सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ५ खण्ड ११ मन्त्र ३ १४९

अध्याय ५ खण्ड ११ मन्त्र ३ १४९
वे प्राणी जो इनसे पूर्व कहे गये किसी अन्य मार्ग से गमन नहीं करते है, वे सभी (निम्न प्राणी मच्छर
और कीड़े-मकोड़े आदि) बारम्बार जन्मने-मरने वाले प्राणी ही होते है। जीवन धारण करना और शरीर
त्याग करना ही उनका मुख्य तृतीय स्थान कहा गया है। इसलिए इस प्रकार की सांसारिक गति में
अत्यधिक आसक्ति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार घोर संसाररूपी महासागर से पतन को रक्षा स्वयं करने
के लिए उद्यत होना चाहिए। इसी हेतु पञ्चाग्नि विद्या को प्रार्थना के लिए यह श्लोक प्रयुक्त किया गया है॥
स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबँश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा च। एते पतन्ति चत्वारः
पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ॥ ९ ॥
सोने (स्वर्ण) का हरण करने वाले, मद्यपान करने वाले, गुरु को स्त्री से गमन करने वाले, ब्रह्म विद्या
को जानने वालों की हत्या करने वाले - ये चार प्रकार के कृत्य व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं और
पाँचवाँ कारण उन सभी के साथ किया गया संसर्ग (व्यवहार या आचरण) है॥ ९॥
अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न स ह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः
पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १०॥
इस प्रकार से उपर्युक्त मन्त्रों में कही गई पञ्चाग्नि विद्या के महत्त्व को जो जानने में समर्थ है, वह
उन सभी (लौकिक कर्मों) के साथ व्यवहार (संसर्ग) करता हुआ भी पापकृत कार्यों में लिप्त नहीं होता।
इस विद्या को जो जानता है, वह श्रेष्ठ, शुद्ध और पवित्र पुण्यलोक का अधिकारी होता है॥ १०॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो
बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसां चक्रुः को नु
आत्मा किं ब्रह्मेति ॥ १॥
प्राचीनशाल के नाम से प्रख्यात उपमन्यु के पुत्र औपमन्यव, पुलुष के पुत्र पौलुषि, जो सत्ययज्ञ के
नाम से जाने जाते है, भल्लवि के पुत्र भाल्लवि और उसका पुत्र भाल्लवेय जो इन्द्रद्युम्न के नाम से प्रतिष्ठित है,
शर्कराक्ष का पुत्र जन शार्कराक्ष्य और अश्वतराश्व का पुत्र बुडिल-ये पाँचों सद्गृहस्थ शास्त्र अध्ययन और
सदाचार से युक्त आपस में विचार विमर्श करने लगे कि हमारी आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १॥
ते ह संपाद्यांचक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति
तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥
विचार विमर्श करने के उपरान्त भी जब किसी ठोस निश्चय पर नहीं पहुँचे, तब उन पूज्य जनों ने
अपना उपदेशक नियुक्त किया कि इस समय यह अरुण का पुत्र उद्दालक ही इस वैश्वानर आत्मा को भली-
भाँति जानता है, इसलिए हम सभी उसी के पास चलें। ऐसा सोचकर वे सभी आरुणि के पास आये ॥ २ ॥
स ह संपाद्यांचकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव
प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥
इस प्रकार आरुणि ने उन महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय जनों को देखकर यह निश्चय किया कि मैं
इनको पूर्णरूपेण आश्वस्त नहीं कर सकता, ऐसा अपने मन में निश्चय करते हुए उसने उन सभी को दूसरा
अन्य उपदेष्टा बतला दिया ॥ ३ ॥

१५० छान्दोग्योपनिषद्
[ उस समय कोई भी जानकार होने का दम्भ नहीं करता था। स्वयं की कमियाँ अपने प्रशंसकों के बीच भी
स्वीकार करके, योग्य पुरुषों के सान्निध्य लाभ का प्रयास किया जाता था। ]
तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्यति तग्
हन्ताभ्यागच्छामेति तग् हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् आरुणि ने उनसे कहा कि हे पूजनीय गण ! इस समय केकय के पुत्र कैकेय कुमार अश्वपति
इस आत्मरूप वैश्वानर को पूर्णरूपेण जानते हैं। अतः हम सब उन्हीं के पास चलें। इस प्रकार कहते हुए वे
सभी श्रेष्ठ महागृहस्थ एवं परम श्रोत्रिय कैकेय कुमार (अश्वपति) के पास चले गये ॥ ४ ॥
तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयांचकार स ह प्रातःसंजिहान उवाच न मे स्तेनो
जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै
भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु
भगवन्त इति ॥ ५ ॥
राजा अश्वपति ने अपने पास उपस्थित हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियों का अलग-अलग स्वागत-सत्कार
किया। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजा अश्वपति ने उनसे कहा कि 'मेरे राज्य में न कोई चोर है, न कोई
मद्यपान करने वाला है, न कोई अनाहिताग्नि है, न कोई यहाँ अल्पज्ञानी है और न ही कोई पर स्त्री गमन
करने वाला है, तो कुलटा स्त्री कैसे हो सकती है। हे पूज्य ऋषियो ! मैं (स्वयं) भी यज्ञ करने वाला हूँ। अतः
आपसे प्रार्थना है कि हमारे यज्ञानुष्ठान तक यहीं निवास करने की कृपा करें। शास्त्रानुसार मैंने एक-एक
ऋत्विक् को जितना धन प्रदान करने का संकल्प लिया है, उतना ही धन आप सभी को भी प्रदान करूँगा ॥
ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तग् हैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरग् संप्रत्यध्येषि तमेव
नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥
वे समस्त ऋषिगण राजा अश्वपति से बोले कि 'जिस कार्य विशेष से कोई व्यक्ति कहीं प्रस्थान करता
है, तो वहाँ उसे अपने उसी उद्देश्य को पूर्ण करना चाहिए'। अतः इस समय तो आप कृपा करके वैश्वानर
आत्मा के सम्बन्ध में ही बताएँ ॥ ६ ॥
तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे
तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥
तब उन ऋषियों से राजा अश्वपति ने कहा कि 'अच्छा, मैं कल प्रातःकाल आप सभी को इसके सन्दर्भ
में बताऊँगा। दूसरे दिन पूर्वाह्नकाल में वे सभी ऋषि हाथ में समिधाएँ ग्रहण किये हुए पहुँचे। उन सभी का
बिना उपनयन किये ही (सुपात्र समझकर) राजा ने उन्हें वैश्वानर विज्ञान से युक्त उस विद्या को बताया ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा
आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
राजा अश्वपति ने उपमन्यु कुमार औपमन्यव से प्रश्न किया कि हे औपमन्यव ! आप किस आत्मा की
उपासना करते हैं ? उत्तर देते हुए ऋषिकुमार प्राचीनशाल ने राजा से कहा कि हे भगवन् ! मैं द्युलोक की
ही उपासना करता हूँ। राजा ने कहा कि "आप जिस आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही 'सुतेजा'