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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 872 of 1063

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Page 872

हृदः.. (१)
हे विजय, बल आदि के इच्छुक पुरुष! मैं तुम्हें दीर्घ आयु और तेज को प्राप्त कराने के
लिए यह दर्भमय मणि तुम्हारे हाथ में बांधता हूं. यह मणि शत्रुओं की हिंसा करने वाली और
शत्रुओं के हृदय को संताप देने वाली है. (१)
द्विषतस्तापयन् हृदः शत्रूणां तापयन् मनः.
दुर्हार्दः सर्वांस्त्वं दर्भ घर्म इवाभीन्संतापयन्.. (२)
हे दर्भमणि! तू द्वेष करने वाले के हृदय को संतप्त करने वाली तथा शत्रुओं के मन को
दुखी करने वाली है. दुष्ट हृदय वालों के घर, खेत, पशु आदि तुम इस प्रकार संतप्त करते हुए
नष्ट कर दो, जिस प्रकार सूर्य सब को सुखा देता है. जो दुष्ट जन भय रहित हैं, उन्हें तुम
संतप्त करो. (२)
घर्म इवाभितपन् दर्भ द्विषतो नितपन् मणे.
हृदः सपत्नानां भिन्द्धीन्द्र इव विरुजं बलम्.. (३)
हे दर्भमणि! गरमी की धूप के समान हम से द्वेष करने वाले शत्रुओं को नष्ट करो. इंद्र
जिस प्रकार अपने शत्रुओं के बल को नष्ट करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे शत्रुओं को समाप्त
करो. (३)
भिन्द्धि दर्भ सपत्नानां हृदयं द्विषतां मणे.
उद्यन् त्वचमिव भूम्याः शिर एषां वि पातय.. (४)
हे दर्भमणि! हमारे शत्रुओं तथा हम से द्वेष करने वालों के हृदय का भेदन करो. तुम
हमारे शत्रुओं का शीश इस प्रकार काट कर गिरा दो, जिस प्रकार धरती पर उपजने वाले तृण,
घास आदि को काट दिया जाता है. (४)
भिन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे भिन्द्धि मे पृतनायतः.
भिन्द्धि मे सर्वान् दुर्हार्दो भिन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (५)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों का विनाश करो. तुम
मेरे प्रति दुर्भावना रखने वालों तथा मुझ से द्वेष करने वालों का विनाश करो. (५)
छिन्द्धि दर्भ सपत्नान् मे छिन्द्धि मे पृतनायतः.
छिन्द्धि मे सर्वान् दुर्हर्दश छिन्द्धि मे द्विषतो मणे.. (६)
हे दर्भमणि! मेरे शत्रुओं तथा मेरे विरुद्ध सेना एकत्र करने वालों को काट दो. मेरे प्रति
दुर्भावना रखने वालों और द्वेष करने वालों को काट दो. (६)
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