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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 475 of 1063

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Page 475

न सायकप्रणुत्तानां पुनरस्ति निवर्तनम्.. (१२)
बंधन टूटने पर नौका जिस प्रकार नीचे की ओर बहती है, मेरे शत्रु उसी प्रकार नीचे
गिरते चले जाएं, क्योंकि जो लोग बाण से घायल हो कर भागते है, वे वापस नहीं आते. (१२)
अग्निर्यव इन्द्रो यवः सोमो यवः. यवयावानो देवा यावयन्त्वेनम्.. (१३)
अग्नि, इंद्र और सोमदेव—ये सभी देव मेरे शत्रुओं को दूर भगाएं. (१३)
असर्ववीरश्चरतु प्रणुत्तो द्वेष्यो मित्राणां परिवर्ग्य १:स्वानाम्.
उ त पृथिव्यामव स्यन्ति विद्युत उग्रो वो देवः प्र मृणत् सपत्नान्.. (१४)
इस मंत्र की शक्ति से प्रेरणा पा कर मेरा शत्रु पुत्रों, पौत्रों एवं समस्त वीरों से रहित हो
कर घूमे. उस के मित्र भी उस का त्याग कर दें. विद्युत पृथ्वी पर उस के टुकड़े कर दे. हे
यजमान! देवगण तुम्हारे शत्रुओं का मर्दन करें. (१४)
च्युता चेयं बृहत्यच्युता च विद्युद् बिभर्ति स्तनयित्नूंश्च सर्वान्.
उद्यन्नादित्यो द्रविणेन तेजसा नीचैः सपत्नान् नुदतां मे सहस्वान्.. (१५)
जो बिजली अपने गर्जन से सभी मेघों को पूर्ण कर देती है, वह नीचे गिर कर अथवा
अपने स्थान पर रह कर तथा उदय होते हुए सूर्य अपने शक्तिशाली तेज के द्वारा मेरे शत्रुओं
को नीचे गिराएं. (१५)
यत् ते काम शर्म त्रिवरूथमुद्धं ब्रह्म वर्म विततमनतिव्याध्यं कृतम्.
तेन सपत्नान् परि वृङ्ग्धि ये मम पर्येनान् प्राणः पशवो जीवनं वृणक्तु..
(१६)
हे कामदेव! तुम्हारा जो कल्याणकारी बल तीनों लोकों को पराजित करने वाला है, उस
के एवं ब्रह्म रूपी विस्तृत कवच के द्वारा तुम मेरे शत्रुओं का विनाश करो. उन का जीवन एवं
पशु प्राणहीन हो जाएं. (१६)
येना देवा असुरान् प्राणुदन्त येनेन्द्रो दस्यूनधमं तमो निनाय.
तेन त्वं काम मम ये सपत्नास्तानस्माल्लोकात् प्र णुदस्व दूरम्.. (१७)
हे कामदेव! जिस शक्ति के द्वारा इंद्र ने दैत्यों को मृत्यु रूपी भयानक अंधकार में धकेल
दिया था और देवों ने जिस शक्ति के द्वारा असुरों को भगा दिया था, तुम उसी शक्ति के द्वारा
मेरे शत्रुओं को इस लोक से दूर भगा दो. (१७)
यथा देवा असुरान् प्राणुदन्त यथेन्द्रो दस्यूनधमं तमो बबाधे.
तथा त्वं काम मम ये सपत्नास्तानस्माल्लोकात् प्र णुदस्व दूरम्.. (१८)
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