अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवृश्च दर्भ सपत्नान् मे वृश्च मे पृतनायतः.
वृश्च मे सर्वान् दुर्हर्दो वृश्च मे द्विषतो मणे.. (७)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का छेदन करो. तुम
मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी को तथा मेरे प्रति द्वेष करने वालों का छेदन करो. (७)
कृन्त दर्भ सपत्नान् मे कृन्त मे पृतनायतः.
कृन्त मे सर्वान् दुर्हर्दा कृन्त मे द्विषतो मणे.. (८)
हे दर्भमणि! तुम मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को काट दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सब को तथा मुझ से द्वेष करने वालों को काट दो. (८)
पिंश दर्भ सपत्नान् मे पिंश मे पृतनायतः.
पिंश मे सर्वान् दुर्हर्दः पिंश मे द्विषतो मणे.. (९)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को पीस दो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी को तथा मुझ से द्वेष रखने वालों को पीस डालो. (९)
विध्य दर्भ सपत्नान् मे विध्य मे पृतनायतः.
विध्य मे सर्वान् दुर्हर्दो विध्य मे द्विषतो मणे.. (१०)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं को तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को ताड़ित करो.
जो मेरे प्रति दुर्भावना रखते हैं तथा जो मेरे द्वेषी हैं, तुम उन की ताड़ना करो. (१०)
सूक्त-२९ देवता—दर्भमणि
निक्ष दर्भ सपत्नान् मे निक्ष मे पृतनायतः.
निक्ष मे सर्वान् दुर्हर्दो निक्ष मे द्विषतो मणे.. (१)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को चूम ले. जो मेरे प्रति
दुर्भावना रखते हैं तथा जो मेरे द्वेषी हैं, तुम उन्हें चूम लो. (१)
तृन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे तृन्द्धि मे पृतनायतः.
तृन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दस्तृन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (२)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं का तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का नाश करो. मेरे
प्रति दुर्भावना रखने वाले सभी मनुष्यों का तथा मुझ से द्वेष करने वालों का नाश करो. (२)
रुन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे रुन्द्धि मे पृतनायतः.
रुन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दो रुन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (३)
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