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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 871 of 1063

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Page 871

अस्मिंश्चन्द्रे अधि यद्धिरण्यं तेनायं कृणवद् वीर्याणि.. (१०)
तैंतीस देवाओं ने कायिक, वाचिक तथा मानसिक तीन प्रकार के सामर्थ्य से प्रसन्न होते
हुए जलों में स्वर्ण को सुरक्षित रखा था. इस चंद्रमा में जो स्वर्ण है, उस से यह त्रिवृत नाम की
मणि तैंतीस देवों के तीन बलों के समान मणिधारक पुरुष में धारण करे. (१०)
ये देवा दिव्येकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (११)
जो आदित्य नाम के देव द्युलोक में एकादश हैं, वे इस हवन किए जाते हुए हवि का
सेवन करें. (११)
ये देवा अन्तरिक्ष एकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (१२)
जो आदित्य नाम के देव अंतरिक्ष अर्थात मध्य भाग में एकादश हैं, वे इस हवन किए
जाते हुए हवि का सेवन करें. (१२)
ये देवाः पृथिव्यामेकादश स्थ ते देवासो हविरिदं जुषध्वम्.. (१३)
जो आदित्य नाम के देव पृथ्वी पर एकादश हैं, वे इस हवन किए जाते हुए हवि का
सेवन करें. (१३)
असपत्नं पुरस्तात् पश्चान्नो अभयं कृतम्.
सविता मा दक्षिणत उत्तरान्मा शचीपतिः. (१४)
अग्नि और सविता नाम के दो देव पूर्व दिशा को शत्रुओं से रहित बनाएं तथा पश्चिम
दिशा को भय रहित बनाएं. सविता दक्षिण दिशा में तथा शचीपति इंद्र उत्तर दिशा में मेरी रक्षा
करें. (१४)
दिवो मादित्या रक्षन्तु भूम्या रक्षन्त्वग्नयः...
इन्द्राग्नी रक्षतां मा पुरस्तादश्विनावभितः शर्म यच्छताम्.
तिरश्चीनघ्न्या रक्षतु जातवेदा भूतकृतो मे सर्वतः सन्तु वर्म.. (१५)
आदित्य अर्थात् सूर्य मेरी द्युलोक से रक्षा करें. अग्नि मेरी भूमि से रक्षा करें. इंद्र और
अग्नि सामने से मेरी रक्षा करें. अश्विनीकुमार मुझे चारों ओर से सुख प्रदान करें. हिंसा रहित
अग्नि तिरछी दिशाओं में मेरी रक्षा करें. पृथ्वी आदि भूतों की रचना करने वाले अग्नि आदि
देव सभी ओर से मेरे लिए कवच अर्थात् रक्षक बनें. (१५)
सूक्त-२८ देवता—दर्भमणि
इमं बध्नामि ते मणिं दीर्घायुत्वाय तेजसे. दर्भं सपत्नदम्भनं द्विषतस्तपनं
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