सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ७ खण्ड ७ मन्त्र १ १७३

अध्याय ७ खण्ड ७ मन्त्र १ १७३
॥ षष्ठः खण्डः ॥
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव
द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महत्तां
प्राप्नुवन्ति ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ
ये प्रभवो ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) चित्त से उत्कृष्टतम स्थिति ध्यान की है। (ऐसा प्रतीत होता है कि) मानो पृथिवी ध्यान
करती है, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक भी मानो ध्यान में रत हैं, जल और पर्वत भी मानो ध्यान में तल्लीन हैं, देवता
और मानव भी मानो ध्यान करते हैं। इसलिए जो भी यहाँ पुरुषों में महानता को प्राप्त किये हुए हैं, वे भी
शायद ध्यान के द्वारा अर्जित किये हुए लाभ का अंश प्राप्त करते हैं; किन्तु जो संकीर्ण विचार के होते हैं,
वे कलह करने वाले, चुगलखोर और दूसरों के समक्ष ही उनकी निन्दा करने वाले होते हैं। साथ ही जो
सामर्थ्य से युक्त हैं, वे लोग भी ध्यान के ही लाभ का अंश अर्जित करने वाले हैं। अतः (हे नारद!) तुम
ध्यान की ही उपासना करो ॥ १ ॥
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
(हे नारद!) जो व्यक्ति ध्यान को 'यह ब्रह्म ही है', इस प्रकार से समझकर उसकी उपासना करता
है, उसकी स्वेच्छानुसार गति ध्यान की गति के समान ही हो जाती है। (ऐसा सुनकर नारद जी ने पूछा)
हे भगवन्! क्या ध्यान मे भी श्रेष्ठ कुछ है? (तब सनत्कुमार जी ने कहा-) हाँ, ध्यान से भी श्रेष्ठ है। (नारद
जी ने कहा-) हे भगवन्! कृपया उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ सप्तमः खण्डः ॥
विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदꣳसामवेदमाथर्वणं
चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां
ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳ सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं
चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाꣳश्च मनुष्याꣳश्च पशूꣳश्च वयाꣳसि च तृणवनस्पती-
ञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं
चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥
(हे नारद!) ध्यान से भी अधिक श्रेष्ठ 'विज्ञान' है। विज्ञान द्वारा ही मनुष्य ऋग्वेद को जानता
है। यजुर्वेद, सामवेद और चतुर्थ अथर्ववेद, पञ्चम वेद इतिहास-पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प,
गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या,
धनुर्वेद, ज्योतिष, सर्पविद्या, शिल्पविद्या, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य,
पशु-पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, कीट-पतंग, पिपीलिका पर्यन्त समस्त जीव, धर्म, अधर्म, सत्य,
असत्य, साधु, असाधु, मनोज्ञ, अमनोज्ञ, अन्न, रस तथा इहलोक एवं परलोक आदि को विज्ञान द्वारा
ही जाना जाता है। (इसलिए हे नारद!) तुम विज्ञान की ही उपासना करो ॥ १ ॥

१७४ छान्दोग्योपनिषद्
स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभिसिद्ध्यति
यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो
विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥
(हे नारद!) जो (व्यक्ति) विज्ञान की ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह व्यक्ति श्रेष्ठ विज्ञान और
ज्ञान वाले लोकों को प्राप्त कर लेता है। जहाँ तक विज्ञान का सम्बन्ध है, वहाँ तक उसकी यथेच्छगति होती
है। नारद जी ने कहा- हे भगवन् ! क्या विज्ञान से भी श्रेष्ठ कुछ है? सनत्कुमार ने कहा- हाँ है। नारद जी
ने कहा- भगवन् ! मुझे उसी श्रेष्ठ तत्त्व का उपदेश करने की कृपा करें ॥ २ ॥
॥ अष्टमः खण्डः ॥
बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते। स यदा
बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन्परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन्द्रष्टा
भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति। बलेन वै
पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च
वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गऽपिपीलकं बलेन लोकस्तिष्ठति
बलमुपास्स्वेति ॥ १॥
(हे नारद!) बल विज्ञान से भी अधिक श्रेष्ठ है। सौ विज्ञानवेत्ताओं को एक बलवान् व्यक्ति कँपा देता
है। जिस समय यह मनुष्य बल-सम्पन्न होता है, तभी उठने वाला भी होता है और जब उठता है, तो वह
सेवा-शुश्रूषा करने वाला होता है, जब सेवा-शुश्रूषा वाला होता है, तो समीप जाने वाला होता है, समीप
पहुँचने से दर्शन, श्रवण, मनन, जानने, अनुष्ठान एवं अनुभव करने वाला होता है। बल से ही पृथिवी स्थित
है, बल से ही अन्तरिक्ष, बल से ही द्युलोक, बल से ही पर्वत, देवता और मनुष्य, बल से ही पशु-पक्षी,
तृण वनस्पति, श्वापद और कीट- पतंग एवं पिपीलिका पर्यन्त समस्त प्राणि-समुदाय स्थित हैं तथा बल से
ही लोक स्थित है। इसलिए हे नारद ! तुम बल की उपासना करो ॥ १ ॥
सं यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं
ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥
(हे नारद!) जो (व्यक्ति) बल को ब्रह्म के रूप में जानकर उसकी उपासना करता है, तो जहाँ तक
बल की गति है, वहाँ तक उस (व्यक्ति) की स्वेच्छा गति हो जाती है। (तब नारद जी ने पूछा-) क्या बल
से अधिक भी कुछ है ? (सनत्कुमार ने कहा-) बल से भी श्रेष्ठ है। (नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! कृपा
करके मेरे प्रति उसी श्रेष्ठ तत्त्व का वर्णन करें ॥ २ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्रीयाद्यद्युह जीवेदथवाद्रष्टाऽश्रोता -
मन्ताबोद्धाकर्ताविज्ञाता भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा
भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
(हे नारद!) अन्न बल से अधिक श्रेष्ठ है। यदि कोई व्यक्ति दस दिन तक भोजन न ग्रहण करे और