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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५

अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५
॥ द्वाविंशः खण्डः ॥
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥
तत्पश्चात् चतुर्थ आहुति 'समानाय स्वाहा' मन्त्र के साथ देनी चाहिए। इससे 'समान' तृप्त होता है ॥
समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति
विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया
पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
समान के तृप्त होते ही मन को तृप्ति मिलती है, मन के तृप्त होते ही पर्जन्य तृप्त होता है और पर्जन्य
के तृप्त होने पर विद्युत् को तृप्ति प्राप्त होती है। विद्युत् के तृप्त होने पर वह स्वयं भी तृप्त हो जाता है, जिस
पर पर्जन्य एवं विद्युत् आश्रित हैं। उसकी तृप्ति के पश्चात् प्रजा, पशु, अन्न के साथ तेज एवं ब्रह्मतेज द्वारा
उपभोग करने वाला (भोक्ता) भी तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥
॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥
तदनन्तर पाँचवीं आहुति समर्पित की जाए। यह आहुति 'उदानाय स्वाहा' मंत्र से देनी चाहिए। इस
प्रकार के यजन कृत्य से उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥
उदाने तृप्यति त्वक् तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाश-
स्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति
प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥
तदनन्तर उदान के तृप्त होने से त्वचा की तृप्ति होती है, त्वचा के तृप्त होने से वायु तृप्त होता है, वायु
के तृप्त होने पर आकाश को तृप्ति मिलती है और आकाश के तृप्त होने से जिस किसी पर वायु और आकाश
(स्वामिभाव से) स्थित होते हैं, वह निश्चय ही तृप्त हो जाता है। उसके तृप्त होने पर वह स्वयं भोक्ता
(भोजन करने वाला) प्रजा, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज द्वारा तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥
॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥
स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥
जो कोई इस उपर्युक्त वैश्वानर विद्या को बिना जाने ही यजन कृत्य करता है, उसके द्वारा किया हुआ
यजन कृत्य ठीक उसी प्रकार है, जैसे कि आग के अंगारों को हटाकर भस्म में किया गया यज्ञ कार्य ॥ १ ॥
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु
हुतं भवति ॥ २ ॥
उपर्युक्त बताये हुए क्रम के अनुसार जो इस वैश्वानर विद्या को भली-भाँति जानकर यज्ञ कार्य
(अग्निहोत्र) सम्पन्न करता है, उसके द्वारा सभी लोक, समस्त प्राणिसमुदाय एवं सम्पूर्ण आत्माओं के
निमित्त यजन कार्य सम्पन्न हो जाता है ॥ २ ॥
तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं
विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥

१५६ छान्दोग्योपनिषद्
इस सन्दर्भ में यह उल्लेख भी है कि जिस तरह सींक का अग्रभाग अग्नि में प्रवेश करा देने से
अतिशीघ्र जल जाता है, ठीक उसी तरह से जो यजमान इस भाँति जानने में समर्थ होकर यज्ञ कृत्य सम्पन्न
करता है, उसके सभी प्रकार के पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे
हुतꣳस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥
इस विद्या का जानकार यदि भोजन से उच्छिष्ट (बचा हुआ) पदार्थ चाण्डाल को दे, तो वह कृत्य
आत्मा रूप वैश्वानर में यज्ञ करने के समान है। प्रस्तुत विषय में यह मन्त्र कहा गया है॥ ४ ॥
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवꣳसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत
इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥ ५ ॥
जिस भाँति इस संसार में क्षुधित बालक सब प्रकार से माँ की उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं। ठीक उसी
भाँति संसार के समस्त प्राणि-समुदाय इस ज्ञानी के हव्य रूप यजन कृत्य की उपासना करते हैं ॥ ५ ॥
॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
पाँचवें अध्याय में यह बताया गया है कि अग्निहोत्र के यथार्थ स्वरूप की जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ
के कार्य से सभी प्राणि-समुदाय तृप्त हो जाते हैं; किन्तु ऐसी सम्भावना तभी की जा सकती है, जब समस्त प्राणियों
में एक ही आत्मा का आधिपत्य स्थापित हो। प्रस्तुत विषय का विस्तार से इस छठे अध्याय में उल्लेख किया गया है-
श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै
सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
अरुण के पौत्र श्वेतकेतु को उसके पिता (उद्दालक) ने ब्रह्मचर्य के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए
उसे ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश की अनुमति प्रदान की। उसके पिता ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि हमारे
वंश में जन्म लेने वाला कोई भी बालक ब्रह्म विद्या के अध्ययन के बिना ब्रह्मबन्धु की भाँति नहीं होता ॥
[ ब्रह्म बन्धु उसे कहते हैं, जो ब्राह्मणों जैसा आचरण नहीं कर पाता; किन्तु उनसे सम्बद्ध होता है। ऋषि के
कथन का भाव है कि उनके कुल में सभी आचरण निष्ठा ब्रह्मज्ञ होते हैं। ]
स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध
एयाय तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥
इस प्रकार से उसके पिता द्वारा उपदेश दिये जाने पर श्वेतकेतु ने मात्र १२ वर्ष की उम्र में ही अपने
आचार्य के सान्निध्य में उपस्थित रहकर २४ वर्ष की उम्र तक वेदों का अध्ययन-अनुशीलन किया।
तत्पश्चात् वह स्वयं को बड़ा अध्ययनरत एवं विद्वान् अनुभव करते हुए स्वाभिमान के साथ पिता के सामने
उपस्थित हुआ। पिता ने विपरीत स्वभाव वाले उद्दण्ड श्वेतकेतु से कहा- “क्या तुमने अपने आचार्य से
परब्रह्म का उपदेश (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है।" ॥ २ ॥
येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। कथं नु भगवः स आदेशो
भवतीति ॥ ३ ॥