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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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सोदक्रामत् सा सप्तऋषीनागच्छत् तां
सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति.. (१३)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह सात ऋषियों के समीप पहुंचा. सात ऋषियों ने
उस का आह्वान करते हुए कहा—"ब्रह्मणस्पति, आओ." (१३)
तस्याः सोमो राजा वत्स आसीच्छन्दः पात्रम्.. (१४)
राजा सोम उस के वत्स थे और छंद उस का पात्र था. (१४)
तां बृहस्पतिराङ्गिरसो ऽ धोक् तां ब्रह्म च तपश्चाधोक्.. (१५)
आंगिरस बृहस्पति ने उस का दोहन किया तथा उस के ब्रह्म और तप का भी दोहन
किया. (१५)
तद् ब्रह्म च तपश्च सप्तऋषय उप जीवन्ति
ब्रह्मवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६)
उस ब्रह्म और तप के उपजीवी सात ऋषि होते हैं. जो इस बात को जानता है, वह
ब्रह्मवर्चस्व वाला होता है और सभी प्राणियों को उपजीवन देता है. (१६)
सूक्त-१० (५) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा उपाह्वयन्तोज॑ एहीति.. (१)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का आह्वान
करते हुए कहा—"हे ऊर्जा, आओ." (१)
तस्या इन्द्रो वत्स आसीच्चमसः पात्रम्.. (२)
उस के वत्स इंद्र हुए और चमस उस का पात्र था. (२)
तां देवः सविता ऽ धोक् तामूर्जामेवाधोक्.. (३)
सविता देव ने उस का दोहन किया और ऊर्जा को दुहा. (३)
तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४)
देवगण उस ऊर्जा के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को
जीने का सहारा देने योग्य बनता है. (४)
सोदक्रामत् सा गन्धर्वाप्सरस आगच्छत्
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तां गन्धर्वाप्सरस उपाह्वयन्त पुण्यगन्ध एहीति.. (५)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह गंधर्वों तथा अप्सराओं के समीप पहुंचा. गंधर्वों
और अप्सराओं ने उस का आह्वान करते हुए कहा—“हे पुण्य गंध, आओ.” (५)
तस्याश्चित्ररथः सौर्यवर्चसो वत्स आसीत् पुष्करपर्णं पात्रम्.. (६)
सूर्यवर्चस का पुत्र उस का वत्स था और पुष्करपर्ण अर्थात् सरोवर का पत्ता उस का
पात्र था. (६)
तां वसुरुचिः सौर्यवर्चसो ऽ धोक् तां पुण्यमेव गन्धमधोक्.. (७)
सूर्यवर्चस के पुत्र वसुरुचि ने उस का दोहन किया और पुण्यगंध को ही दुहा. (७)
तं पुण्यं गन्धं गन्धर्वाप्सरस उप जीवन्ति पुण्यगन्धिरुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (८)
गंधर्व और अप्सराएं उस पुण्यगंध को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात
को जानता है, वह सब को जीवन का आश्रय देने वाला बनता है. (८)
सोदक्रामत् सेतरजनानागच्छत् तामितरजना उपाह्वयन्त तिरोध एहीति..
(९)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह अन्य जनों के समीप गया. अन्य जनों ने उस का
आह्वान करते हुए कहा—“हे तिरोधा, आओ.” (९)
तस्याः कुबेरो वैश्रवणो वत्स आसीदामपात्रं पात्रम्.. (१०)
विश्रवा ऋषि के पुत्र कुबेर उस के वत्स थे और मिट्टी का कच्चा पात्र उस का पात्र था.
(१०)
तां रजतनाभिः काबेरकोऽधोक् तां तिरोधामेवाधोक्.. (११)
रजत नाभि काबेरक ने उस का दोहन किया और उस से तिरोधा को दुहा. (११)
तां तिरोधामितरजना उप जीवन्ति तिरो धत्ते सर्वं पाप्मानमुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (१२)
अन्य जन तिरोधा को जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब
के पापों को तिरोहित करता है और सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१२)
सोदक्रामत् सा सर्पानागच्छत् तां सर्पा उपाह्वयन्त विषवत्येहीति.. (१३)
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उस विराट ने उत्क्रमण किया और वह सर्पों के समीप पहुंचा. सर्पों ने उस का आह्वान
करते हुए कहा—"हे विषवाले आओ.” (१३)
तस्यास्तक्षको वैशालेयो वत्स आसीदलाबुपात्रं पात्रम्.. (१४)
वैशालेय तक्षक उस का वत्स और अलाबु उस का पात्र था. (१४)
तां धृतराष्ट्र ऐरावतो ऽ धोक् तां विषमेवाधोक्.. (१५)
ऐरावत संबंधी सर्प ने उस का दोहन किया और विष का दोहन किया. (१५)
तद् विषं सर्पा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६)
उस विष के सहारे सर्प जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन
का सहारा देने वाला बनता है. (१६)
सूक्त-१० (६) देवता—विराट्
तद् यस्मा एवं विदुषे ऽ लाबुनाभिषिञ्चेत् प्रत्याहन्यात्.. (१)
जो इस को जानने वाले को अलाबु के द्वारा सींचता है, वह उस का हनन कर देता है.
(१)
न च प्रत्याहन्यान्मनसा त्वा प्रत्याहन्मीति प्रत्याहन्यात्.. (२)
वैसे तो इस का हनन नहीं करता, पर जब मन से सोचता है कि उस का हनन करूं तो
हनन कर देता है. (२)
यत् प्रत्याहन्ति विषमेव तत् प्रत्याहन्ति.. (३)
जो विषकारी विनाश करते हैं, वे ही विनाश करवाते हैं. (३)
विषमेवास्याप्रियं भ्रातृव्यमनुविषिच्यते य एवं वेद.. (४)
जो इस बात को जानता है, उस का विष ही प्रिय होता है. वह अपने भाई के पुत्र का ही
सिंचन करता है. (४)
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सूक्त-१ देवता—मधु, अश्विनीकुमार

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नौवां कांड
सूक्त-१ देवता—मधु, अश्विनीकुमार
दिवस्पृथिव्या अन्तरिक्षात् समुद्रादग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे.
तां चायित्वामृतं वसानां हृद्भिः प्रजाः प्रति नन्दन्ति सर्वाः.. (१)
स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष, सागर और अग्नि से मधुकशा गौ उत्पन्न हुई. अमृत को धारण
करने वाली उस मधुकशा गौ का सच्चे मन से पूजन करने वाली समस्त प्रजाएं संतुष्ट होती हैं.
(१)
महत् पयो विश्वरूपमस्याः समुद्रस्य त्वोत रेत आहुः.
यत ऐति मधुकशा रराणा तत् प्राणस्तदमृतं निविष्टम्.. (२)
इस मधुकशा गौ के विश्व रूपी महान दूध को सागर का बल कहा गया है. स्तुतियों से
आकर्षित हो कर यह मधुकशा गौ जिधर जाती है, वहां रहने वालों के प्राणों में अमृत स्थापित
हो जाता है. (२)
पश्यन्त्यस्याश्चरितं पृथिव्यां पृथङ्नरो बहुधा मीमांसमानाः.
अग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे मरुतामुग्रा नप्तिः.. (३)
पृथ्वी पर मनुष्य मधुकशा गौ के चरित्रों की अनेक प्रकार से मीमांसा करते हैं एवं इसे
अनेक रूप वाली देखते हुए इसे मरुद्गण की प्रचंड पुत्री अग्नि और वायु से उत्पन्न हुई बताते
हैं. (३)
मातादित्यानां दुहिता वसूनां प्राणः प्रजानाममृतस्य नाभिः.
हिरण्यवर्णा मधुकशा घृताची महान् भर्गश्चरति मर्त्येषु.. (४)
यह मधुकशा गौ आदित्यों की माता, वसुओं की पुत्री, प्रजाओं का प्राण और अमृत की
नाभि हैं. सोने के रंग वाली मधुकशा घृत प्रदान करने वाली है. मनुष्यों में इस का महान तेज
विचरण करता है. (४)
मधोः कशामजनयन्त देवास्तस्या गर्भो अभवद् विश्वरूपः.
तं जातं तरुणं पिपर्ति माता स जातो विश्वा भुवना वि चष्टे.. (५)
देवों ने मधुकशा को जन्म दिया. उस का गर्भ विश्वरूप हुआ. तरुण रूप में उत्पन्न हुए
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विश्वरूप का उस की माता मधुकशा ने भरणपोषण किया. विश्वरूप ने उत्पन्न होते ही सारे
संसार को मोहित कर दिया. (५)
कस्तं प्र वेद क उ तं चिकेत यो अस्या हृदः कलशः सोमधानो अक्षितः.
ब्रह्मा सुमेधाः सो अस्मिन् मदेत.. (६)
उस विश्वरूप को कौन भलीभांति जानता है? उस का हृदय सोम को धारण करने के
लिए कलश रूप में अक्ष अर्थात् विनाश रहित रहता है, इस का साक्षात्कार किस को है?
शोभन बुद्धि वाले ब्रह्मा इस में आनंदित होते हैं. (६)
स तौ प्र वेद स उ तौ चिकेत यावस्याः स्तनौ सहस्रधारावक्षितौ.
ऊर्जं दुहाते अनपस्फुरन्तौ.. (७)
उस के थन कभी दूध से शून्य न होने वाले एवं दूध की हजार धाराएं बहाने वाले हैं. ये
थन सदैव दूध प्रदान करते रहते हैं. इन थनों को वही ब्रह्मा जानते हैं. (७)
हिङ्करिक्रती बृहती वयोधा उच्चैर्घोषा ऽ भ्येति या व्रतम्.
त्रीन् घर्मानभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (८)
शब्द करने वाली एवं दूध के रूप में हवि धारण करने वाली मधुकशा गौ रंभाती हुई
कर्म क्षेत्र में आती है. वह गौ देवों का आश्रय प्राप्त करने वालों के शब्द को अपने दूध से
सशक्त बनाती है. (८)
यामापीनामुपसीदन्त्यापः शाक्वरा वृषभा ये स्वराजः.
ते वर्षन्ति ते वर्षयन्ति तद्विदे काममूर्जमापः.. (९)
मनोकामना की वर्षा करने वाले उज्ज्वल जल आते हैं, वे जल मधुकशा को जानने के
लिए शक्ति देने वाले अन्न देते हैं एवं अभिलाषा पूर्ण करते हैं. (९)
स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यामधि.
अग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे मरुतामुग्रा नप्तिः.. (१०)
हे वर्षा करने वाले प्रजापति-पति! तुम्हारी वाणी बिजली के समान भड़कने वाली है.
तुम सारी पृथ्वी पर जल को सींचते हो. मरुतों की उग्र पुत्री मधुकशा का जन्म अग्नि और
वायु से हुआ है. (१०)
यथा सोमः प्रातःसवने अश्विनोर्भवति प्रियः.
एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (११)
जिस प्रकार अश्विनीकुमारों को प्रातः सवन में सोमरस प्रिय लगता है, अश्विनीकुमार
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उस प्रकार मुझ में तेज की स्थापना करें. (११)
यथा सोमो द्वितीये सवन इन्द्राग्न्योर्भवति प्रिय:.
एवा म इन्द्राग्नी वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१२)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में इंद्र और अग्नि को प्रिय होता है, उसी प्रकार इंद्र
और अग्नि मुझ में तेज की स्थापना करें. (१२)
यथा सोमस्तृतीये सवन ऋभूणां भवति प्रिय:.
एवा म ऋभवो वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१३)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में शत्रुओं को प्रिय होता है, उसी प्रकार ऋभुगण मुझ
में तेज धारण करें. (१३)
मधु जनिषीय मधु वंसिषीय. पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा..
(१४)
हे अग्नि! मैं दुग्ध आदि हवि से युक्त हो कर आया हूं. मैं मधु को प्रकट कर के उस के
द्वारा तेजस्वी बनूं. मुझ में अपने वचन से तेज स्थापित करो. (१४)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभि:.. (१५)
हे अग्नि! तुम मुझे अपने तेज, संतान एवं आयु से युक्त करो. देवगण और ऋषियों के
साथ इंद्र मुझे तुम्हारी सेवा करने वाला जानें. (१५)
यथा मधु मधुकृत: संभरन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१६)
जैसे मधु एकत्र करने वाले मुझ पर मधु गिराते हैं, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ में तेज
को स्थापित करें. (१६)
यक्षा मक्षा इदं मधु न्यज्जन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्चस्तेजो बलमोजश्च ध्रियताम्.. (१७)
जिस प्रकार मधुमक्खियां मधु के ऊपर मधु रखती है, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ
को वर्चस्वी, तेजस्वी, बली और ओज युक्त बनाएं. (१७)
यद् गिरिषु पर्वतेषु गोष्वश्वेषु यन्मधु.
सुरायां सिच्यमानायां यत् तत्र मधु तन्मयि.. (१८)
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पर्वतों में, पहाड़ी प्रदेशों में, गायों में तथा अश्वों में जो मधु है, जो मधु नीचे की ओर
बहने वाले जलों में है, वह मधु मुझ में स्थित हो. (१८)
अश्विना सारघेण मा मधुना ऽ ङ्क्तं शुभस्पती.
यथा वर्चस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (१९)
हे शोभा के लिए स्वर्ण के आभूषण धारण करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मुझे
मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से युक्त करो, जिस से मैं मनुष्यों के प्रति ओजपूर्ण
वाणी का उच्चारण कर सकूं. (१९)
स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यां दिवि.
तां पशव उप जीवन्ति सर्वे तेनो सेषमूर्जं पिपर्ति.. (२०)
हे प्रजापति! मेघों का गर्जन ही तुम्हारी वाणी है. हे वर्षा करने वाले प्रजापति! तुम
पृथ्वी और स्वर्ग को जल से सींचते हो. पशु उसी जल से जीवित रहते है तथा वही वर्षा अन्न
और जल का पोषण करती है. (२०)
पृथिवी दण्डो ३ न्तरिक्षं गर्भो द्यौः कशा विद्युत् प्रकशो हिरण्ययो बिन्दुः..
(२१)
पृथ्वी दंड है, अंतरिक्ष गर्भ है, द्यौ ब्रह्म है, विद्युत प्रकाश है और बिंदु हिरण्मय है.
(२१)
यो वै कशायाः सप्त मधूनि वेद मधुमान् भवति.
ब्राह्मणश्च राजा च धेनुश्चानड्वांश्च व्रीहिश्च यवश्च मधु सप्तमम्.. (२२)
निश्चय ही जो ब्रह्म के सात मधुओं को जानता है, वह मधु वाला बन जाता है तथा
ब्राह्मण, राजा, गौ, बैल, धान, जौ के अतिरिक्त दसवां मधु ब्रह्म है. (२२)
मधुमान् भवति मधुमदस्याहार्यं भवति.
मधुमतो लोकाञ्जयति य एवं वेद.. (२३)
जो इस बात को जानता है, वह मधु वाला होता है, मधु पूर्णलोकों पर विजय प्राप्त
करता है तथा मधुमय भोजन का भोग करता है. (२३)
यद् वीध्रे स्तनयति प्रजापतिरेव तत् प्रजाभ्यः प्रादुर्भवति.
तस्मात् प्राचीनोपवीतस्तिष्ठेत् प्रजापते ऽ नु मा बुध्यस्वेति.
अन्वेनं प्रजा अनु प्रजापतिर्बुध्यते य एवं वेद.. (२४)
आकाश में जो मेघ गर्जन होता है, वह प्रजापति है, वह प्रजाओं के लिए ही प्रकट होता
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सूक्त-२ देवता—काम

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है. इसीलिए यज्ञोपवीत धारण करने वाला इस बात के लिए तत्पर हो जाए कि प्रजापति मुझे
जाने. जो इस बात को जानता है, वही प्रजापति के पश्चात जन्म लेने वाला समझा जाता है.
(२४)
सूक्त-२ देवता—काम
सपत्नहनमृषभं घृतेन कामं शिक्षामि हविषाज्येन.
नीचैः सपत्नान् मम पादय त्वमभिष्टुतो महता वीर्येण.. (१)
मैं शत्रु विनाशक वृषभ रूपी काम को हवि एवं आज्य से प्रसन्न करता हूं. हे वृषभ!
तुम्हारी स्तुति करने वाले मुझ स्तोता के शत्रुओं को तुम अपने महान पराक्रम से नीचे गिराओ.
(१)
यन्मे मनसो न प्रियं न चक्षुषो यन्मे बभस्ति नाभिनन्दति.
तद् दुष्ष्वप्न्यं प्रति मुञ्चामि सपत्ने कामं स्तुत्वोदहं भिदेयम्.. (२)
जो बुरा स्वप्न न मुझ को अच्छा लगता है और न मेरे नेत्रों को सुहाता है, जो मुझे भक्षण
करता हुआ मालूम होता है और मुझे प्रसन्न नहीं करता, उस बुरे स्वप्न को काम की स्तुति
करने वाला मैं शत्रु की ओर छोड़ता हूं. वह बुरा स्वप्न रूपी शत्रु का भेदन करे. (२)
दुष्ष्वप्न्यं काम दुरितं च कामाप्रजस्तामस्वगतामवर्तिम्.
उग्र ईशानः प्रति मुञ्च तस्मिन् यो अस्मभ्यमंहूरणा चिकित्सात्.. (३)
हे उग्र एवं स्वामी कामदेव! तुम अपने स्वप्न रूपी पाप को प्रजा अर्थात् संतान की
हीनता को एवं निर्धनता को उसी और भेजो जो पराजय कर के हमें विपत्ति में डालने की
चेष्टा करता है. (३)
नुदस्व काम प्र णुदस्व कामावर्तिं यन्तु मम ये सपत्नाः.
तेषां नुत्तानामधमा तमांस्यग्ने वास्तूनि निर्दह त्वम्.. (४)
हे कामदेव! दरिद्रता को उन की और जाने के लिए प्रेरित करो जो मेरे शत्रु हैं. वे ही मेरी
दरिद्रता को प्राप्त करें. हे अग्नि! वे अंधकार में पड़े रहें. तुम उन के घर की वस्तुओं को भस्म
कर दो. (४)
सा ते काम दुहिता धेनुरुच्यते यामाहुर्वाचं कवयो विराजम्.
तया सपत्नान् परि वृङ्ग्धि ये मम पर्येनान् प्राणः पशवो जीवनं वृणक्तु..
(५)
हे कामदेव! सभी जिसे ओजपूर्ण वाणी कहते हैं, वह तुम्हारी पुत्री है. तुम उस के द्वारा
मेरे शत्रुओं का नाश करो. प्राण, पशु और जीवन उन के पास न रहें. (५)
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कामस्येन्द्रस्य वरुणस्य राज्ञो विष्णोर्बलेन सवितुः सवेन.
अग्नेर्होत्रेण प्र णुदे सपत्नाञ्छम्बीव नावमुदकेषु धीरः.. (६)
जिस प्रकार पतवार धारण करने वाला मल्लाह नौका चलाता है, उसी प्रकार मैं कामदेव
के, इंद्र के, राजा वरुण के, विष्णु के और सविता के बल से तथा देवों के यज्ञ से शत्रुओं को
दूर भगाता हूं. (६)
अध्यक्षो वाजी मम काम उग्रः कृणोतु मह्यमसपत्नमेव.
विश्वे देवा मम नाथं भवन्तु सर्वे देवा हवमा यन्तु म इमम्.. (७)
सभी देव मेरे इस यज्ञ में आएं एवं मेरे स्वामी, शक्तिशाली कामदेव मेरी आंखों के सामने
ही इसे पूर्ण करें तथा मुझे शत्रु रहित बनाएं. (७)
इदमाज्यं घृतवज्जुषाणाः कामज्येष्ठा इह मादयध्वम्.
कृण्वन्तो मह्यमसपत्नमेव.. (८)
हे कामदेव को अपने से बड़ा मानने वाले देवो! मेरे घृत वाले आज्य का सेवन करते हुए
तुम सुखी रहो. (८)
इन्द्राग्नी काम सरथं हि भूत्वा नीचैः सपत्नान् मम पादयाथः.
तेषां पन्नानामधमा तमांस्यग्ने वास्तून्यनुनिर्दह त्वम्.. (९)
हे कामदेव! इंद्र और अग्नि रथ पर सवार हो कर मेरे शत्रुओं को नीचे गिराते हैं. हे
अग्नि! उन गिरे हुए शत्रुओं को अंधकार प्रकट कर के नष्ट करो एवं उन के घर की सभी
वस्तुओं को जला डालो. (९)
जहि त्वं काम मम ये सपत्ना अन्धा तमांस्यव पादयैनान्.
निरिन्द्रिया अरसाः सन्तु सर्वे मा ते जीविषुः कतमच्चनाहः.. (१०)
हे कामदेव! तुम मेरे शत्रुओं का संहार करो तथा उन्हें घने अंधकार में गिराओ. वे सब
इंद्रिय रहित एवं शक्तिहीन हो जाएं तथा वे कुछ ही दिन जीवित रहें. (१०)
अवधीत् कामो मम ये सपत्ना उरुं लोकमकरन्मह्यमेधतुम्.
मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रो मह्यं षडुर्वीर्घृतमा वहन्तु.. (११)
कामदेव ने मेरे शत्रुओं का विनाश कर डाला तथा मेरी वृद्धि के लिए उस ने महान लोक
का निर्माण किया. चारों दिशाओं के प्राणी मुझे नमस्कार करें तथा छः पृथ्वियां मेरे लिए घृत
प्रदान करें. (११)
ते ऽ धराञ्चः प्र प्लवन्तां छिन्ना नौरिव बन्धनात्.
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न सायकप्रणुत्तानां पुनरस्ति निवर्तनम्.. (१२)
बंधन टूटने पर नौका जिस प्रकार नीचे की ओर बहती है, मेरे शत्रु उसी प्रकार नीचे
गिरते चले जाएं, क्योंकि जो लोग बाण से घायल हो कर भागते है, वे वापस नहीं आते. (१२)
अग्निर्यव इन्द्रो यवः सोमो यवः. यवयावानो देवा यावयन्त्वेनम्.. (१३)
अग्नि, इंद्र और सोमदेव—ये सभी देव मेरे शत्रुओं को दूर भगाएं. (१३)
असर्ववीरश्चरतु प्रणुत्तो द्वेष्यो मित्राणां परिवर्ग्य १:स्वानाम्.
उ त पृथिव्यामव स्यन्ति विद्युत उग्रो वो देवः प्र मृणत् सपत्नान्.. (१४)
इस मंत्र की शक्ति से प्रेरणा पा कर मेरा शत्रु पुत्रों, पौत्रों एवं समस्त वीरों से रहित हो
कर घूमे. उस के मित्र भी उस का त्याग कर दें. विद्युत पृथ्वी पर उस के टुकड़े कर दे. हे
यजमान! देवगण तुम्हारे शत्रुओं का मर्दन करें. (१४)
च्युता चेयं बृहत्यच्युता च विद्युद् बिभर्ति स्तनयित्नूंश्च सर्वान्.
उद्यन्नादित्यो द्रविणेन तेजसा नीचैः सपत्नान् नुदतां मे सहस्वान्.. (१५)
जो बिजली अपने गर्जन से सभी मेघों को पूर्ण कर देती है, वह नीचे गिर कर अथवा
अपने स्थान पर रह कर तथा उदय होते हुए सूर्य अपने शक्तिशाली तेज के द्वारा मेरे शत्रुओं
को नीचे गिराएं. (१५)
यत् ते काम शर्म त्रिवरूथमुद्धं ब्रह्म वर्म विततमनतिव्याध्यं कृतम्.
तेन सपत्नान् परि वृङ्ग्धि ये मम पर्येनान् प्राणः पशवो जीवनं वृणक्तु..
(१६)
हे कामदेव! तुम्हारा जो कल्याणकारी बल तीनों लोकों को पराजित करने वाला है, उस
के एवं ब्रह्म रूपी विस्तृत कवच के द्वारा तुम मेरे शत्रुओं का विनाश करो. उन का जीवन एवं
पशु प्राणहीन हो जाएं. (१६)
येना देवा असुरान् प्राणुदन्त येनेन्द्रो दस्यूनधमं तमो निनाय.
तेन त्वं काम मम ये सपत्नास्तानस्माल्लोकात् प्र णुदस्व दूरम्.. (१७)
हे कामदेव! जिस शक्ति के द्वारा इंद्र ने दैत्यों को मृत्यु रूपी भयानक अंधकार में धकेल
दिया था और देवों ने जिस शक्ति के द्वारा असुरों को भगा दिया था, तुम उसी शक्ति के द्वारा
मेरे शत्रुओं को इस लोक से दूर भगा दो. (१७)
यथा देवा असुरान् प्राणुदन्त यथेन्द्रो दस्यूनधमं तमो बबाधे.
तथा त्वं काम मम ये सपत्नास्तानस्माल्लोकात् प्र णुदस्व दूरम्.. (१८)
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हे कामदेव! देवों ने जिस प्रकार असुरों को भगाया था तथा इंद्र ने दैत्यों को घोर
अंधकार में धकेल कर संताप दिया था, उसी प्रकार तुम मेरे शत्रुओं को इस लोक से दूर भगा
दो. (१८)
कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपुः पितरो न मर्त्याः.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (१९)
कामदेव सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ. देव, पितर और मनुष्य कोई भी उस की समानता नहीं
कर सकता. इस कारण तुम सभी से ज्येष्ठ और समस्त विश्व में महान हो. मैं तुम्हारे लिए
नमस्कार करता हूं. (१९)
यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावदापः सिष्यदुर्यावदग्निः.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (२०)
हे कामदेव! द्यावा, पृथ्‍वी का जितना विस्तार है, जल और अग्नि जितने विस्तृत हैं, तुम
उन से कहीं अधिक विस्तृत हो, इसीलिए तुम सभी से ज्येष्ठ हो और समस्त विश्व में व्याप्त
हो. मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं. (२०)
यावतीर्दिशः प्रदिशो विषूचीर्यावतीराशा अभिचक्षणा दिवः.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (२१)
हे कामदेव! दिशाएं और प्रदिशाएं जितनी विस्तृत हैं और स्वर्ग की जितनी दिशाएं
बताई गई हैं, तुम उन सभी से ज्येष्ठ हो और समस्त विश्व में व्याप्त हो. मैं तुम को नमस्कार
करता हूं. (२१)
यावतीर्भृङ्गा जत्वः कुरूरवो यावतीर्वघा वृक्षसर्प्यो बभूवुः.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (२२)
हे कामदेव! भृंग, जतु, कर, वृक्ष एवं सर्प जितने विशाल हैं, तुम उन सभी से महान हो.
तुम सभी में व्यस्त हो. मैं तुम को नमस्कार करता हूं. (२२)
ज्यायान् निमिषतो ऽ सि तिष्ठतो ज्यायान्तसमुद्रादसि काम मन्यो.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (२३)
हे कामदेव! हे मन्यु! पलक झपकाने वाले एवं स्थित रहने वाले प्राणियों तथा समुद्र से
भी तुम महान हो. तुम सारे विश्व में व्याप्त हो. मैं तुम को नमस्कार करता हूं. (२३)
न वै वातश्चन काममाप्नोति नाग्निः सूर्यो नोत चन्द्रमाः.
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि.. (२४)
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अग्नि, सूर्य, चंद्रमा और वायु कामदेव की समानता नहीं कर पाते. इस कारण हे
कामदेव! तुम सब से ज्येष्ठ एवं समस्त विश्व में व्याप्त हो. मैं तुम को नमस्कार करता हूं. (२४)
यास्ते शिवास्तन्वः काम भद्रा याभिः सत्यं भवति यद् वृणीषे.
ताभिष्टवमस्माँ अभिसंविशस्वान्यत्र पापीरप वेशया धियः.. (२५)
हे कामदेव! तुम्हारे जो कल्याणकारी एवं भद्र शरीर हैं, उन के द्वारा तुम जिन का वरण
करते हो, वही सत्य है. उन्हीं के द्वारा तुम हमारे शरीरों में प्रवेश करो. तुम अपनी पापबुद्धियों
को हम से दूर रखो तथा उन्हें शत्रुओं में प्रविष्ट करो. (२५)
सूक्त-३ देवता—शाला
उपमितां प्रतिमितामथो परिमितामुत.
शालाया विश्ववाराया नद्धानि वि चृतामसि.. (१)
उपमिता, प्रतिमिता और परिमिता जो शालाएं हैं, उन में से किसी भी शाला को खोलते
हुए हम सब के लिए वरण करने योग्य शाला के द्वार खोलते हैं. (१)
यत् ते नद्धं विश्ववारे पाशोग्रन्थिश्च यः कृतः.
बृहस्पतिरिवाहं बलं वाचा वि संस्यामि तत्.. (२)
हे वरण करने योग्य शाला! तुझ में जो बंधन है, जो पाश है और जो गांठें हैं, उन्हें
बृहस्पति के समान शक्तिशाली मैं अपने मंत्र बल से खोलता हूं. (२)
आ ययाम सं बबर्ह ग्रन्थींश्चकार ते दृढान्.
परूंषि विद्वाञ्छस्तेवेन्द्रेण वि चृतामसि.. (३)
हे शाला! बनाने वाले ने तुम्हें बहुत लंबा बनाया है. उस ने तुझ में मजबूत गांठें लगाई हैं.
उन कठोर गांठों को जानता हुआ मैं इंद्र की शक्ति से उन्हें खोलता हूं. (३)
वंशानां ते नहनानां प्राणाहस्य तृणस्य च.
पक्षाणां विश्ववारे ते नद्धानि वि चृतामसि.. (४)
हे सब के द्वारा वरण करने योग्य शाला! तेरे बांसों के बंधनों की, लकड़ियों की, तिनकों
की तथा वृक्षों की जो गांठें हैं, मैं उन्हें खोलता हूं. (४)
संदंशानां पलदानां परिष्वज्जल्यस्य च.
इदं मानस्य पत्न्या नद्धानि वि चृतामसि.. (५)
मैं मान की पत्नी अर्थात् शाला के द्वारा बांधे गए संदेशों के, पलदों के, परिष्वंद के तथा
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तृणों के बंधनों को खोलता हूं. (५)
यानि ते ऽ न्तः शिक्यान्याबेधू रण्याय कम्.
प्र ते तानि चृतामसि शिवा मानस्य पत्नी न उद्घिता तन्वे भव.. (६)
हे कल्याण करने वाली मान की पत्नी! तुझ में भीतर जो छींके बांधे गए हैं तथा मचान
बनाए गए हैं, हम उन्हें खोलते हैं. तुम हमें स्वर्गलोक में सुख दो तथा हम पर क्रोधित न होओ.
(६)
हविर्धानमग्निशालं पत्नीनां सदनं सदः. सदो देवानामसि देवि शाले.. (७)
हे शाला! तुम में हव्य प्राप्त अग्नि, कुंड, देवों के बैठने योग्य आसन तथा पत्नियों सहित
यजमानों के बैठने योग्य स्थान है. (७)
अक्षुमोपशं विततं सहस्राक्षं विषूवति.
अवनद्धमभिहितं ब्रह्मणा वि चृतामसि.. (८)
हे दिव्यता संपन्न शाला! शयन कक्ष में विस्तृत झरोखा है. इस प्रकार के शयन कक्ष को
मैं मंत्रों की शक्ति से खोलता हूं. (८)
यस्त्वा शाले प्रतिगृह्णाति येन चासि मिता त्वम्.
उभौ मानस्य पत्नि तौ जीवतां जरदष्टी.. (९)
हे शाला! जो तुझे ग्रहण करता है तथा जिस ने नाप कर तेरा निर्माण किया है. हे मान
की पत्नी! ये दोनों शरीर के शिथिल हो जाने तक जीवित रहें. (९)
अमुत्रैनमा गच्छताद् दृढा नद्धा परिष्कृता.
यस्यास्ते विचृतामस्यङ्गमङ्गं परुष्परुः. (१०)
हे शाला! हम तेरे दृढ़तापूर्वक बंधे हुए अंगों को अलग कर रहे हैं. जिस ने तेरा निर्माण
किया है, उसे तू स्वर्ग प्रदान कर. (१०)
यस्त्वा शाले निमिमाय संजभार वनस्पतीन्.
प्रजायै चक्रे त्वा शाले परमेष्ठी प्रजापतिः. (११)
हे शाला, जिस ने तेरा निर्माण किया है और तेरा निर्माण करने के लिए जो वृक्षों की
लकड़ी लाया है, प्रजापति ने प्रजा के निमित्त तेरा निर्माण किया है. (११)
नमस्तस्मै नमो दात्रे शालापतये च कृण्मः.
नमो ऽ ग्नये प्रचरते पुरुषाय च ते नमः.. (१२)
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हे कृषण! शलाका दान करने वाले को, शाला के स्वामी को, अग्नि के लिए, घूमनेफिरने
वाले पुरुष के लिए तथा तुझे भी नमस्कार है. (१२)
गोभ्यो अश्वेभ्यो नमो यच्छालायां विजायते.
विजावति प्रजावति वि ते पाशांश्चृतामसि.. (१३)
शाला में जन्म लेने वाली गायों और घोड़ों को नमस्कार है. हे विजावती और प्रजावती!
हम तेरे बंधनों को खोलते हैं. (१३)
अग्निमन्तश्छादयसि पुरुषान् पशुभिः सह.
विजावति प्रजावति वि ते पाशांश्चृतामसि.. (१४)
हे विजावती और प्रजावती! तुम अग्नि को, पुरुषों को और पशुओं को अपने में छिपा
लेती हो. हम तुम्हारे फंदों को खोलते हैं. (१४)
अन्तरा द्यां च पृथिवीं च यद् व्यचस्तेन शालां प्रति गृह्णामि त इमम्.
यदन्तरिक्षं रजसो विमानं तत् कृण्वे ऽ हमुदरं शेवधिभ्यः
तेन शालां प्रति गृह्णामि तस्मै.. (१५)
द्यौ और पृथ्वी के मध्य जो विस्तृत आकाश हैं, उस के द्वारा हम तेरी इस शाला को
ग्रहण करते हैं. अंतरिक्ष और पृथ्वी की जो रचना शक्ति है, वह तेरे उदर में स्थित है. (१५)
ऊर्जस्वती पयस्वती पृथिव्यां निर्मिता मिता.
विश्वान्नं बिभ्रती शाले मा हिंसीः प्रतिगृह्णतः.. (१६)
हे शाला! तू शक्तिशालिनी एवं दुग्ध से पूर्ण है. तुझे पृथ्वी पर नापतोल कर बनाया गया
है. तू सभी प्रकार का अन्न धारण करती है. जो तुझे ग्रहण करते हैं, तू उन का विनाश मत
कर. (१६)
तृणैरावृता पलदान् वसाना रात्रीव शाला जगत् निवेशनी.
मिता पृथिव्यां तिष्ठसि हस्तिनीव पद्धती.. (१७)
घासफूंस से ढकी हुई अर्थात् चटाइयों को धारण करती हुई शाला जगत् के प्राणियों को
रात्रि के समान विश्राम देने वाली है. हे शाला! तू हथिनी के पैरों के चिह्नों के समान पृथ्वी पर
स्थित है. (१७)
इटस्य ते वि चृताम्यपिनद्धमपोर्णुवन्.
वरुणेन समुब्जितां मित्रः प्रातर्व्युब्जतु.. (१८)
हे शाला! मैं व्यतीत हुए संवत्सर के समान तेरे बंधनों को खोल कर अलग करता हूं.
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तुझे वरुण ने खोला है, आदित्य तेरा उद्घाटन करते हैं. (१८)
ब्रह्मणा शालां निर्मितां कविभिर्निमितां मिताम्.
इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः.. (१९)
ब्रह्म ने इस शाला का निर्माण किया है और विद्वानों ने इस निर्माण की नापतोल में
सहायता की है. सोमरस पीने के स्थान पर बैठे हुए इंद्र और अग्नि देव इस शाला की रक्षा
करें. (१९)
कुलाये ऽ धि कुलायं कोशे कोशः समुब्जितः.
तत्र मर्तो वि जायते यस्माद् विश्वं प्रजायते.. (२०)
इस शाला रूपी घोंसले के भीतर शरीर रूपी घोंसला है. कोश में कोश सुसज्जित हैं.
तात्पर्य यह है कि यह शाला कोश के समान है और इस में रहने वाला शरीर भी कोश के
समान है. मरणधर्मा मनुष्य इसी में जन्म लेता है. सारे संसार की उत्पत्ति इसी प्रकार होती है.
(२०)
या द्विपक्षा चतुष्पक्षा षट्पक्षा या निमीयते.
अष्टापक्षां दशपक्षां शालां मानस्य पत्नीमग्निर्गर्भ इवा शये.. (२१)
जो शाला दो कक्षों, चार कक्षों, छः कक्षों, आठ कक्षों और दस कक्षों वाली बनाई जाती
है, मैं उस शाला में इस प्रकार सोता हूं, जिस प्रकार गर्भ में जठराग्नि विद्यमान रहती हैं. (२१)
प्रतीचीं त्वा प्रतीचीनः शाले प्रेम्त्यहिंसतीम्.
अग्निर्ह्य१न्तरापश्चर्त्तस्य प्रथमा द्वाः.. (२२)
हे शाला! मैं हिंसा रहित हो कर तुझ में प्रवेश करता हूं. तेरा मुख यदि पश्चिम की ओर है
तो मैं पूर्वाभिमुख हो कर तुझ में प्रवेश करता हूं. ब्रह्म से उत्पन्न होने वाले अग्नि और जल भी
मेरे साथ तुझ में प्रवेश करते हैं. (२२)
इमा आपः प्र भराम्ययक्ष्मा यक्ष्मनाशनीः.
गृहानुप प्र सीदाम्यमृतेन सहाग्निना.. (२३)
यक्ष्मा रोग से रहित मैं यक्ष्मा रोग का विनाश करने वाले जलों को भरता हूं तथा
अमृतमय अग्नि ले कर घरों में प्रवेश करता हूं. (२३)
मा नः पाशं प्रति मुचो गुरुर्भारो लघुर्भव.
वधूमिव त्वा शाले यत्र कामं भरामसि.. (२४)
हे शाला! अपने पाशों को हमारी ओर मत फेंक. गुरु भार वाली तू मेरे लिए कम भार
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वाली प्रतीत हो. हम वधू के समान तेरा शृंगार करते एवं तुझे सामग्री से भरते हैं. (२४)
प्राच्या दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (२५)
शाला की पूर्व दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह आहुति
शुभ हो. (२५)
दक्षिणाया दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (२६)
शाला की दक्षिण दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह
आहुति शुभ हो. (२६)
प्रतीच्या दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (२७)
शाला की पश्चिम दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह
आहुति शुभ हो. (२७)
उदीच्या दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (२८)
शाला की उत्तर दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए आहुति
शुभ हो. (२८)
ध्रुवाया दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (२९)
शाला की नीचे की दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह
आहुति शुभ हो. (२९)
ऊर्ध्वाया दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (३०)
शाला की ऊपर की दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह
आहुति शुभ हो. (३०)
दिशोदिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः.. (३१)
शाला की प्रत्येक दिशा को नमस्कार है. स्वाहा के योग्य इन महान देवों के लिए यह
आहुति शुभ हो. (३१)
सूक्त-४ देवता—ऋषभ
साहस्स्रस्त्वेष ऋषभः पयस्वान् विश्वा रूपाणि वक्षणासु बिभ्रत्.
भद्रं दात्रे यजमानाय शिक्षन् बार्हस्पत्य उसियस्तन्तुमातान्.. (१)
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यह शक्तिशाली वृषभ अर्थात् बैल हजारों गायों को गर्भिणी बनाने में समर्थ है. यह
अपनी वीर्यवाहिनी नाड़ियों में अनेक रूप धारण करता है. बृहस्पति संबंधी मंत्रों से युक्त यह
बैल गायों के योग्य है. यह दान देने वाले यजमान का मंगल करता हुआ अपनी संतान की
वृद्धि करे. (१)
अपां यो अग्रे प्रतिमा बभूव प्रभूः सर्वस्मै पृथिवीव देवी.
पिता वत्सानां पतिरघ्न्यानां साहसे पोषे अपि नः कृणोतु.. (२)
जो बैल जलों के समान एवं प्रतिमा के समान खड़ा हुआ, जो पृथ्वी के समान सब का
स्वामी है, जो बछड़ों का पिता तथा हिंसा न करने योग्य गायों का पति है, वह हमें हजारों
प्रकार से संपन्न बनाए. (२)
पुमानन्तर्वान्तःस्थविरः पयस्वान् वसोः कबन्धमृषभो बिभर्ति.
तमिन्द्राय पथिभिर्देवयानैर्हुतमग्निर्वहतु जातवेदाः.. (३)
वसु के कबंध को धारण करने वाला यह बैल पुमान अर्थात् नर, आंतरिक शक्ति वाला
एवं वीर्ययुक्त है. जन्म लेने वालों को जानने वाले अग्नि देव देवों के मार्ग से हमें इंद्र तक
पहुंचाएं. (३)
पिता वत्सानां पतिरघ्न्यानामथो पिता महतां गर्गराणाम्.
वत्सो जरायु प्रतिधुक् पीयूष आभिक्षा घृतं तद् वस्य रेतः.. (४)
बैल बछड़ों का पिता एवं हिंसा के अयोग्य गायों का पति होने के साथ ही गरजने वाले
मेघों का पालनकर्ता भी है. इस बैल का वीर्य, बछड़ा, जरायु (जेर) प्रतिधुक, अमृत, आभिक्षा
एवं घृत के समान है. (४)
देवानां भाग उपनाह एषो ३ पां रस ओषधीनां घृतस्य.
सोमस्य भक्षमवृणीत शक्रो बृहन्नद्रिरभवद् यच्छरीरम्.. (५)
यह जड़ीबूटियों का रस जलों एवं घृत का भाग है. उपनय देवों का भाग है. इंद्र ने सोम
के भक्षण के लिए अर्थात् सोमरस पीने के लिए पर्वत के समान विशाल शरीर धारण किया
था. (५)
सोमेन पूर्णं कलशं बिभर्षि त्वष्टा रूपाणां जनिता पशूनाम्.
शिवास्ते सन्तु प्रजन्व इह या इमा न्य१स्मभ्यं स्वधिते यच्छ या अमूः.. (६)
हे स्वधिति! तुम सोमरस से भरा हुआ कलश धारण करती हो. त्वष्टा पशुओं को आकार
देने वाले हैं. जन्म लेने वाले तुम्हारे लिए मंगलकारी हों. तुम अपनी इन संतानों को हमें प्रदान
करो. (६)
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आज्यं बिभर्ति घृतमस्य रेतः साहस्रः पोषस्तमु यज्ञमाहुः.
इन्द्रस्य रूपमृषभो वसानः सो अस्मान् देवाः शिव ऐतु दत्तः.. (७)
यह बैल आज्य अर्थात् यज्ञ के कारण रूप दूध आदि को धारण करता है. घृत इस का
वीर्य है. यह जिन सहस्रों पुष्टियों को प्रदान करता है, उन्हीं को यज्ञ कहा जाता है. हे देवो! इंद्र
का रूप धारण करता हुआ एवं यजमान के द्वारा दिया हुआ यह बैल हमारे लिए शुभ हो. (७)
इन्द्रस्यौजो वरुणस्य बाहू अश्विनोरंसौ मरुतामियं ककुत्.
बृहस्पतिं संभृतमेतमाहुर्ये धीरासः कवयो ये मनीषिणः.. (८)
जो धीर, मनीषी एवं विद्वान् पुरुष हैं, वे बताते हैं कि इस बैल का ओज अर्थात् बल इंद्र
का भाग है, इस के बाहु अर्थात् पैर वरुण के भाग हैं, इस का कंधा अश्विनीकुमारों का भाग है
और इस की ठाट मरुतों का भाग है. इस का संभृत बृहस्पति का भाग है. (८)
दैवीर्विशः पयस्वाना तनोषि त्वामिन्द्रं त्वां सरस्वन्तमाहुः.
सहस्रं स एकमुखा ददाति यो ब्राह्मण ऋषभमाजुहोति.. (९)
हे बैल! तू अपने दूध आदि से देवों का विस्तार करता है. तुझे इंद्र एवं सारस्वत कहा
गया है. जो ब्राह्मण मंत्रों द्वारा संपन्न होने वाले यज्ञ में बैल का दान करता है, वह एक मुख
वाली हजारों गायों के दान का पुण्य प्राप्त करता है. (९)
बृहस्पतिः सविता ते वयो दधौ त्वष्टुर्वायोः पर्यात्मा त आभृतः.
अन्तरिक्षे मनसा त्वा जुहोमि बर्हिष्टे द्यावापृथिवी उभे स्ताम्.. (१०)
बृहस्पति एवं सविता ने तेरी आयु को धारण किया है. त्वष्टा एवं वायु ने तेरे संपूर्ण शरीर
में आत्मा को धारण किया है. मैं मन से अंतरिक्ष में तेरी आहुति देता हूं. धरती तथा आकाश
दोनों तेरे बर्हि अर्थात् कुश हों. (१०)
य इन्द्र इव देवेषु गोष्वेति विवावदत्.
तस्य ऋषभस्याङ्गानि ब्रह्मा सं स्तौतु भद्रया.. (११)
जिस प्रकार इंद्र देवों के मध्य में आते हैं, उसी प्रकार यह बैल गर्जन करता हुआ गायों
के मध्य जाता है. ब्रह्मा अपनी मंत्रमयी कल्याणी वाणी से इस बैल के अंगों की स्तुति करें.
(११)
पार्श्वे आस्तामनुमत्या भगस्यास्तामनूवृजौ.
अष्ठीवन्तावब्रवीन्मित्रो ममैतौ केवलाविति.. (१२)
इस बैल के पार्श्व अर्थात् दोनों ओर के भाग अनुमति के हैं तथा इस के अनुबृज अर्थात्
पीछे चलने वाले भाग अग्नि देव के हैं. मित्र देव ने कहा था कि बैल के केवल टखने मेरे भाग
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हैं. (१२)
भसदासीदादित्यानां श्रोणी आस्तां बृहस्पतेः.
पुच्छं वातस्य देवस्य तेन धूनोत्योषधीः.. (१३)
बैल की कमर आदित्यों की, पीठ बृहस्पति की तथा पूंछ वायु देव की है. उसी से यह
जड़ीबूटियों को कंपित करता है. (१३)
गुदा आसन्त्सिनीवाल्याः सूर्यायास्त्वचमब्रुवन्.
उत्थातुरब्रुवन् पद ऋषभं यदकल्पयन्.. (१४)
बैल की गुदा सिनीवाली अर्थात् अमावस्या का भाग है एवं त्वचा को सूर्य की पत्नी सूर्या
का भाग कहा गया है. इस के पैर उत्थाता का भाग कहे गए हैं. इस प्रकार ऋषियों ने बैल की
कल्पना की. (१४)
क्रोड आसीज्जामिशंसस्य सोमस्य कलशो धृतः.
देवाः संगत्य यत् सर्व ऋषभं व्यकल्पयन्.. (१५)
बैल की गुदा सिनीवाली का भाग थी तथा धारण किया गया कलश सोम का भाग था.
सभी देवों ने एकत्र हो कर इस प्रकार बैल की कल्पना की थी. (१५)
ते कुष्ठिकाः सरमायै कूर्मेभ्यो अदधुः शफान्.
ऊबध्यमस्य कीटेभ्यः श्ववर्तेभ्या अधारयन्.. (१६)
उन बैलों ने सरमा के लिए कुष्ठिकाओं को तथा कर्मों के लिए खुरों को धारण किया.
उन्होंने बैल के ऊपर के भाग को खानों और कीड़ों के लिए धारण किया. (१६)
शृङ्गाभ्यां रक्ष ऋषत्यवर्तिं हन्ति चक्षुषा.
शृणोति भद्रं कर्णाभ्यां गवां यः पतिरघ्न्यः.. (१७)
जो बैल हिंसा न करने योग्य गायों का पति है, वह अपने सींगों से राक्षसों को तथा नेत्रों
से दरिद्रता को दूर भगाता है. वह अपने कानों से कल्याणकारी बातें सुनता है. (१७)
शतयाजं स यजते नैनं दुन्वन्त्यग्नयः.
जिन्वन्ति विश्वे तं देवा यो ब्राह्मण ऋषभमाजुहोति.. (१८)
जो ब्राह्मण बैल का दान करता है, वह शतयाज नामक यज्ञ करने का पुण्य प्राप्त करता
है. उसे अग्नि देव संताप नहीं देते और सभी देव उसे संतुष्ट करते हैं. (१८)
ब्राह्मणेभ्य ऋषभं दत्त्वा वरीयः कृणुते मनः.
पुष्टिं सो अघ्न्यानां स्वे गोष्ठे ऽ व पश्यते.. (१९)
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जो व्यक्ति ब्राह्मणों को बैल का दान कर के अपने मन को उदार बनाता है, वह अपनी
गोशाला में गायों की समृद्धि देखता है. (१९)
गावः सन्तु प्रजाः सन्त्वथो अस्तु तनूबलम्.
तत् सर्वमनु मन्यन्तां देवा ऋषभदायिने.. (२०)
गाएं हों, संतानें हों तथा शरीर में शक्ति हो. बैल का दान करने वाले के लिए देवगण यह
सब प्रदान करें. (२०)
अयं पिपान इन्द्र इद् रयिं दधातु चेतनीम्.
अयं धेनुं सुदुघां नित्यवत्सां वशां दुहां विपश्चितं परो दिवः.. (२१)
हवि प्राप्त करने वाले इंद्र यजमान को ज्ञान रूपी धन के अतिरिक्त सरलता से दुही जाने
वाली एवं सदा बछड़ों को जन्म देने वाली गाय तथा स्वर्ग प्रदान करें. (२१)
पिशङ्गरूपो नभसो वयोधा ऐन्द्रः शुष्मो विश्वरूपो न आगन्.
आयुरस्मभ्यं दधत् प्रजां च रायश्च पोषैरभि नः सचताम्.. (२२)
पीले रंग वाला, आकाश के अन्न को धारण करने वाला एवं अनेक रूपों वाला इंद्र
संबंधी बैल हमें प्राप्त हुआ. वह हमें आयु, संतान एवं धन देता हुआ सभी प्रकार से पुष्ट करे.
(२२)
उपेहोपपर्चनास्मिन् गोष्ठ उप पृञ्च नः. उप ऋषभस्य यद् रेत उपेन्द्र तव
वीर्यम्.
हे उपपृंच! यहां आओ तथा गोशाला में हम से मिलो. हे इंद्र! इस वृषभ का वीर्य ही
तुम्हारा वीर्य है. (२३)
एतं वो युवानं प्रति दध्मो अत्र तेन क्रीडन्तीश्चरत वशाँ अनु.
मा नो हासिष्ट जनुषा सुभागा रायश्च पोषैरभि नः सचध्वम्.. (२४)
हे गायो! यह युवा बैल तुम्हारे लिए है. इस गोशाला में इस के साथ क्रीडा करती हुई तुम
विचरण करो. तुम हमारा त्याग मत करो तथा हमें सुंदर धनों से पुष्ट बनाओ. (२४)
सूक्त-५ देवता—अजन्मा
आ नयैतमा रभस्व सुकृतां लोकमपि गच्छतु प्रजानन्.
तीर्त्वा तमांसि बहुधा महान्त्यजो नाकमा क्रमतां तृतीयम्.. (१)
इस अज को लाओ और यज्ञ कर्म आरंभ करो. जानता हुआ यह पुण्यात्माओं के लोक
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