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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१

अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१
नाम से प्रसिद्ध श्रेष्ठ तेज युक्त वैश्वानर रूप आत्मा ही है, इसीलिए आपके कुल में सुत (अभिषुत सोम),
प्रसूत (विशेषरूप से अभिषुत सोम) और आसुत (सर्वतोभावेन अभिषुत सोम) दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात्
आपके परिवारी जन बड़े ही कर्मनिष्ठ (यज्ञनिष्ठ) हैं ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं
वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
राजा अश्वपति ने इसी क्रम में आगे फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण करते हैं और पुत्र-पौत्रादि
अपने प्रिय को देखते हैं। जो भी इस वैश्वानर रूप आत्मा की इस प्रकार उपासना करते हैं, वे अन्न का
भक्षण और अपने श्रेष्ठ इष्ट का दर्शन करते हुए अपने कुल में ब्रह्मतेज से युक्त होते हैं। राजा ने यह भी कहा
कि 'यदि आप हमारे पास न आये होते, तो आपका मस्तक गिर जाता' ॥ २ ॥
॥ त्रयोदशः खण्डः ॥
अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलूषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव
भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव
बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
तत्पश्चात् राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से प्रश्न किया कि हे प्राचीन योग्य ! आप किस आत्मा की
उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य भगवन् ! मैं आदित्य की उपासना करता हूँ।
राजा ने आश्वस्त होते हुए कहा कि अवश्य ही वह विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिसकी कि आप स्वयं
उपासना करते हैं। यही कारण है कि आपके वंश में पर्याप्त मात्रा में विश्वरूप साधन दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १ ॥
प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य
ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्टे तदात्मन इति होवाचान्धो-
ऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
राजा ने कहा कि आपके पास हार से सुसज्जित दासियाँ एवं खच्चरों से जुता हुआ रथ भी विद्यमान
है। आप अन्न का भक्षण और प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं। ऐसे श्रेष्ठ वंश में ब्रह्मतेज का निवास रहता है,
लेकिन यह आत्मा का ही चक्षु है। राजा अश्वपति ने पुनः कहा कि यदि आप मेरे पास न आये होते, तो
निश्चित ही अपने दोनों नेत्रों से रहित हो जाते ॥ २ ॥
॥ चतुर्दशः खण्डः ॥
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो
राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय
आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥
इसके बाद राजा अश्वपति ने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्न से पूछा कि- हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा
की उपासना करते हैं ? उसने कहा- 'हे भगवन् ! मैं वायुदेव की उपासना करता हूँ।' राजा ने पुनः
कहा कि आप जिस श्रेष्ठ आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा (अलग-अलग
मार्गों वाला आवह, उद्वह आदि भेदों से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इस कारण से आपके पास भिन्न-
भिन्न (अन्न, वस्त्र आदि) उपहार आते हैं तथा आपके पीछे अलग-अलग रथ की श्रेणियाँ चलती हैं ॥ १ ॥

१५२ छान्दोग्योपनिषद
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं
वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥
राजा ने उस ऋषि कुमार से कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं।
जो भी कोई उचित रीति से इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह प्रिय का दर्शन एवं अन्न का
भक्षण करता है तथा उसके कुल में ब्रह्मतेज का निवास रहता है। यह आत्मा का प्राण ही है, ऐसा कहते
हुए राजा अश्वपति ने कहा कि यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका प्राण ही निकल जाता' ॥ २ ॥
॥ पञ्चदशः खण्डः॥
अथ होवाच जनः शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष
वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥
इसके अनन्तर राजा अश्वपति ने शार्कराक्ष के पुत्र जन से कहा- हे शार्कराक्ष्य! आप किस आत्मा की
उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य राजन्! मैं आकाश तत्त्व की ही उपासना करता
हूँ। राजा ने पुन: कहा कि यह निश्चय ही बहुल संज्ञक (विभिन्न संज्ञाओं से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इसी
से आप पुत्र -पौत्रादि के रूप में प्रजा और स्वर्णादि धन से परिपूर्ण हैं ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं
वैश्वानरमुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥
राजा ने फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय अर्थात् इष्ट का दर्शन करते हैं। जो इस वैश्वानर
आत्मा की इस भाँति से उपासना करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है और उसके कुल में
ब्रह्मतेज का निवास होता है। यह आत्मा का उदर (शरीर का मध्य भाग) ही है। आगे राजा अश्वपति ने यह भी कहा
कि 'यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका संदेह (शरीर का मध्य भाग अर्थात् उदर) ही नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥
॥ षोडशः खण्डः॥
अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो
राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ
रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥
इसके पश्चात् राजा अश्वपति ने बुडिल से प्रश्न किया कि हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना
करते हैं ? तब उन ऋषि कुमार ने कहा- हे पूज्य भगवन् ! मैं तो जल तत्त्व की उपासना करता हूँ। राजा
ने पुन: कहा कि 'आप जिस जल तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही रयिवान् (धनवान् ) वैश्वानर
आत्मा है। इसी कारण आप (धनवान्) रयिमान् एवं पुष्टिमान् हैं ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं
वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥
आप अन्न का भक्षण एवं प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य इस वैश्वानर रूप आत्मा की
उपासना इस तरह से करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है। उसके कुटुम्ब में ब्रह्मतेज
का सान्निध्य होता है, किन्तु यह आत्मा का बस्ति (मूत्राशय) ही है। राजा अश्वपति ने यह भी कहा कि
'यदि आप हमारे पास न आते. तो आपका बस्ति स्थान (मत्राशय) ही फटकर नष्ट हो जाता' ॥२॥