अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 480 of 1063
Read in contextतुझे वरुण ने खोला है, आदित्य तेरा उद्घाटन करते हैं. (१८)
ब्रह्मणा शालां निर्मितां कविभिर्निमितां मिताम्.
इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः.. (१९)
ब्रह्म ने इस शाला का निर्माण किया है और विद्वानों ने इस निर्माण की नापतोल में
सहायता की है. सोमरस पीने के स्थान पर बैठे हुए इंद्र और अग्नि देव इस शाला की रक्षा
करें. (१९)
कुलाये ऽ धि कुलायं कोशे कोशः समुब्जितः.
तत्र मर्तो वि जायते यस्माद् विश्वं प्रजायते.. (२०)
इस शाला रूपी घोंसले के भीतर शरीर रूपी घोंसला है. कोश में कोश सुसज्जित हैं.
तात्पर्य यह है कि यह शाला कोश के समान है और इस में रहने वाला शरीर भी कोश के
समान है. मरणधर्मा मनुष्य इसी में जन्म लेता है. सारे संसार की उत्पत्ति इसी प्रकार होती है.
(२०)
या द्विपक्षा चतुष्पक्षा षट्पक्षा या निमीयते.
अष्टापक्षां दशपक्षां शालां मानस्य पत्नीमग्निर्गर्भ इवा शये.. (२१)
जो शाला दो कक्षों, चार कक्षों, छः कक्षों, आठ कक्षों और दस कक्षों वाली बनाई जाती
है, मैं उस शाला में इस प्रकार सोता हूं, जिस प्रकार गर्भ में जठराग्नि विद्यमान रहती हैं. (२१)
प्रतीचीं त्वा प्रतीचीनः शाले प्रेम्त्यहिंसतीम्.
अग्निर्ह्य१न्तरापश्चर्त्तस्य प्रथमा द्वाः.. (२२)
हे शाला! मैं हिंसा रहित हो कर तुझ में प्रवेश करता हूं. तेरा मुख यदि पश्चिम की ओर है
तो मैं पूर्वाभिमुख हो कर तुझ में प्रवेश करता हूं. ब्रह्म से उत्पन्न होने वाले अग्नि और जल भी
मेरे साथ तुझ में प्रवेश करते हैं. (२२)
इमा आपः प्र भराम्ययक्ष्मा यक्ष्मनाशनीः.
गृहानुप प्र सीदाम्यमृतेन सहाग्निना.. (२३)
यक्ष्मा रोग से रहित मैं यक्ष्मा रोग का विनाश करने वाले जलों को भरता हूं तथा
अमृतमय अग्नि ले कर घरों में प्रवेश करता हूं. (२३)
मा नः पाशं प्रति मुचो गुरुर्भारो लघुर्भव.
वधूमिव त्वा शाले यत्र कामं भरामसि.. (२४)
हे शाला! अपने पाशों को हमारी ओर मत फेंक. गुरु भार वाली तू मेरे लिए कम भार
ebook converter DEMO Watermarks*