१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१
अध्याय ८ खण्ड ९ मन्त्र २ १९१
प्राप्त किये बिना अर्थात् उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार किये बिना ही जा रहे हैं। देव हों अथवा असुर जो
भी आत्मा के सम्बन्ध में ऐसा सोचने वाले होंगे, उनका पतन अवश्य होगा। उस विरोचन ने शान्त भाव से
असुरों के सम्मुख जाकर प्रजापति के द्वारा बतायी हुई आत्म विद्या को कह सुनाया। उसने कहा- इस
लोक में यह (देह ही) आत्मा है तथा आत्मा ही सेवा के योग्य है। आत्मा की सेवा एवं परिचर्या करने
वाला पुरुष इहलोक एवं परलोक दोनों को प्राप्त कर लेता है ॥ ४॥
तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणाꣳ ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य
शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५॥
यही कारण है कि संसार में जो (व्यक्ति) दान नहीं देता, श्रद्धा नहीं रखता और न ही यजन करता
है, उसे श्रेष्ठ जन इस प्रकार कहते हैं- अरे यह तो आसुरी वृत्ति वाला है। यह उपनिषद् (विद्या) असुरों की
ही है। वे ही मृत व्यक्ति के शरीर को (गन्ध-पुष्प-अन्न आदि) भिक्षा, वस्त्र एवं आभूषणों से विभूषित
करते हैं। इसके द्वारा ही हम स्वर्गलोक को प्राप्त करेंगे-ऐसा मानते हैं ॥ ५॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते
साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति
स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं
पश्यामीति ॥ १ ॥
जब तक इन्द्रदेव देवों के पास पहुँचें, इससे पूर्व उन्हें (यथार्थ बोध से) यह भय प्रकट हुआ कि
जिस प्रकार इस शरीर के अलंकृत किये जाने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है, वस्त्रों से सुसज्जित
होने पर वह भी सज्जित होता है और परिष्कृत किये जाने पर वह भी परिष्कृत होता है, उसी प्रकार इस
शरीर के अन्धे हो जाने पर प्रतिबिम्ब शरीर भी अन्धा हो जाता है, स्राम (विकार स्रावित करने वाला) होने
पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट हो
जाता है, अतः इस प्रतिबिम्ब शरीर में मुझे कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ १ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तꣳ ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं
विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे
साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायम-
स्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
तब इन्द्रदेव पुनः समिधा हाथ में लेकर प्रजापति के सम्मुख उपस्थित हुए। उनसे प्रजापति ने पूछा- हे इन्द्र! तुम
तो विरोचन के साथ हृदय से सन्तुष्ट हो गये थे, अब फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा- भगवन्! जिस प्रकार
इस शरीर के अलंकृत होने पर इसका प्रतिबिम्ब भी अलंकृत होता है। सुन्दर वस्त्रों से सज्जित किये जाने पर वह भी
सज्जित होता है। स्वच्छ किये जाने पर वह भी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार इसके अंधे होने पर वह भी अन्धा होता
है, स्राम होने पर स्राम हो जाता है, अपङ्ग होने पर अपङ्ग हो जाता है तथा इस शरीर के नष्ट होने पर वह भी विनष्ट
हो जाता है, अतएव मुझे इसमें कुछ भी भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) नहीं दिखाई पड़ता ॥ २ ॥
१९२ छान्दोग्योपनिषद
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं
वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ३ ॥
देव प्रजापति ने इन्द्रदेव से कहा- हे इन्द्र ! यह यथार्थ तथ्य ऐसा ही है, मैं तुम्हारे लिए इसकी व्याख्या
आगे करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और वास करो। तब इन्द्रदेव ने वहाँ बत्तीस वर्ष व्यतीत किये। फिर
प्रजापति ने उन्हें उपदेश दिया॥ ३॥
॥ दशमः खण्डः ॥
य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह
शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः
स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥
'जो स्वप्न में भी विचरणशील तत्त्व है, जो अत्यन्त पूज्यमान आत्मा है, वही अविनाशी, अभय और
ब्रह्म है।' इन वचनों से संतुष्ट होकर शान्त हृदय से इन्द्रदेव चले गये; परन्तु देवों तक पहुँचने के पूर्व उनमें
(यथार्थ बोध से) भय व्याप्त हुआ। यद्यपि यह शरीर अन्धा होता है, परन्तु वह स्वप्न शरीर (अन्तर्मन)
अनन्ध होता है और यह स्राम होता है, तो वह अस्राम रहता है। शरीर के दोषों से वह दोष मुक्त रहता है॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव
भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
वह इस देह के वध से विनष्ट भी नहीं होता और वह इसकी स्रामता से स्राम भी नहीं होता; किन्तु
स्वप्न में भी ऐसा भान होता है कि कोई उसे मार रहा है, तिरस्कृत कर रहा है अथवा वह शोक कर रहा
है अथवा वह रो रहा है, अतएव इसमें मुझे भोगने योग्य (श्रेष्ठ प्रतिफल) कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्द्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः
किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति
यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥
वे (इन्द्रदेव) पुनः देव प्रजापति के पास हाथ में समिधा लेकर आये। देव प्रजापति ने उनसे कहा-
हे इन्द्र ! तुम तो यहाँ से सन्तुष्ट होकर शान्त हृदय से गये थे, फिर किस इच्छा से लौटे हो? उन्होंने कहा-
भगवन्! यद्यपि यह शरीर अंधा होता है, तो भी वह (स्वप्न में विचरणशील अन्तर्मन) अनन्ध रहता है और
यह स्राम होता है, तो भी वह अस्राम रहता है। इस प्रकार वह शरीर के दोषों से दोषमुक्त ही रहता है॥३॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव
भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते
भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं
वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥ ४॥
इसके वध से उसका वध नहीं होता है और इसकी स्रामता से वह स्राम नहीं होता; परन्तु ऐसा
अनुभव होता है कि कोई उसे मारता है, तिरस्कृत करता है, वह शोक करता है अथवा रोदन करता है।