.
तेनेमं वर्मिणं कृत्वा सपत्नाञ्जहि वीर्यैः.. (१)
हे दर्भ! तेरी गांठों में सैकड़ों वृद्धावस्थाएं और मृत्यु व्याप्त हैं. तेरे पास वृद्धावस्था और
मृत्यु से बचाने वाला कवच है. उस कवच से रक्षा, जय आदि की कामना करने वाले पुरुष को
सुरक्षित कर के अपनी शक्तियों से इस राजा के शत्रुओं को मारो. (१)
शतं ते दर्भ वर्मणि सहस्रं वीर्याणि ते.
तमस्मै विश्वे त्वां देवा जरसे भर्त्वा अदुः.. (२)
हे दर्भमणि! तुम्हारी गांठों में सैकड़ों सुरक्षा कवच और शक्तियां विद्यमान हैं. सभी देवों
से रक्षा की कामना करने वाले इस राजा को वृद्धावस्था दूर करने के लिए तुम्हें दिया है. (२)
त्वामाहुर्देववर्म त्वां दर्भ ब्रह्मणस्पतिम्.
त्वामिन्द्रस्याहुर्वर्म त्वं राष्ट्राणि रक्षसि.. (३)
हे दर्भमणि! तुम्हें देवों का कवच और वेदों का रक्षक कहा गया है. तुम्हें इंद्रक कवच
बताया गया है. तुम राष्ट्रों की रक्षा करते हो. (३)
सपत्नाक्षयणं दर्भ द्विषतस्तपनं हृदः.
मणिं क्षत्रस्य वर्धनं तनूपानं कृणोमि ते.. (४)
हे दर्भमणि! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले तथा द्वेष करने वालों के हृदय को
संतप्त करने वाले हो. हे राजन्! मैं दर्भमणि को तुम्हारा रक्षक एवं शक्ति बढ़ाने वाला बनाता
हूं. (४)
यत् समुद्रो अभ्यक्रन्दत् पर्जन्यो विद्युता सह.
ततो हिरण्ययो बिन्दुस्ततो दर्भो अजायत.. (५)
जिस मेघ से जल बरसता है, उस से बिजली की गड़गड़ाहट के साथ हिरण्यमय बूंद
प्रकट हुई, उन्हीं से दर्भ उत्पन्न हुआ है. (५)
सूक्त-३१ देवता—औदुंबरमणि
औदुम्बरेण मणिना पुष्टिकाम्याय वेधसा.
पशूनां सर्वेषां स्फातिं गोष्ठे मे सविता करत्.. (१)
विधाता ने पशु, पुत्र, धन, शरीर आदि की कामना करने वाले पुरुष के लिए प्राचीन
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काल में उदुंबर अर्थात् गूलर की मणि के द्वारा इन्हें प्रदान करने का प्रयोग किया है. मैं उसी
उदुंबर मणि के द्वारा तेरी रक्षा करता हूं. सविता देव मेरी गोशाला में दो पैरों वाले मनुष्यों और
चार पैरों वाले पशुओं की वृद्धि करें. (१)
यो नो अग्निर्गार्हपत्यः पशूनामधिपा असत्.
औदुम्बरो वृषा मणिः सं मा सृजतु पुष्ट्या.. (२)
जो गार्हपत्य अग्नि है, वह हमारे पशुओं का पालनकर्ता है. मनचाहा फल देने वाली
उदुंबर मणि मेरे शरीर की वृद्धि तथा सभी प्रकार से पशुओं का पोषण करे. (२)
करीषिणीं फलवतीं स्वधामिरां च नो गृहे.
औदुम्बरस्य तेजसा धाता पुष्टिं दधातु मे.. (३)
विधाता देव गूलर की मणि के तेज के द्वारा मेरे शरीर की पुष्टि करें तथा मेरे घर में अन्न
तथा गोबर करने वाली गाएं प्रदान करें. (३)
यद् द्विपाच्च चतुष्पाच्च यान्यन्नानि ये रसाः.
गृहे ३ हं त्वेषां भूमानं बिभ्रदौदुम्बरं मणिम्.. (४)
उदुंबर मणि को धारण करता हुआ मैं दो पैरों वाले पुरुषों, चार पैरों वाले पशुओं, सभी
प्रकार के अन्नों तथा शहद, दूध आदि रसों की अधिकता को स्वीकार करूं. (४)
पुष्टिं पशूनां परि जग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम्.
पयः पशूनां रसमोषधीनां बृहस्पतिः सविता मे नि यच्छात्.. (५)
उदुंबर मणि के तेज से तथा बृहस्पति और सविता देव की कृपा से मैं दो पैरों वाले
मनुष्यों, चार पैरों वाले पशुओं तथा गेहूं, जौ आदि अन्नों की अधिकता स्वीकार करूं. ये देव
मुझे पशुओं का दूध और ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियों का रस प्रदान करें. (५)
अहं पशूनामधिपा असानि मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.
मह्यमौदुम्बरो मणिर्द्रविणानि नि यच्छतु.. (६)
पुष्टि की कामना करने वाला मैं दो पैरों वाले मनुष्यों तथा चार पैरों वाले पशुओं का
स्वामी बनूं. पशु आदि की पुष्टि की स्वामिनी उदुम्बर मणि मुझे स्वर्ण आदि धन प्रदान करे.
(६)
उप मौदुम्बरो मणिः प्रजया च धनेन च.
इन्द्रेण जिन्वितो मणिरा मागन्त्सह वर्चसा.. (७)
उदुंबर मणि मुझ को पुत्र, पौत्र आदि प्रजा और सोना, चांदी रूप धन से संपन्न करे. इंद्र
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के द्वारा प्रेरित उदुंबर मणि विशेष तेज के साथ मेरे समीप आए. (७)
देवो मणिः सपत्नहा धनसा धनसातये.
पशोरन्नस्य भूमानं गवां स्फातिं नि यच्छतु.. (८)
प्रकाश युक्त उदुंबर मणि शत्रुओं का हनन करने वाली, धनों का लाभ कराने वाली हो.
वह मणि मुझे पशुओं तथा अन्न की अधिकता तथा गायों की अधिकता प्रदान करे. (८)
यथाग्रे त्वं वनस्पते पुष्ट्या सह जज्ञिषे.
एवा धनस्य मे स्फातिमा दधातु सरस्वती.. (९)
हे वन का पालन करने वाली उदुंबर मणि! तुम जिस प्रकार ओषधियों और वनस्पतियों
की रचना के समय पुष्टि के साथ उत्पन्न हुई हो, उसी प्रकार तुम्हारे साधन से सरस्वती देवी
मुझे धन की अधिकता प्रदान करें. (९)
आ मे धनं सरस्वती पयस्फातिं च धान्यम्.
सिनीवाल्यु १ पा वहादयं चौदुम्बरो मणिः.. (१०)
सरस्वती देवी मेरे धन की, दूध की तथा अन्न की वृद्धि करें. अमावस्या की देवी
सिनीवाली तथा यह उदुंबर मणि धन आदि प्रदान करें. (१०)
त्वं मणीनामधिपा वृषासि त्वयि पुष्टं पुष्टपतिर्जजान.
त्वयी मे वाजा द्रविणानि सर्वौदुम्बरः स त्वमस्मत् सहस्वारादरातिममतिं
क्षुधं च.. (११)
हे उदुंबर मणि! तुम अन्य रक्षा साधनों की स्वामिनी हो. प्रजापति ने तुम को गाय, घोड़ा
आदि की पुष्टि की क्षमता प्रदान की है. तुम में ये सभी घोड़े और अन्न व्याप्त हैं. तुम इन सब
को पराजित करो. तुम शत्रु तथा दरिद्रता को हम से दूर करो. तुम बुद्धि के अभाव और भूख
को हम से दूर करो. (११)
ग्रामणीरसि ग्रामणीरुत्थायाभिषिक्तो ऽ भि मा सिञ्च वर्चसा.
तेजो ऽ सि तेजो मयि धारयाधि रयिरसि रयिं मे धेहि.. (१२)
हे उदुंबर मणि! तुम गाय की स्वामिनी हो. तुम हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करो.
तुम तेज से अभिषिक्त हो, उठ कर मुझे भी तेज से सिंचित करो. तुम तेज रूप हो, मुझ में भी
तेज धारण करो. तुम धन प्राप्त करने वाली हो, मुझे भी धन प्राप्त कराओ. (१२)
पुष्टिरसि पुष्ट्या मा समङ्ग्धि गृहमेधी गृहपतिं मा कृणु.
औदुम्बरः स त्वमस्मासु धेहि रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ रायस्पोषाय प्रति
मुञ्चे अहं त्वाम्.. (१३)
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हे उदुंबर मणि! तुम पुष्टि हो, मुझे भी पुष्टि से युक्त करो. तुम गृहमेधी हो, मुझे गृहपति
बनाओ. तुम हमें धन प्रदान करो. तुम हमें ऐसा धन प्रदान करो, जिस से हमारे पुत्र, पौत्र,
सेवक आदि पुष्ट हों. हे मणि! मैं तुझे धनों की वृद्धि के लिए बांधता हूं. (१३)
अयमौदुम्बरो मणिवीरो वीराय बध्यते.
स नः सनिं मधुमतीं कृणोतु रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छात्.. (१४)
अमित्रों का विनाश करने वाली यह उदुंबर मणि वीरता को प्राप्त करने के लिए बांधी
जाती है. यह मणि हमारी उपलब्धि को मधुमती करे. यह हमारे सभी वीरों अर्थात् पुत्र, पौत्र
आदि को धन प्रदान करे. (१४)
सूक्त-३२ देवता—दर्भ
शतकाण्डो दुश्च्यवनः सहस्रपर्ण उत्तिरः.
दर्भो य उग्र ओषधिस्तं ते बध्नाम्यायायुषे... (१)
हे मृत्यु के भय से दुःखी पुरुष! मैं सौ गांठों वाली, दुःख में चबाने योग्य, हजार पुत्रों
वाली एवं उत्तम दर्भ उग्र ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी है, उसे मैं दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए
बांधता हूं. (१)
नास्य केशान् प्र वपन्ति नोरसि ताडमा घ्नते.
यस्मा अच्छिन्नपर्णेन दर्भेण शर्म यच्छति.. (२)
उस के केशों को मृत्यु दूत नहीं खींचते हैं तथा राक्षस, पिशाच आदि हृदय में चोट पहुंचा
कर उसी की हिंसा नहीं करते, जिसे प्रयोक्ता बिना कटे हुए पत्तों वाले दर्भ से बनी मणि सुख
पहुंचाती है. (२)
दिवि ते तूलमोधधे पृथिव्यामसि निष्ठितः.
त्वया सहस्रकाण्डेनायुः प्र वर्धयामहे.. (३)
हे सौ गांठों वाली दर्भ नामक ओषधि! तेरा ऊपर वाला भाग द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में है
तथा तू पृथ्वी पर स्थित है. इस प्रकार पृथ्वी से स्वर्ग तक व्याप्त होने वाली तथा हजार गांठों
वाली दर्भ नाम की ओषधि के द्वारा मैं तेरी आयु को बढ़ाता हूं. (३)
तिस्रो दिवो अत्यतृणत् तिस्र इमाः पृथिवीरुत.
त्वयाहं दुर्हार्दो जिह्वां नि तृणद्मि वचांसि.. (४)
हे हजार गांठों वाली ओषधि दर्भ! तू तीन स्वर्गों का अतिक्रमण गई है तथा तूने इन तीन
पृथ्वियों का अतिक्रमण किया है. मैं तेरे द्वारा उस की जीभ को लपेटता हूं जो मेरे प्रति
दुर्भावना रखता है तथा उस के वचनों को बांधता हूं. (४)
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त्वमसि सहमानो ऽ हमस्मि सहस्वान्.
उभौ सहस्वन्तौ भूत्वा सपत्नान्सहिषीवहि.. (५)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! तुम शत्रुओं को वश में करने वाली हो तथा मैं शत्रु की
हिंसा के साधन और बल से युक्त हूं. हम दोनों शत्रु को दबा के स्वभाव वाले हो कर अपने
शत्रुओं को पराजित करें. (५)
सहस्व नो अभिमातिं सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वान् दुर्हर्दः सुहार्दो मे बहून् कृधि.. (६)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! हमारे शत्रुओं अथवा पापों को पराजित करो. जो लोग
हमारे विरुद्ध सेना एकत्र कर रहे हैं, उन को भी पराजित करो. मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले
व्यक्तियों का विनाश करो और मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाओ. (६)
दर्भेण देवजातेन दिवि ष्टम्भेन शश्वदित्.
तेनाहं शश्वतो जनाँ असनं सनवानि च.. (७)
देवों के समीप से उत्पन्न, द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित रहने वाले दर्भ के द्वारा मैं सर्वदा
दीर्घजीवी जनों को प्राप्त करूं. (७)
प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च.
यस्मै च कामयामहे सर्वस्मै च विपश्यते.. (८)
हे दर्भ! मुझ धारणकर्ता को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा श्रेष्ठ जनों का प्रिय बनाओ.
अनुलोम और प्रतिलोम जाति के मध्य जिन लोगों को मैं अपना प्रिय बनाना चाहूं, पाप
अन्वेषण करने वाले उस पुरुष को मेरा प्रिय बनाओ. (८)
यो जायमानः पृथिवीमदृंहद् यो अस्तभ्नादन्तरिक्षं दिवं च.
यं बिभ्रतं ननु पाप्मा विवेद् स नो ऽ यं दर्भो वरुणो दिवा कः.. (९)
जिस दर्भ ने उत्पन्न होते ही पृथ्वी को दृढ़ किया था तथा जिस ने अंतरिक्ष और द्युलोक
अर्थात् स्वर्ग को स्थिर किया, उस दर्भ को जानने वाले को पाप स्पर्श नहीं करता. इस प्रकार
का अंधकार निवारक दर्भ हमें प्रकाश दे. (९)
सपत्नहा शतकाण्डः सहस्वानोषधीनां प्रथमः सं बभूव.
स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतस्तेन साक्षीय पृतनाः पृतन्यतः.. (१०)
शत्रुओं का विनाश करने वाला, सौ गांठों से युक्त एवं शक्तिशाली दर्भ सभी ओषधियों
अर्थात् जड़ीबूटियों से पहले उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार का दर्भ सभी दिशाओं के भयों से
हमारी रक्षा करें. उस दर्भमणि की सहायता से मैं उस सेना को पराजित करूं, जिसे मेरा शत्रु
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