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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 466 of 1063

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Page 466

सोदक्रामत् सा सप्तऋषीनागच्छत् तां
सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति.. (१३)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह सात ऋषियों के समीप पहुंचा. सात ऋषियों ने
उस का आह्वान करते हुए कहा—"ब्रह्मणस्पति, आओ." (१३)
तस्याः सोमो राजा वत्स आसीच्छन्दः पात्रम्.. (१४)
राजा सोम उस के वत्स थे और छंद उस का पात्र था. (१४)
तां बृहस्पतिराङ्गिरसो ऽ धोक् तां ब्रह्म च तपश्चाधोक्.. (१५)
आंगिरस बृहस्पति ने उस का दोहन किया तथा उस के ब्रह्म और तप का भी दोहन
किया. (१५)
तद् ब्रह्म च तपश्च सप्तऋषय उप जीवन्ति
ब्रह्मवर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६)
उस ब्रह्म और तप के उपजीवी सात ऋषि होते हैं. जो इस बात को जानता है, वह
ब्रह्मवर्चस्व वाला होता है और सभी प्राणियों को उपजीवन देता है. (१६)
सूक्त-१० (५) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा देवानागच्छत् तां देवा उपाह्वयन्तोज॑ एहीति.. (१)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह देवों के समीप पहुंचा. देवों ने उस का आह्वान
करते हुए कहा—"हे ऊर्जा, आओ." (१)
तस्या इन्द्रो वत्स आसीच्चमसः पात्रम्.. (२)
उस के वत्स इंद्र हुए और चमस उस का पात्र था. (२)
तां देवः सविता ऽ धोक् तामूर्जामेवाधोक्.. (३)
सविता देव ने उस का दोहन किया और ऊर्जा को दुहा. (३)
तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (४)
देवगण उस ऊर्जा के सहारे जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को
जीने का सहारा देने योग्य बनता है. (४)
सोदक्रामत् सा गन्धर्वाप्सरस आगच्छत्
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