१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
११४ ] [ तृतीय अध्याय
११४ ] [ तृतीय अध्याय
भरने के लिये सब को निगलता रहता है । इस काल के द्वारा तीनों लोक
व्याप्त किये हुये हैं ॥३१-३८॥
मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपञ्जरे ।
स्तनवस्थिग्रन्थि शालिन्याः स्त्रियः किमिव शोभनम् ॥३६
त्वङ् मांसरक्तबाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोच [क] नै ।
समालोक [च]य रम्यं चेत् किं सुधा परिमुह्यसि ॥४०
मेरुशृंगतटोल्लासिगंगाजलरयोपमा ।
दृष्टा यस्मिन् मुने मक्ताहारस्योल्लासशालिता ॥४१
श्मशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः ।
श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्डमिवान्धसः ॥४२
केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः ।
दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम् ॥४३
ज्वलतामतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः ।
स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम् ॥४४
कामनाम्ना किरातेन विकीर्णा मुग्धचेतसः ।
नार्यो नरविहं गानां गबन्धनवागुराः ॥४५
जन्म पल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम् ।
पुंसां दुर्वासनारज्जुर्नारी बडिशपिण्डका ॥४६
सर्वेषा दोषरत्नानां सुसमुद्गिकयाऽनया ।
दुःखशृङ्खलया नित्यमलमस्तु मम स्त्रिया ॥४७
यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा निःस्त्रीकस्य क्व भोगभूः ।
स्त्रियं त्यक्त्वा जगत् त्यक्तं जगत् त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥४८
देह के अंग यंत्र के समान चंचल हैं और अस्थिपंजर में मांस
युक्त पुतली के समान स्त्री-देह में ऐसी कौन-सी वस्तु है जो सुन्दर कही
जा सकती है ? नेत्र के भीतर की त्वचा, मांस, रक्त तथा अश्रु इन सब
में ऐसी कौन-सी वस्तु है जो आकर्षक प्रतीत होती हो ? यदि कोई वस्तु
महोपनिषत् [ ११५
नहीं है तो मोह करने से क्या लाभ है ? जो नारी सुमेरु शिखरों के
किनारे उल्लसित होकर प्रवाहित होने वाली गंगा की गति के समान
चंचल है और जो मुक्ताहार से सुशोभित देखी जाती है, वह स्त्री जब
काल के चक्र में फँसती है, तब उसके मांस पिंड रूप स्तन को श्मशान
में कुत्ते चाटते हैं। यह नारियाँ केश विन्यास और अञ्जनादि से सुसज्जित
होकर प्रिय लगने पर भी दुःखदायक स्पर्श वाली होती है। वे अग्नि-
ज्वाल के समान दग्ध कर देने वाली ललनाएं विधाता की दुष्कृति रूप
हैं। यह दूरस्थ प्रज्ज्वलित नरक रूप अग्नियों को ईंघन के समान हैं।
इनकी सरसता में भी नीरसता भरी है। काम नामक शिकारी ने पुरुष
रूपी मृगों को बाँध लेने के लिये नारी रूपी पाश को विस्तृत किया है।
नारी दुर्वासना रूपी रस्सी में बँधे हुये उस पिंड के समान है जो चित्त
रूपी कीचड़ में भ्रमण करने वाले पुरुष रूपी मत्स्यों को इस जीवन रूपी
जाल में फँसा लेती है। समुद्र इन समस्त दोषयुक्त रत्नों का उत्पादक
है। जिसके पास स्त्री है वह विलास की कामना में लीन रहता है, जिसके
पास स्त्री नहीं है, उसके लिये भोग का कोई कारण नहीं। जो स्त्री का
त्याग कर सका, उसने ही संसार का त्याग कर दिया और जो संसार
को त्याग देता है, वही सुखी हो सकता है। इसलिये दुःखों की यह
शृङ्खला हम से दूर ही रहे ॥ २६—४८ ॥
दिशोऽपि न हि दृश्यन्ते देशोऽप्यन्योपदेशकॄत् ।
शैला अपि विशीर्यन्ते शीर्यन्ते तारका अपि ॥४९
शुष्यत्यपि समुद्राश्च ध्रुवोऽप्य ध्रुवजीवनः ।
सिद्धा अपि विनश्यन्ति जीर्यन्ते दानवायः ॥५०
परमेष्ठ्यपि निष्ठवान् हीयते हरिरप्यजः ।
भवोऽप्यभावमायाति जीर्यं ते वे दिगीश्वराः ॥५१
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वा वा भूतजातयः ।
नाशमेवानुधावन्ति सलिलानीव बाडवम् ॥५२