अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 478 of 1063
Read in contextतृणों के बंधनों को खोलता हूं. (५)
यानि ते ऽ न्तः शिक्यान्याबेधू रण्याय कम्.
प्र ते तानि चृतामसि शिवा मानस्य पत्नी न उद्घिता तन्वे भव.. (६)
हे कल्याण करने वाली मान की पत्नी! तुझ में भीतर जो छींके बांधे गए हैं तथा मचान
बनाए गए हैं, हम उन्हें खोलते हैं. तुम हमें स्वर्गलोक में सुख दो तथा हम पर क्रोधित न होओ.
(६)
हविर्धानमग्निशालं पत्नीनां सदनं सदः. सदो देवानामसि देवि शाले.. (७)
हे शाला! तुम में हव्य प्राप्त अग्नि, कुंड, देवों के बैठने योग्य आसन तथा पत्नियों सहित
यजमानों के बैठने योग्य स्थान है. (७)
अक्षुमोपशं विततं सहस्राक्षं विषूवति.
अवनद्धमभिहितं ब्रह्मणा वि चृतामसि.. (८)
हे दिव्यता संपन्न शाला! शयन कक्ष में विस्तृत झरोखा है. इस प्रकार के शयन कक्ष को
मैं मंत्रों की शक्ति से खोलता हूं. (८)
यस्त्वा शाले प्रतिगृह्णाति येन चासि मिता त्वम्.
उभौ मानस्य पत्नि तौ जीवतां जरदष्टी.. (९)
हे शाला! जो तुझे ग्रहण करता है तथा जिस ने नाप कर तेरा निर्माण किया है. हे मान
की पत्नी! ये दोनों शरीर के शिथिल हो जाने तक जीवित रहें. (९)
अमुत्रैनमा गच्छताद् दृढा नद्धा परिष्कृता.
यस्यास्ते विचृतामस्यङ्गमङ्गं परुष्परुः. (१०)
हे शाला! हम तेरे दृढ़तापूर्वक बंधे हुए अंगों को अलग कर रहे हैं. जिस ने तेरा निर्माण
किया है, उसे तू स्वर्ग प्रदान कर. (१०)
यस्त्वा शाले निमिमाय संजभार वनस्पतीन्.
प्रजायै चक्रे त्वा शाले परमेष्ठी प्रजापतिः. (११)
हे शाला, जिस ने तेरा निर्माण किया है और तेरा निर्माण करने के लिए जो वृक्षों की
लकड़ी लाया है, प्रजापति ने प्रजा के निमित्त तेरा निर्माण किया है. (११)
नमस्तस्मै नमो दात्रे शालापतये च कृण्मः.
नमो ऽ ग्नये प्रचरते पुरुषाय च ते नमः.. (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*