सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

प्रपाठक १ मन्त्र ७ ३८३

प्रपाठक १ मन्त्र ७ ३८३
भगवन्नस्थिचर्मस्नायुमज्जामांसशुक्रशोणितश्लेष्माश्श्रुदूषिते
·विण्मूत्रवातपित्तकफसंघाते दुर्गन्धे निःसारेऽस्मिञ्छरीरे किं कामोपभोगैः ॥ २ ॥
हे भगवन् ! यह शरीर हड्डी, त्वचा, स्नायु, मज्जा, मांस, वीर्य, रक्त, अश्रु, विष्ठा, मल, मूत्र, वायु,
पित्त, कफ आदि से परिपूर्ण है। यह शरीर दुर्गन्ध से युक्त एवं तत्त्वरहित है, तब कामनाजन्य भोगों की फिर
क्या आवश्यकता है ? ॥ २ ॥
कामक्रोधलोभभयविषादेर्ष्येष्टवियोगानिष्ट संप्रयोगक्षुत्पिपासांजरामृत्यु-
रोगशोकाद्यैरभिहतेऽस्मिञ्छरीरे किं कामोपभोगैः ॥ ३ ॥
(हे भगवन् !) काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, ईर्ष्या, प्रियवस्तु (पदार्थ) के वियोग तथा
अप्रिय के मिलनजन्य दुःख, क्षुधा-पिपासा, जरा-मरण, शोक आदि से यह शरीर अत्यन्त परेशान रहता है,
ऐसी स्थिति में कामनाओं, उपभोगों की क्या आवश्यकता ? ॥३॥
सर्वं चेदं क्षयिष्णु पश्यामो यथेमे दंशमशकादयस्तृणवनश्यतयोद्भूत-
प्रध्वंसिनः ॥ ४ ॥
(हे भगवन् !) यह सम्पूर्ण संसार क्षण-भङ्गुर है। मनुष्यादि समस्त भूत-प्राणियों को (मैं) निरन्तर
विनष्ट होते हुए देखता रहता हूँ। ऐसे ही अनेकानेक वे सभी क्षुद्र जीव दंश, मच्छर-कीटादि उत्पन्न होकर
कुछ ही समय में काल-कवलित हो जाते हैं ॥ ४ ॥
अथ किमेतैर्वा परेऽन्ये महाधनुर्धराश्चक्रवर्तिनः केचित्सुद्युम्नभूरिद्युम्नेन्द्रद्युम्नकुवलयाश्व
यौवनाश्ववध्रियाश्वाश्वपतिः शशबिन्दुहॅरिश्चन्द्रोऽम्बरीषोऽननूक्तः स्वयातिर्ययातिरनरण्यो-
क्षसेनोत्थमरुत्तभरतप्रभृतयो राजानो मिषतो बन्धुवर्गस्य महतीं श्रियं त्यक्त्वास्माल्लोकादमुं
लोकं प्रयान्ति ॥ ५ ॥
इन (समस्त क्षुद्र जीवों) की क्या गणना, इनसे भिन्न महान् धनुर्धारी, शूरवीर व अन्य और कितने
ही सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, कुवलयाश्व, यौवनाश्व, वध्रियाश्व, अश्वपति, शशबिन्दु, हरिश्चन्द्र, अम्बरीष,
अननूक्त स्वयाति, ययाति, अनरण्य, उक्षसेन, उत्थ, मरुत् और भरत आदि ये सभी चक्रवर्ती नरेश अपने
बान्धवों सहित देखते-देखते ही इस लोक के महान् ऐश्वर्य को त्यागकर अकस्मात् ही शरीर त्यागकर
परलोक के लिए प्रयाण कर गये ॥ ५ ॥
अथ किमेतैर्वा परेऽन्ये गन्धर्वासुरयक्षराक्षसभूतगणपिशाचोरगग्रहादीनां निरोधं
पश्यामः ॥ ६॥
(हे श्रेष्ठ मुने !) मात्र मनुष्य ही नहीं, बल्कि असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत-समुदाय, पिशाच,
सर्प, ग्रह और उपग्रह आदि को भी हम विनष्ट होते हुए देखते हैं ॥६ ॥
अथ किमेतैर्वान्यानां शोषणं महार्णवानां शिखरिणां प्रपतनं ध्रुवस्य प्रचलनं स्थानं वा
तरूणां निमज्जनं पृथिव्याः स्थानादपसरणं सुराणां सोऽहमित्येतद्विधेऽस्मिन्संसारे किं
कामोपभोगैर्यैरेवाश्रितस्यासमृदिहावर्तनं दृश्यत इत्युद्धर्तुमर्हसीत्यन्धोदपानस्थो भेक
इवाहमस्मिन्संसारे भगवंस्त्वं नो गतिस्त्वं नो गतिः ॥ ७ ॥

३८४ मैत्रायण्युपनिषद्
इसके पश्चात् (राजा बृहद्रथ ने उन श्रेष्ठ मुनि शाकायन्य से कहा-) हे भगवन् ! यदि इन (चेतन
प्राणियों) को भी छोड़ दें, तब भी अचेतन वस्तुओं में भी जैसे, बड़े-बड़े सागर शुष्क हो जाते हैं, पर्वत -
शृङ्खलाएँ विशृङ्खलित हो जाती हैं, ध्रुव प्रदेश भी अपने स्थान पर केन्द्रित नहीं रह पाते, वृक्ष भी धराशायी
हो जाते हैं, पृथ्वी भी अपने एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सकती, समस्त देवगण भी अपने पद से च्युत होते
देखे जाते हैं; तब फिर ऐसी स्थिति में इस अहंकार से युक्त नश्वर संसार में विषय-वासनाओं के भोगों में
आसक्त रहने वाले तो बारम्बार इस नश्वर जगत् में जन्म-मरण के चक्र में आबद्ध हुए - से दृष्टिगोचर होते
हैं। इस कारण हे श्रेष्ठ मुने ! इस अज्ञानान्धकार रूपी कूप में स्थित मण्डूक (मेंढक) की भाँति इस नश्वर
जगत् में मैं भी पतितावस्था में स्थित हूँ। कृपया आप मुझे अपनी गति प्रदान करें अर्थात् मेरा उद्धार करें।
मैं आपकी ही शरण में हूँ। आप ही एक मात्र हमारे आधार हैं॥ ७॥
॥ द्वितीयः प्रपाठकः॥
अथ भगवाञ्छाकायन्यः सुप्रीतोऽब्रवीद्राजानं महाराज बृहद्रथेक्ष्वाकुवंशध्व-
जशीर्षात्मजः कृतकृत्यस्त्वं मरुन्नाम्नो विश्रुतोऽसीत्ययं वाव खल्वात्मा ते कतमो
भगवान्वर्ण्य इति तं होवाचेति ॥ १॥
तत्पश्चात् यह (राजा बृहद्रथ की गाथा को) सुनकर श्रेष्ठ मुनि शाकायन्य ने अति प्रसन्न होकर
कहा- हे महाराज बृहद्रथ ! तुम इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न नरेश ध्वजशीर्ष के पुत्र हो। तुम सभी तरह से
कृतकृत्य होते हुए 'मरुत्' के नाम से प्रख्यात हो। यह आत्मा क्या एवं कैसा है? मैं अब तुम्हें इसके
सारतत्त्व को बताने का प्रयास करता हूँ। राजा बृहद्रथ ने कहा- हे श्रेष्ठ मुने ! आप मुझे तत्सम्बन्धित विषय
के सन्दर्भ में अवश्य ही बताने की कृपा करें॥ १॥
अथ य एषो बाह्यावष्टम्भनेनोर्ध्वमुत्क्रान्तो व्यथमानोऽव्यथमानस्तमः प्रणुदत्येष
आत्मेत्याह भगवानथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन
रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति ॥ २॥
तदनन्तर महर्षि कहने लगे- हे राजन् ! बाह्य इन्द्रियों का निरोध करने से (उन्हें अन्तर्मुखी बताने से)
प्राणतत्त्व रूपी यह आत्मा योग के माध्यम से ऊर्ध्व की ओर गमन करता है। वह दुःख रूप प्रतिभासित होते
हुए भी वास्तव में दुःखरहित है तथा अज्ञानरूप अन्धकार को विनष्ट करने में समर्थ है। यही आत्मा इस
नश्वर शरीर से बहिर्गमन करने पर परम ज्योतिस्वरूप परमात्मतत्त्व को वरण करके स्वयमेव अपने स्वरूप
में विलीन हो जाता है। यह आत्मतत्त्व अमृतयुक्त, भयरहित तथा स्वयं ही ब्रह्मरूप है॥ २॥
अथ खल्वियं ब्रह्मविद्या सर्वोपनिषद्विद्या वा राजन्नस्माकं भगवता मैत्रेयेण
व्याख्याताहं ते कथयिष्यामीत्यथापहतपाप्मानस्तिग्मतेजस ऊर्ध्वरेतसो वालखिल्या इति
श्रूयन्तेऽथैते प्रजापतिमब्रुवन्भगवञ्छकटमिवाचेतनमिदं शरीरं कस्यैष खल्वीदृशो
महिमातीन्द्रियभूतस्य येनैतद्विधमिदं चेतनवत्प्रतिष्ठापितं प्रचोदयितास्य को भगवन्ने-
तदस्माकं ब्रूहीति तान्होवाच ॥ ३॥