अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपर्वतों में, पहाड़ी प्रदेशों में, गायों में तथा अश्वों में जो मधु है, जो मधु नीचे की ओर
बहने वाले जलों में है, वह मधु मुझ में स्थित हो. (१८)
अश्विना सारघेण मा मधुना ऽ ङ्क्तं शुभस्पती.
यथा वर्चस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (१९)
हे शोभा के लिए स्वर्ण के आभूषण धारण करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मुझे
मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से युक्त करो, जिस से मैं मनुष्यों के प्रति ओजपूर्ण
वाणी का उच्चारण कर सकूं. (१९)
स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यां दिवि.
तां पशव उप जीवन्ति सर्वे तेनो सेषमूर्जं पिपर्ति.. (२०)
हे प्रजापति! मेघों का गर्जन ही तुम्हारी वाणी है. हे वर्षा करने वाले प्रजापति! तुम
पृथ्वी और स्वर्ग को जल से सींचते हो. पशु उसी जल से जीवित रहते है तथा वही वर्षा अन्न
और जल का पोषण करती है. (२०)
पृथिवी दण्डो ३ न्तरिक्षं गर्भो द्यौः कशा विद्युत् प्रकशो हिरण्ययो बिन्दुः..
(२१)
पृथ्वी दंड है, अंतरिक्ष गर्भ है, द्यौ ब्रह्म है, विद्युत प्रकाश है और बिंदु हिरण्मय है.
(२१)
यो वै कशायाः सप्त मधूनि वेद मधुमान् भवति.
ब्राह्मणश्च राजा च धेनुश्चानड्वांश्च व्रीहिश्च यवश्च मधु सप्तमम्.. (२२)
निश्चय ही जो ब्रह्म के सात मधुओं को जानता है, वह मधु वाला बन जाता है तथा
ब्राह्मण, राजा, गौ, बैल, धान, जौ के अतिरिक्त दसवां मधु ब्रह्म है. (२२)
मधुमान् भवति मधुमदस्याहार्यं भवति.
मधुमतो लोकाञ्जयति य एवं वेद.. (२३)
जो इस बात को जानता है, वह मधु वाला होता है, मधु पूर्णलोकों पर विजय प्राप्त
करता है तथा मधुमय भोजन का भोग करता है. (२३)
यद् वीध्रे स्तनयति प्रजापतिरेव तत् प्रजाभ्यः प्रादुर्भवति.
तस्मात् प्राचीनोपवीतस्तिष्ठेत् प्रजापते ऽ नु मा बुध्यस्वेति.
अन्वेनं प्रजा अनु प्रजापतिर्बुध्यते य एवं वेद.. (२४)
आकाश में जो मेघ गर्जन होता है, वह प्रजापति है, वह प्रजाओं के लिए ही प्रकट होता
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