अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअग्नि, सूर्य, चंद्रमा और वायु कामदेव की समानता नहीं कर पाते. इस कारण हे
कामदेव! तुम सब से ज्येष्ठ एवं समस्त विश्व में व्याप्त हो. मैं तुम को नमस्कार करता हूं. (२४)
यास्ते शिवास्तन्वः काम भद्रा याभिः सत्यं भवति यद् वृणीषे.
ताभिष्टवमस्माँ अभिसंविशस्वान्यत्र पापीरप वेशया धियः.. (२५)
हे कामदेव! तुम्हारे जो कल्याणकारी एवं भद्र शरीर हैं, उन के द्वारा तुम जिन का वरण
करते हो, वही सत्य है. उन्हीं के द्वारा तुम हमारे शरीरों में प्रवेश करो. तुम अपनी पापबुद्धियों
को हम से दूर रखो तथा उन्हें शत्रुओं में प्रविष्ट करो. (२५)
सूक्त-३ देवता—शाला
उपमितां प्रतिमितामथो परिमितामुत.
शालाया विश्ववाराया नद्धानि वि चृतामसि.. (१)
उपमिता, प्रतिमिता और परिमिता जो शालाएं हैं, उन में से किसी भी शाला को खोलते
हुए हम सब के लिए वरण करने योग्य शाला के द्वार खोलते हैं. (१)
यत् ते नद्धं विश्ववारे पाशोग्रन्थिश्च यः कृतः.
बृहस्पतिरिवाहं बलं वाचा वि संस्यामि तत्.. (२)
हे वरण करने योग्य शाला! तुझ में जो बंधन है, जो पाश है और जो गांठें हैं, उन्हें
बृहस्पति के समान शक्तिशाली मैं अपने मंत्र बल से खोलता हूं. (२)
आ ययाम सं बबर्ह ग्रन्थींश्चकार ते दृढान्.
परूंषि विद्वाञ्छस्तेवेन्द्रेण वि चृतामसि.. (३)
हे शाला! बनाने वाले ने तुम्हें बहुत लंबा बनाया है. उस ने तुझ में मजबूत गांठें लगाई हैं.
उन कठोर गांठों को जानता हुआ मैं इंद्र की शक्ति से उन्हें खोलता हूं. (३)
वंशानां ते नहनानां प्राणाहस्य तृणस्य च.
पक्षाणां विश्ववारे ते नद्धानि वि चृतामसि.. (४)
हे सब के द्वारा वरण करने योग्य शाला! तेरे बांसों के बंधनों की, लकड़ियों की, तिनकों
की तथा वृक्षों की जो गांठें हैं, मैं उन्हें खोलता हूं. (४)
संदंशानां पलदानां परिष्वज्जल्यस्य च.
इदं मानस्य पत्न्या नद्धानि वि चृतामसि.. (५)
मैं मान की पत्नी अर्थात् शाला के द्वारा बांधे गए संदेशों के, पलदों के, परिष्वंद के तथा
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