अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतां गन्धर्वाप्सरस उपाह्वयन्त पुण्यगन्ध एहीति.. (५)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह गंधर्वों तथा अप्सराओं के समीप पहुंचा. गंधर्वों
और अप्सराओं ने उस का आह्वान करते हुए कहा—“हे पुण्य गंध, आओ.” (५)
तस्याश्चित्ररथः सौर्यवर्चसो वत्स आसीत् पुष्करपर्णं पात्रम्.. (६)
सूर्यवर्चस का पुत्र उस का वत्स था और पुष्करपर्ण अर्थात् सरोवर का पत्ता उस का
पात्र था. (६)
तां वसुरुचिः सौर्यवर्चसो ऽ धोक् तां पुण्यमेव गन्धमधोक्.. (७)
सूर्यवर्चस के पुत्र वसुरुचि ने उस का दोहन किया और पुण्यगंध को ही दुहा. (७)
तं पुण्यं गन्धं गन्धर्वाप्सरस उप जीवन्ति पुण्यगन्धिरुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (८)
गंधर्व और अप्सराएं उस पुण्यगंध को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात
को जानता है, वह सब को जीवन का आश्रय देने वाला बनता है. (८)
सोदक्रामत् सेतरजनानागच्छत् तामितरजना उपाह्वयन्त तिरोध एहीति..
(९)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह अन्य जनों के समीप गया. अन्य जनों ने उस का
आह्वान करते हुए कहा—“हे तिरोधा, आओ.” (९)
तस्याः कुबेरो वैश्रवणो वत्स आसीदामपात्रं पात्रम्.. (१०)
विश्रवा ऋषि के पुत्र कुबेर उस के वत्स थे और मिट्टी का कच्चा पात्र उस का पात्र था.
(१०)
तां रजतनाभिः काबेरकोऽधोक् तां तिरोधामेवाधोक्.. (११)
रजत नाभि काबेरक ने उस का दोहन किया और उस से तिरोधा को दुहा. (११)
तां तिरोधामितरजना उप जीवन्ति तिरो धत्ते सर्वं पाप्मानमुपजीवनीयो
भवति य एवं वेद.. (१२)
अन्य जन तिरोधा को जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब
के पापों को तिरोहित करता है और सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१२)
सोदक्रामत् सा सर्पानागच्छत् तां सर्पा उपाह्वयन्त विषवत्येहीति.. (१३)
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