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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 870 of 1063

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Page 870

रक्षक नियुक्त करता हूं. (४)
घृतेन त्वा समुक्षाम्यग्न आज्येन वर्धयन्.
अग्नेश्चन्द्रस्य सूर्यस्य मा प्राणं मायिनो दभन्.. (५)
हे अग्नि! मैं होम के साधन घृत से तुम्हें बढ़ाता हुआ तुम्हें घी से सींचता हूं. घृत के
कारण वृद्धि प्राप्त अग्नि की, चंद्र की एवं सूर्य की कृपा से हे त्रिवृत मणि धारण करने वाले
पुरुष! तेरे प्राणों का अपहरण राक्षस न करें. (५)
मा वः प्राणं मा वो ऽ पानं मा हरो मायिनो दभन्.
भ्राजन्तो विश्ववेदसो देवा दैव्येन धावत.. (६)
हे पुरुष! तुम्हारे प्राणों की हिंसा मायवी राक्षस न करें. तुम्हारी अपान वायु की हिंसा
मायावी राक्षस न करें. हे अग्नि, चंद्र आदि देवो! प्रकाशित होते हुए सभी ज्ञानी देव संबंधी रथ
आदि साधन से हमारी प्राण रक्षा के लिए दौड़ कर आएं. (६)
प्राणेनाग्निं सं सृजति वातः प्राणेन संहितः.
प्राणेन विश्वतोमुखं सूर्य देवा अजनयन्.. (७)
पुरुष मुख में स्थित प्राण वायु से अग्नि को संयुक्त करता है. इसलिए प्राण की रक्षा
करनी चाहिए. बाहरी वायु मुख में स्थित प्राण वायु से मिलती है. इंद्र आदि देवों ने प्राण वायु
से सर्वत्र प्रकाश करने वाले सूर्य को उत्पन्न किया है. (७)
आयुषायुः कृतां जीवायुष्मान् जीव मा मृथाः.
प्राणेनात्मन्वतां जीव मा मृत्योरुदगा वशम्.. (८)
हे मणिधारक पुरुष! दूसरों की आयु की वृद्धि करने वाले प्राचीन महर्षि तप आदि के
द्वारा चिरकाल तक जीवित रहते थे. उन के द्वारा जीवित आयु से तुम जीवित रहो एवं मृत्यु
को प्राप्त मत करो. स्थिर आत्मा वालों के प्राणों से तुम जीवित रहो तथा मृत्यु के वश में मत
जाओ. (८)
देवानां निहितं निधिं यमिन्द्रो ऽ न्वविन्दत् पथिभिर्देवयानैः.
आपो हिरण्यं जुगुपुस्त्रिवृद्भिस्तास्त्वा रक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्भिः.. (९)
सुरक्षित रूप से स्थापित देवों के जिस हिरण्य नाम के धन को इंद्र ने देवों के गमन पर
चल कर प्राप्त किया था, उस को तीन प्रकार के जलों ने तीन प्रकार के साधनों से सुरक्षित
किया. ये तीन प्रकार के जल, स्वर्ण, रजत और लोहे के तीन रूपों के द्वारा तुम्हारी रक्षा करें.
(९)
त्रयस्त्रिंशद् देवतास्त्रीणि च वीर्याणि प्रियायमाणा जुगुपुरप्स्व१न्तः.
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