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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

भृगुवल्ली अनुवाक २ मन्त्र १ २०९

भृगुवल्ली अनुवाक २ मन्त्र १ २०९
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति
कुतश्चनेति । एतःह वाव न तपति किमहः साधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति ।
स य एवं विद्वानेते आत्मानः स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानः स्पृणुते य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ॥ १ ॥
जिस ब्रह्मानन्द की अनुभूति में मन के साथ वाणी असमर्थ रहती है, उसका बोध करने वाला विद्वान्
कभी भयग्रस्त नहीं होता। विद्वज्जनों को इस बात की चिन्ता संतप्त नहीं करती कि उन्होंने श्रेष्ठ कर्म क्यों
नहीं किया ? उन्होंने पाप कर्मों को क्यों किया ? जो विद्वान् पाप-पुण्य दोनों ही कर्मों को जानता है, वह
पापों से अपनी रक्षा करता है। जो विद्वान् पाप-पुण्य दोनों ही कर्मों के बन्धन को जानता है, वह दोनों ही
कर्मों में आसक्त न होकर अपनी रक्षा करता है। यह उपनिषद् वाणी है ॥ १ ॥
॥ अथ भृगुवल्ली ॥
॥ प्रथमोऽनुवाकः ॥
भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच ।
अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तः होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन
जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
भृगु वारुणि अपने पिता देव वरुण के पास गये और बोले - हे भगवन् ! मुझे ब्रह्म का उपदेश करें।
देव वरुण ने उनसे कहा - अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणीं ये सब उस ब्रह्म की प्राप्ति के साधन हैं।
ये समस्त प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, जिसके आश्रय से जीवन जीते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण
कर जिसमें लय होते हैं, उस ब्रह्म को तत्त्वतः जानने की जिज्ञासा करो। वही ब्रह्म है। इस प्रकार जानकर
भृगु ऋषि तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ द्वितीयोऽनुवाकः ॥
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि
जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि
भगवो ब्रह्मेति । तः होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स
तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्हें बोध हुआ कि अन्न ही ब्रह्म है। निश्चय ही सभी प्राणी अन्न से ही उत्पन्न
होते हैं, उत्पन्न प्राणी अन्न से ही जीवित रहते हैं और अन्त में मृत्यु आने पर इस लोक से प्रयाण
कर अन्न में ही प्रविष्ट होते हैं। ऐसा जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (उनके द्वारा
पूर्ण समर्थन न मिलने पर) पुनः भृगु ऋषि बोले- भगवन् ! तो ब्रह्म क्या है ? ब्रह्म का बोध कराएँ।

२१० तैत्तिरीयोपनिषद्
उन्होंने कहा- तप से ब्रह्म को तत्त्वतः जानने की जिज्ञासा करो। तप ही ब्रह्म है। अतः भृगु ऋषि पुनः
तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ तृतीयोऽनुवाकः ॥
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि
जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स
तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्हें बोध हुआ कि प्राण ही ब्रह्म है। यथार्थ में सभी प्राणी प्राण से ही उत्पन्न होते
हैं, उत्पत्ति के बाद प्राण से ही जीवित रहते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण कर प्राण में ही प्रविष्ट होते
हैं। इस प्रकार जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (उनके द्वारा पूर्ण समर्थन न मिलने पर)
पुनः भृगु ऋषि बोले- भगवन्! ब्रह्म तत्त्वतः क्या है, उसका बोध कराएँ। उन्होंने कहा-तप से ब्रह्म को
तत्त्वतः जानो। तप ही ब्रह्म है, ऐसा जानकर भृगु ऋषि तप करने लगे। तप करने के अनन्तर ॥ १ ॥
॥ चतुर्थोऽनुवाकः ॥
मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि
जीवन्ति। मनःप्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि
भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत।
स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि वास्तव में मन से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर
मन से ही जीवन जीते हैं और अन्त में इस लोक से प्रयाण कर मन में ही प्रविष्ट होते हैं। ऐसा जानकर भृगु
ऋषि पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (अपने ज्ञान बोध का पूर्ण समर्थन न मिलने पर पुनः
कहा-) भगवन्! यथार्थ में ब्रह्म क्या है, उसका बोध कराएँ। देववरुण ने कहा-तप से उस ब्रह्म के यथार्थ
स्वरूप को जानो। तप ही ब्रह्म है। भृगु ऋषि पुनः तप करने लगे। तप करने के अनन्तर..... ॥ १ ॥
॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन
जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स
तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि वास्तव में विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के
बाद विज्ञान से ही जीवन जीते हैं। अन्त में प्रयाण करते हुए विज्ञान में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार
जानकर वे पुनः अपने पिता वरुणदेव के पास गये। (अपने बोध का पूर्ण समर्थन न मिलने पर उन्होंने पुनः
कहा)- भगवन्! यथार्थ में ब्रह्म क्या है, उसका बोध कराएँ। देव वरुण ने कहा- तप से उस ब्रह्म को
तत्त्वतः जानो। तप ही ब्रह्म है। भृगु ऋषि पुनः तप करने लगे। तप करने के अनन्तर...... ॥ १ ॥

भृगुवल्ली अनुवाक ८ मन्त्र १ २११
॥ षष्ठोऽनुवाकः ॥
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन
जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या। परमे
व्योमन् प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति
प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
(तप के अनन्तर) उन्होंने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है। वास्तव में आनन्द से हो समस्त प्राणी उत्पन्न
होते हैं। उत्पत्ति के बाद आनन्द से ही जीवन जीते हैं और अन्त में आनन्द में ही प्रविष्ट होते हैं। इस प्रकार
भृगु ऋषि ब्रह्मज्ञान से पूर्ण हुए। भृगु ऋषि द्वारा अनुभूत तथा देव वरुण द्वारा वर्णित यह ब्रह्म विद्या
परम व्योम (व्यापक आकाश) में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार जो साधक ब्रह्म के आनन्द स्वरूप को जानता
है। वह प्रचुर अन्न, पाचन शक्ति, प्रजा-पशु, ब्रह्मवर्चस तथा महान् कीर्ति से सम्पन्न होकर महान् हो जाता है॥
[ऋषि स्पष्ट करते हैं कि श्रेष्ठतम ब्रह्मविद्या किसी व्यक्ति विशेष के आश्रित नहीं है, वह परम व्योम
में स्थित है। भृगु की तरह कोई भी साधक अपनी अनुभूति-सामर्थ्य को तप द्वारा प्रखर-परिष्कृत
बनाकर उसका बोध प्राप्त कर सकता है।]
॥ सप्तमोऽनुवाकः ॥
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे
प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न की निन्दा न करे। वह व्रत है। प्राण ही अन्न है। शरीर उस अन्न का भक्षण करने वाला है। शरीर
प्राण के आश्रय में स्थित है और प्राण शरीर के आश्रय में अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित
है। जो साधक इस रहस्य को जानता है, वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह (साधक) अन्न-पाचन
शक्ति, प्रजा, पशु, ब्रह्मवर्चस तथा महान् कीर्ति से सम्पन्न होकर महान् हो जाता है॥ १ ॥
॥ अष्टमोऽनुवाकः ॥
अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः
प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने
प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न का कभी तिरस्कार न करे। वह व्रत है। जल ही अन्न है। तेजस् अन्न का भोग करने वाला है।
जल में तेजस् स्थित है और तेजस् में जल अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो साधक
अन्न में अन्न प्रतिष्ठित है, इस रहस्य को जानता है, वह अन्नरूपी ब्रह्म में अधिष्ठित होता है। वह अन्नादि
साधन, पाचन शक्ति, सन्तान, पशु, ब्रह्मवर्चस और कीर्ति से समृद्ध होकर महान् हो जाता है॥ १ ॥
[ जल में तेजस् की अनुभूति सहज की जा सकती है। मोती या किसी चमकदार वस्तु की चमक (तेजस्विता)
घटती है, तो कहा जाता है, उसका पानी उतर गया या 'आब' कम हो गई। 'आब' अरबी में पानी को ही कहते
हैं, जो सम्भवतः संस्कृत के 'अप्' का ही परिवर्तित रूप है।]

२१२ तात्तरायापानषद
॥ नवमोऽनुवाकः ॥
अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः
प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने
प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान्कीर्त्या ॥ १ ॥
अन्न को बढ़ाएँ। वह एक व्रत है। पृथ्‍वी ही अन्न है। आकाश पार्थिव अन्न का आधार रूप होने से
उसका भोक्ता है। पृथ्वी में आकाश स्थित है और आकाश में पृथ्वी अधिष्ठित है। इस प्रकार अन्न में अन्न
स्थित है। जो विद्वान् इस रहस्य को जानता है, वह उसी अन्नरूप ब्रह्म में प्रतिष्ठित होता है। वह अन्नादि
पदार्थ, पाचनशक्ति, संतान, पशु, ब्रह्मवर्चस और कीर्ति से समृद्ध होकर महान् हो जाता है॥ १॥
[ आकाश में पृथ्वी तो प्रत्यक्ष दीखती है, पृथ्वी में आकाश समझने के लिए परमाणु संरचना (एटामिक
स्ट्रक्चर ) समझना होगा। परमाणु का केन्द्र नाभिक ( न्यूक्लियस) होता है और आस-पास इलेक्ट्रॉन घूमते हैं।
न्यूक्लियस तथा घूमने वाले इलेक्ट्रानों के बीच इतना स्थान खाली होता है, जितना सूर्य और पृथ्वी के बीच। यह
स्थान ही आकाश है। इस प्रकार हर ठोस पदार्थ में पर्याप्त आकाश होता है।]
॥ दशमोऽनुवाकः ॥
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।
आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नँराद्धम्। मुखतोऽस्मा अन्नँ राध्यते । एतद्वै
मध्यतोऽन्नँराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नँराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नँराद्धम्। अन्ततोऽस्मा
अन्नँराध्यते ॥ १ ॥ य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति
हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः ।
तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २ ॥ यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु ।
प्रजापतिरमृतमानन्द इत्युपस्थे।सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति ।
तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥ ३ ॥ तन्नम
इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर
इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे ।
यश्चासावादित्ये । स एकः ॥ ४ ॥ स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमा-
त्मानमुपसंक्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं
विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतमानंदमयमात्मानमुपसंक्रम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी
कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥
घर में आये हुए अतिथि को तिरस्कृत न करें। यह एक व्रत है। जिस प्रकार बने, बहुत सा अन्न प्राप्त
करें, जिससे सर्वदा अतिथि सेवा में तत्पर रहें। यदि उसे अधिक आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो स्वयं
को अधिक आदर सहित अन्न मिलता है। यदि मध्यम श्रेणी के आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो मध्यम
श्रेणी के आदर सहित स्वयं को अन्न प्राप्त होता है। यदि निम्न श्रेणी के आदर और प्रेम से भोजन कराएँ, तो
स्वयं को निम्न श्रेणी के आदर सहित अन्न प्राप्त होता है। जो इस तथ्य का ज्ञाता है, वह अतिथि का उत्तम