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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

प्रपाठक ४ मन्त्र २ ३८९

प्रपाठक ४ मन्त्र २ ३८९

इसके अतिरिक्त एक अन्य स्थल पर यह भी संकेत मिलता है कि स्त्री-पुरुष के संयोग से जिस
शरीर का प्रादुर्भाव होता है, वह चेतना शून्य है तथा नरक जैसा प्रतीत होता है। मूत्र द्वार से बहिर्गमन होने
वाला यह शरीर हड्डियों के द्वारा गठित किया गया है। मांस से अनुलिप्त है तथा चर्म के द्वारा आबद्ध किया
गया है। मल, मूत्र, पित्त, कफ, मज्जा, मेद, वसा आदि से युक्त है। इसके अतिरिक्त अन्य कई तरह के मलों
से भी परिपूर्ण है। यह शरीर ऐसा लगता है कि सभी विकार युक्त पदार्थों का कोषागार ही है॥४॥
अथान्यत्राप्युक्तं संमोहो भयं विषादो निद्रा तन्द्री व्रणो जरा शोकः क्षुत्पिपासा
कार्पण्यं क्रोधो नास्तिक्यमज्ञानं मात्सर्यं वैकारुण्यं मूढत्वं निर्व्रीडत्वं निकृतत्वमुद्धतत्वमस-
मत्वमिति तामसान्वितस्तृष्णा स्नेहो रागो लोभो हिंसा रतिर्दृष्टिर्व्यापृतत्वमीर्ष्या काममस्थिरत्वं
चञ्चलत्वं जिहीर्षाऽर्थोपार्जनं मित्रानुग्रहणं परिग्रहावलम्बोऽनिष्टेष्विन्द्रियार्थेषु
द्विष्टिरिष्टेष्वभिषङ्ग इति राजसान्वितैः परिपूर्ण एतैरभिभूत इत्ययं भूतात्मा तस्मान्नाना-
रूपाण्याप्नोतीत्याप्नोतीति॥ ५॥
एक अन्य स्थान में यह भी कहा गया है कि मोह, भय, विषाद, निद्रा, तन्द्रा, वृद्धावस्था, शोक,
दुःख, भूख, प्यास, कार्पण्य (दीनता), क्रोध, नास्तिकता, अज्ञान, मात्सर्य, विकार, मूढ़ता, निर्लज्जता,
उद्धतता, विषमता, कृतघ्नता आदि तमोगुण के विकारों से यह शरीर परिपूर्ण है। इसके अतिरिक्त तृष्णा,
स्नेह, रोग, लोभ, हिंसा, काम-दृष्टि, व्यापार, ईर्ष्या, स्वेच्छाचारिता, चंचलता, किसी की वस्तु को ग्रहण
करने की इच्छा, धनोपार्जन की इच्छा, मित्रों का अनुग्रह, परिग्रह का आश्रय, इन्द्रियों का अप्रिय विषयों से
द्वेष और प्रिय विषयों से आसक्ति आदि रजोगुण से युक्त विकार भी उस भूतात्मा में विद्यमान रहते हैं। इन
सभी विकारों के द्वारा यह भूतात्मा पराभव को प्राप्त होता है तथा पुनः अनेक रूपों को प्राप्त करता है ॥५॥

॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥
ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसोऽतिविस्मिता अतिसमेत्योचुर्भगवन्नमस्ते त्वं नः शाधि
त्वमस्माकं गतिरन्या न विद्यत इत्यस्य कोऽतिथिर्भूतात्मनो येनेदं हित्वात्मन्येव सायुज्यमुपैति
तान्होवाच ॥ १ ॥
ब्रह्मा जी के द्वारा दिये हुए उपदेश को सुनकर ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचारी) श्रेष्ठ मुनि वालखिल्य
जी अत्यधिक विस्मित हुए एवं निकट में जाकर कहा- हे भगवन्! आपको नमस्कार है। आप ही हमें शरण
देने वाले हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कोई हमारा शरण स्थल नहीं। अतः आप हमें यह समझाएँ कि इस
भूतात्मा का अतिथि कौन है, जिसके लिए यह सर्वस्व त्यागकर आत्मा में ही सायुज्य प्राप्त करता है ? ॥ १॥
अथान्यत्राप्युक्तं महानदीभूरमय इव निवर्तकमस्य यत्पुराकृतं समुद्रवेलेव दुर्निवार्यमस्य
मृत्योरागमनं सदसत्फलमयैर्हि पाशैः पशुरिव बद्धं बन्धनस्थस्येवास्वातन्त्र्यं यमविषयस्थ-
स्येव बहुभयावस्थं मदिरोन्मत्त इवामोदमदिरोन्मत्तं पाप्मना गृहीत इव भ्राम्यमाणं महोरगदष्ट
इव विपद्दष्टं महान्धकार इव रागान्धमिन्द्रजालमिव मायामयं स्वप्न इव मिथ्यादर्शनं कदली-
गर्भ इवासारं नट इव क्षणवेषं चित्रभित्तिरिव मिथ्यामनोरममित्यथोक्तम् । शब्दस्पर्शादयो
येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः । येष्वासक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् ॥ २ ॥

३९० मैत्रायण्युपनिषद्
ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि हे श्रेष्ठ मुने ! एक अन्य स्थान में कहा गया है कि जैसे बड़ी-बड़ी नदियों
में तरंगें उठती रहती हैं, वैसे ही भूतात्मा में पूर्वकाल में किये हुए कर्म पाये जाते हैं। उन किये हुए कर्मों
का फल इसे भोगना ही पड़ता है। पुनः जिस तरह समुद्र का किनारा लहरों के अन्त होने के लिए आवश्यक
है, उसी तरह भूतात्मा के लिए मृत्यु भी अति आवश्यक है, वह शुभ व अशुभ कर्मों के परिणाम स्वरूप
बन्धनों में पशुओं की तरह आबद्ध हुआ परतन्त्र- सा बन गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह (भूतात्मा)
यम के राज्य में ही निवास करता है। इस तरह वह भूतात्मा हमेशा डरा हुआ सा ही बना रहता है। विषय-
वासना की सुखरूपी मदिरा का पान करके वह मतवाला हो जाता है। पापरूपी भूत के द्वारा आवेशित हुआ
वह यत्र-तत्र भटकता रहता है। इस प्रकार वह विपत्ति में विषधर सर्प-दंश की भाँति दुःख भोगता है।
विषय-वासनाओं की इच्छा के अनुरूप घने अन्धकार में रहता हुआ वह अन्धा ही हो जाता है। जादूगर के
जादू की भाँति वह माया से परिपूर्ण है, स्वप्नवत् वह मिथ्या ही परिलक्षित होता है। केले के वृक्ष के अन्तः
भाग की भाँति वह सार रहित है और नट (तमाशा दिखाने वाले) की भाँति वह प्रतिक्षण नवीन से नवीनतम
वेशों को धारण करता रहता है तथा चित्रों से सुसज्जित दीवार की तरह उसका बाह्य आवरण ही सुन्दर रहता
है। इसके पश्चात् यह भी कहा गया है कि शब्द, स्पर्श आदि विषय साररहित हैं। उन सार रहित विषयों में
आसक्त हुआ भूतात्मा स्वयं को ही यथार्थतया स्मरण नहीं रख पाता है ॥ २॥
अयं वाव खल्वस्य प्रतिविधिर्भूतात्मनो यदेव विद्याधिगमस्य धर्मस्यानुचरणं
स्वाश्रमेष्वेवानुक्रमणं स्वधर्म एव सर्वं धत्ते स्तम्बशाखेवेतराण्यनेनोर्ध्वभागभवत्यन्यथाधः
पतत्येष स्वधर्माभिभूतो यो वेदेषु न स्वधर्मातिक्रमेणाश्रमी भवत्याश्रमेष्वेवावस्थितस्तपस्वी
चेत्युच्यत एतदप्युक्तं नातपस्कस्यात्मध्यानेऽधिगमः कर्मशुद्धिर्वेत्येवं ह्याह। तपसा प्राप्यते
सत्त्वं सत्त्वात्संप्राप्यते मनः । मनसा प्राप्यते त्वात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तत इति ॥ ३॥
इस भूतात्मा की मुक्ति का उपाय ब्रह्मा जी इस प्रकार बताते हैं- ज्ञान की प्राप्ति जिस धर्म से हो
सके, ऐसे श्रेष्ठ धर्म का आचरण करना चाहिए तथा अपने आश्रम धर्म का सदा पालन करना चाहिए। अन्य
धर्म तो गुल्म (तृण) की शाखा की भाँति असत्य हैं। अतः वह (भूतात्मा) अपने धर्म के द्वारा ही प्रगति
को प्राप्त करता है, अन्य तरह के धर्मों से तो उसे अवनति की ओर ही जाना पड़ता है। वेद में वर्णित स्वधर्म
का परित्याग करने वाला आश्रमी नहीं कहा जा सकता। जो (व्यक्ति) आश्रम धर्म का निर्वाह करता है,
वही तपस्वी है। यह भी कहा गया है कि जो तपस्वी नहीं है, उसका ध्यान आत्मा में नहीं एकाग्र होता।
इस कारण से उसकी कर्म शुद्धि नहीं हो पाती। तप के माध्यम से ज्ञान की उपलब्धि होती है और ज्ञान की
प्राप्ति होने पर मन अपने वश में हो जाता है। मन के वशीभूत होने पर आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है और
आत्मा की उपलब्धि से इस संसार सागर से मुक्ति मिल जाती है ॥ ३ ॥
[ आश्रम का अर्थ होता है, जहाँ आश्रित-स्थित है। जो चेतना अग्नि में स्थित है, वह अग्नि के अनुरूप धर्म
का पालन करती है, जो जल में अथवा वायु में है; वह उसी के अनुरूप धर्म का पालन करती है। इसी तरह मनुष्य
शरीरस्थ चेतना-आत्मा को मानव धर्म का तथा उसके अन्तर्गत देश, काल, पात्र के अनुरूप धर्म का पालन करना
चाहिए। इसी धर्म पालन रूप तप से कर्मशुद्धि द्वारा मोक्ष का अधिकार बनता है।]
अत्रैते श्लोका भवन्ति-
यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति ।
तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥ क ॥
यहाँ ब्रह्मा जी ने कुछ श्लोकों के द्वारा भी श्रेष्ठ मुनि वालखिल्य जी को समझाने का प्रयास किया है-