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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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उस प्रकार मुझ में तेज की स्थापना करें. (११)
यथा सोमो द्वितीये सवन इन्द्राग्न्योर्भवति प्रिय:.
एवा म इन्द्राग्नी वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१२)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में इंद्र और अग्नि को प्रिय होता है, उसी प्रकार इंद्र
और अग्नि मुझ में तेज की स्थापना करें. (१२)
यथा सोमस्तृतीये सवन ऋभूणां भवति प्रिय:.
एवा म ऋभवो वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१३)
जिस प्रकार सोमरस तीसरे सवन में शत्रुओं को प्रिय होता है, उसी प्रकार ऋभुगण मुझ
में तेज धारण करें. (१३)
मधु जनिषीय मधु वंसिषीय. पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा..
(१४)
हे अग्नि! मैं दुग्ध आदि हवि से युक्त हो कर आया हूं. मैं मधु को प्रकट कर के उस के
द्वारा तेजस्वी बनूं. मुझ में अपने वचन से तेज स्थापित करो. (१४)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभि:.. (१५)
हे अग्नि! तुम मुझे अपने तेज, संतान एवं आयु से युक्त करो. देवगण और ऋषियों के
साथ इंद्र मुझे तुम्हारी सेवा करने वाला जानें. (१५)
यथा मधु मधुकृत: संभरन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (१६)
जैसे मधु एकत्र करने वाले मुझ पर मधु गिराते हैं, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ में तेज
को स्थापित करें. (१६)
यक्षा मक्षा इदं मधु न्यज्जन्ति मधावधि.
एवा मे अश्विना वर्चस्तेजो बलमोजश्च ध्रियताम्.. (१७)
जिस प्रकार मधुमक्खियां मधु के ऊपर मधु रखती है, उसी प्रकार अश्विनीकुमार मुझ
को वर्चस्वी, तेजस्वी, बली और ओज युक्त बनाएं. (१७)
यद् गिरिषु पर्वतेषु गोष्वश्वेषु यन्मधु.
सुरायां सिच्यमानायां यत् तत्र मधु तन्मयि.. (१८)
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