१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र १९ ३५३
अध्याय ६ ब्राह्मण ४ मन्त्र १९ ३५३
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्ग्लो जायेत द्वौ वेदावनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति
दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥
जिनकी यह आकांक्षा हो कि वे पिङ्गल वर्ण, दो वेदों के ज्ञाता और शतायु पुत्र की प्राप्ति करें, वे
(दम्पती) दही में चावल का मिश्रण करके पकाएँ और उसमें घी मिश्रित करके खायें, इससे वे उपर्युक्त
गुणों से सम्पन्न पुत्र प्राप्ति में समर्थ होते हैं ॥ १५ ॥
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन्वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरि-
यादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥
जिन्हें श्याम वर्ण, अरुण नेत्र और तीन वेदों के ज्ञाता पुत्र की अपेक्षा हो, वे दम्पती जल में चावल
मिलाकर भात ( ओदन ) पकाएँ और उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इससे वे उपर्युक्त गुणों वाले पुत्र प्राप्त
करने में सक्षम होते हैं ॥ १६ ॥
अथ य इच्छेद्दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा
सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७॥
जिन्हें विदुषी और पूर्णायुष्य वाली पुत्री की कामना हो, वे दम्पती तिल और चावल की खिचड़ी
बनाकर उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इससे वे उपर्युक्त गुणसम्पन्न पुत्री की प्राप्ति में समर्थ हो जाते हैं ॥
अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत
सर्वान्वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति मांः सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ
जनयितवा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥
जिनकी यह इच्छा हो कि मेरा पुत्र प्रख्यात विद्वान्, विद्वानों की सभा में सम्मान पाने वाला कुशल
वक्ता , प्रियभाषी और सभी वेदों का ज्ञाता और शतायु हो, वे दम्पती उक्षा या ऋषभ नामक ओषधि के गूदे
और चावल का भात (खिचड़ी) पकाकर उसमें घृत मिलाकर सेवन करें। इस क्रिया से वे उपर्युक्त गुण
सम्पन्न पुत्र प्राप्ति में सक्षम होते हैं ॥ १८ ॥
अथाभिप्रतरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये
स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः
प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रििरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ
प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥ १९ ॥
इसके पश्चात् चौथे दिन प्रातः (पत्नी द्वारा कूटे हुए चावल से) स्थाली पाक पद्धति से घृत को
संस्कारित करके, इन मन्त्रों के साथ आहुतियाँ प्रदान करे- अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, देवाय सवित्रे
सत्यप्रसवाय स्वाहा। तत्पश्चात् 'स्विष्टकृत् होमः' के अनन्तर अवशिष्ट चरु को पहले स्वयं ग्रहण करे और
बाद में (बचा हुआ) पत्नी को खिला दे। फिर जल से पूरित पात्र को लेकर उस जल से तीन बार पत्नी का
अभिषेक करे। अभिषेक करते हुए कहे- हे विश्वपोषक! सुयोग्य पुत्र की कामना करने वाली यह स्त्री,
हर्ष युक्त होकर पति के साथ संयोजित हो ॥ १९ ॥
३५४ बृहदारण्यकोपनिषद्
अथैनामभिपद्यतेऽमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहं सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं
पृथिवी त्वं तावेहि सँरभावहै सह रेतो दधावहै पुँसे पुत्राय वित्तय इति ॥ २० ॥
इसके बाद इच्छित सन्तान के अनुरूप (विधान-वाली) खीर पत्नी को खिलाने के बाद शयनकाल
आ जाने पर पत्नी का आलिङ्गन करता हुआ कहे- हे देवी! मैं प्राण हूँ और तुम वाक् हो, मैं साम हूँ, तुम
ऋक् हो; मैं द्यौ हूँ और तुम पृथिवी हो; अतः आओ हम दोनों पुत्र रूपी धन प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करें ॥
अथास्या ऊरू विहापयति विजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन
मुखँ संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिँशतु ।
आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते । गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके । गर्भं
ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् स्त्री के ऊरुद्वय को पृथक् करके गर्भाधान कृत्य में दोनों (पति-पत्नी) के नियोजित हो जाने
पर पुरुष कहे-हे प्रिये! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तुम्हारे गर्भाशय को समर्थ बनाएँ, जिससे तुम श्रेष्ठ पुत्र
को जन्म दे सको। भगवान् त्वष्टा (भावी सन्तति के) अङ्गों को पुष्ट और सुन्दर बनाएँ। भगवान् प्रजापति
मुझमें स्थित होकर तुम्हारे अन्दर वीर्याधान करें। भगवान् धाता तुम्हारे अन्दर गर्भ धारण करें और उसे
पोषित करें। हे देवि! तुम स्वयं सिनीवाली हो, अतः गर्भधारण करो, गर्भ धारण करो। अश्विद्वय स्वयं मेरे
अन्दर स्थित होकर अपने रश्मि रूपी कमलों की माला को धारण कर तुम्हारे अन्दर गर्भाधान करें॥ २१ ॥
हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ । तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये ।
यथाऽग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी। वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि
तेऽसाविति ॥ २२ ॥
दो ज्योतिर्मयी अरणियों से अश्विनीकुमारों ने मन्थन किया था। उस मन्थन से अमृतस्वरूप गर्भ
(अग्नि) का प्राकट्य हुआ था। उसी प्रकार हे देवि! उस अमृत स्वरूप गर्भ को हम तेरे अन्दर स्थापित
करते हैं, जिससे तुम दशम मास में इसे उत्पन्न कर सको। जिस प्रकार पृथिवी अग्नि को गर्भरूप में धारण
किए हैं, द्यौ इन्द्र को धारण किये हैं, दिशाएँ वायु को धारण किये हैं, उसी प्रकार हे देवि ! तुझमें पुत्र रूप
गर्भ प्रतिष्ठित करता हूँ॥ २२ ॥
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति यथा वायुः पुष्करिणीँसमिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ
एजतु सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि
गर्भेण सावराँसहेति ॥ २३ ॥
प्रसवकाल में गर्भिणी स्त्री का अभिमन्त्रित जल से सिंचन करे और कहे-जिस प्रकार वायु
पोखरी (सरोवर) के जल को चञ्चल कर देता है, उसी प्रकार हे देवि ! तेरा भी यह गर्भ चञ्चल
हो जाए और जरायु सहित बहिर्गमन करे। जीव का यह पथ जरायुयुक्त और अवरोध रहित है। हे
जीवात्मन् ! तुम गर्भ आवरण सहित बाहर निकलो ॥ २३ ॥